भारतकोश
गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary

भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished130 पृष्ठ

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पृष्ठ 107

( १०६ ) गणेशगीता अ० १०. पृथ्वी और स्वर्ग लोकमें यह सब गुण रहते हैं. जो लोग मेरी भक्तिसे रहित हैं, वेही राक्षसी प्रकृतिको प्राप्त हुए हैं॥११॥ तामसीं ये श्रिता राजन्यान्ति ते रौरवं ध्रुवम् ॥ अनिर्वाच्यं च ते दुःखं भुञ्जते तत्र संस्थिताः १२ हे राजन्! जो तामसी प्रकृतिको प्राप्त हुए हैं, वे रौरवनरकको प्राप्त होते हैं, वहां वे अकथनीय दुःखको अवश्य भोगते हैं॥१२॥ दैवान्निःसृत्य नरकाज्जायन्ते भुवि कुब्जकाः ॥ जात्यन्धाःपङ्गवो दीना हीनजातिषु ते नृप १३ कदाचित् दैववश नरकसे निकलकर पृथ्वीमें कुबडे होते हैं वा जन्मान्ध, लँगडे, दीन और हीन जातिमें जन्म लेते हैं १३ पुनः पापसमाचारा मय्यभक्ताः पतन्ति ते ॥ उत्पतन्तिहि मद्भक्तायांकांचिद्योनिमाश्रिताः १४ पापाचरणवाले मुझमें भक्ति न करनेवाले पतित होते हैं, चाहें किसी योनिमें जन्म लें परन्तु मेरे भक्त नष्ट नहीं होते, उद्धार होजाते हैं ॥ १४ ॥ लभन्ते स्वर्गतिं यज्ञैरन्यैर्धर्मैश्च भूमिप ॥ सुलभा सा सकामानां मयिभक्तिः सुदुर्लभा १५