भारतकोश
गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary

भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा

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( १०२ ) गणेशगीता-अ० ९. सर्वेन्द्रियाण्यधिष्ठाय जाठरं च धनंजयम् ॥ भुनज्मिचाखिलान्भोगान्पुण्यपापविवर्जितः ३८ और सम्पूर्ण इन्द्रियोंमें तथा उदरमें स्थित होकर धनञ्जय- नामक प्राण और जाठराग्नीरूपसे पापपुण्य रहित होकर सम्पूर्ण भोगोंको भोगता हूं ॥ ३८ ॥ अहं विष्णुश्च रुद्रश्च ब्रह्मा गौरी गणेश्वरः ॥ इन्द्राद्या लोकपालाश्च ममैवांशसमुद्भवाः ॥३९॥ मैंही विष्णु, ब्रह्मदेव, रुद्र, गौरी, गणपति हूं, इन्द्रादिक लोकपालें, मेरेही अंशसे उत्पन्न हुए हैं ॥ ३९ ॥ येनयेनहि रूपेण जनो मां पर्युपासते ॥ तथातथा दर्शयामि तस्मै रूपं सुभक्तितः ॥४०॥ जिस जिस रूपसे प्राणी मेरी, उपासना करते हैं, उनकी भक्तिके अनुसार उन्हें वैसा वैसाही रूप दिखाता हूं ॥ ४० ॥ इति क्षेत्रं तथा ज्ञाता ज्ञानं ज्ञेयं मयेरितम् ॥ अखिलं भूपते सम्यगुपपन्नाय पृच्छते ॥ ४१ ॥ ॐतत्सादिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासुयोगामृता- र्थशास्त्रे श्रीगणेशपुराणे उत्त० गजाननवरेण्यसंवादे क्षेत्रज्ञातृज्ञेयविवेकयोगोनाम नवमोऽध्यायः ॥९॥