भारतकोश
दृग्-दृश्य विवेक (स्वामी भारतीतीर्थ - सान्वय हिन्दी व्याख्या)

दृग्-दृश्य विवेक (स्वामी भारतीतीर्थ - सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Drig Drishya Viveka Hindi

स्वामी भारतीतीर्थ / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Drig-Drishya Viveka with Sanskrit Shlokas and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished34 पृष्ठ

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दृग्दृश्य विवेक | Drig Drishya Vivek


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अन्तःकरणवृत्तिश्च
चितिच्छायैक्यमागताः।
वासनाः कल्पयेत् स्वप्ने
बोधेऽक्षैर्विषयान्बहिः।।

बुद्धि की अन्तःकरण वृत्ति भी प्रतिबिम्बित चेतनता के साथ तादात्म्य कर जीवन्त हो जाती है। वासना के अनुरूप स्वप्न जगत् का सृजन करती है। जाग्रत् में भी इसी वृत्ति के द्वारा बाह्य विषयों की कल्पना होती है।

The inner organ which in itself but a modification identifying itself with the reflection of Consciousness imagines ideas in the dream. And the same inner organ imagines objects external to itself in the waking state with respect to the sense-organs.


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