गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १०० ) गणेशगीता-अ० ९. एतदेव परं ब्रह्म ज्ञेयमात्मा परोऽव्ययः ॥ गुणान्प्रकृतिजान्भुङ्क्ते पुरुषः प्रकृतेः परः ॥३०॥ यही परब्रह्म ज्ञेय है, यही आत्मा पर अव्यय प्रकृतिसे परे पुरुष कहाता है, तथा प्रकृतिसे उत्पन्न हुए गुणोंको भोगता है ॥ ३० ॥ गुणैस्त्रिभिरियं देहे बध्नाति पुरुषं दृढम् ॥ यदा प्रकाशः क्षांतिश्च वृद्धे सत्त्वे तदाधिकम् ३१॥ प्रकृतिके तीन गुणही इस पुरुषको देहमें बांधते हैं, जिस समय देहमें शांति और प्रकाशकी वृद्धि हो तब सतोगुणकी वृद्धि होती है ॥ ३१ ॥ लोभोऽशमः स्पृहारंभः कर्मणां रजसो गुणः ॥ मोहोऽप्रवृत्तिश्चाज्ञानं प्रमादस्तमसो गुणः ॥३२॥ लोभ, अशांति, स्पृहा, यह रजोगुणके धर्म हैं, मोह, अप्रवृत्ति, अज्ञान, प्रमाद यही तमोगुण जानना ॥ ३२ ॥ सत्त्वाधिकः सुखं ज्ञानं कर्मसंगं रजोऽधिकः ॥ तमोऽधिकश्च लभते निद्रालस्यं सुखेतरत् ॥३३॥ सतोगुण अधिक होनेसे सुख ज्ञानकी , रजोगुण अधिक होनेसे कर्मकी प्राप्ति,और तमोगुण अधिक होनेसे सुखसे इतर निद्रा और आलस्यकी प्राप्ति होती है ॥ ३३ ॥