गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकामेत। (१०३) इस प्रकार क्षेत्र ज्ञाता ज्ञान ज्ञेयका विषय तुमसे मैंने वर्णन किया, हे राजन् ! यह तुम्हारे प्रश्नका उत्तर सम्पूर्ण कहा, जो-- तुमने पूछा था ॥ ४१ ॥ ॐ तत्सदिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासु योगामृतार्थशास्त्रे श्रीगणेशपुराणे उत्तरखण्डे गजाननवरेण्यसंवादे पण्डित- ज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायां क्षेत्रज्ञातृज्ञेय विवेकयोगोनाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥ श्रीगजानन उवाच । दैव्यासुरी राक्षसी च प्रकृतिस्त्रिविधा नृणाम् ॥ तासां फलानि चिह्नानि संक्षेपात्तेऽधुना ब्रुवे॥१॥ श्रीगणेशजी बोले-दैवी, आसुरी, राक्षसी तीन प्रकारकी मनुष्योंकी प्रकृति होती है, अनेक फल और चिह्न संक्षेपसे वर्णन करते हैं ॥ १ ॥ आद्या संसाधयेन्मुक्तिं द्वे परे बन्धनं नृप ॥ चिह्नं ब्रवीमि चाद्यायास्तन्मे निगदतः शृणु २॥ दैवी प्रकृति मुक्तिकी साधना करती है, आगेकी दोनों बंधनमें डालती हैं। इनमें पहले दैवी प्रकृतिके चिह्न कहता हूं सो तुम सुनो ॥ २ ॥