भारतकोश
गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary

भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished130 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेत । ( १०१ ) एषु त्रिषु प्रवृद्धेषु मुक्तिसंसृतिदुर्गतीः ॥ प्रयान्ति मानवा राजंस्तस्मात्सत्त्वयुतोभव ३४ इन तीनोंकी वृद्धिमें क्रमसे मुक्ति, संसार और दुर्गतिकी मनुष्योंको प्राप्ति होती है इस कारण हे राजन् ! सतोगुणयुक्त हूजिये ॥ ३४ ॥ ततश्च सर्वभावेन भज त्वं मां नरेश्वर ॥ भक्त्या चाव्यभिचारिण्यासर्वत्रैवचसंस्थितम् ३५ हे नरेश्वर ! तदनन्तर सर्वभावसे तुम मेरा भजन करो, और निश्चल भक्तिसे सब स्थानमें मुझे स्थित जानो ॥ ३५ ॥ अग्नौ सूर्ये तथा सोमे यच्च तारासु संस्थितम् ॥ विदुषि ब्राह्मणे तेजो विद्धि तन्मामकं नृप॥३६॥ अग्नि, सूर्य, चंद्रमा, तारागण, विद्वान्, ब्राह्मणमें, जो तेज है वह मेराही तेज जानो ॥ ३६ ॥ अहमेवाखिलं विश्वं सृजामि विसृजामि च ॥ औषधीस्तेजसासर्वा विश्वंचाप्याययाम्यहम् ३७ मैंही सम्पूर्ण संसारको उत्पन्न कर संहार करता हूं और अपने तेजसे औषधी और जगतको मैंही युक्त करता हूं॥३७॥

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