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गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary

भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished130 पृष्ठ

( १०६ ) गणेशगीता अ० १०. पृथ्वी और स्वर्ग लोकमें यह सब गुण रहते हैं. जो लोग मेरी भक्तिसे रहित हैं, वेही राक्षसी प्रकृतिको प्राप्त हुए हैं॥११॥ तामसीं ये श्रिता राजन्यान्ति ते रौरवं ध्रुवम् ॥ अनिर्वाच्यं च ते दुःखं भुञ्जते तत्र संस्थिताः १२ हे राजन्! जो तामसी प्रकृतिको प्राप्त हुए हैं, वे रौरवनरकको प्राप्त होते हैं, वहां वे अकथनीय दुःखको अवश्य भोगते हैं॥१२॥ दैवान्निःसृत्य नरकाज्जायन्ते भुवि कुब्जकाः ॥ जात्यन्धाःपङ्गवो दीना हीनजातिषु ते नृप १३ कदाचित् दैववश नरकसे निकलकर पृथ्वीमें कुबडे होते हैं वा जन्मान्ध, लँगडे, दीन और हीन जातिमें जन्म लेते हैं १३ पुनः पापसमाचारा मय्यभक्ताः पतन्ति ते ॥ उत्पतन्तिहि मद्भक्तायांकांचिद्योनिमाश्रिताः १४ पापाचरणवाले मुझमें भक्ति न करनेवाले पतित होते हैं, चाहें किसी योनिमें जन्म लें परन्तु मेरे भक्त नष्ट नहीं होते, उद्धार होजाते हैं ॥ १४ ॥ लभन्ते स्वर्गतिं यज्ञैरन्यैर्धर्मैश्च भूमिप ॥ सुलभा सा सकामानां मयिभक्तिः सुदुर्लभा १५

भाषाटीकासमेत । ( १०७ ) हे राजन् ! यज्ञसे अथवा दूसरे कर्मोंसे स्वर्गकी गति प्राप्त होती है, सो यह सकामी पुरुषोंको सुलभ है, परन्तु मुझमें भक्ति होनी दुर्लभ है ॥ १५ ॥ विमूढा मोहजालेन बद्धाः स्वेन च कर्मणा ॥ अहं हन्ता अहं कर्त्ता अहं भोक्तेति वादिनः१६॥ मूर्ख लोग मोहजाल तथा अपने कर्मोंसे बंधनमें पडते हैं, वे मैंही हन्ता, मैंही करता, मैंही भोक्ता ऐसे कहा करते हैं॥१६॥ अहमेवेश्वरः शास्ता अहं वेत्ता अहं सुखी ॥ एतादृशीमतिर्नॄणामधः पातयतीह तान्। १७॥ मैं ईश्वर, मैं शिक्षक, मैं जाननेवाला, मैंही सुखी हूं, इस प्रकारकी मति मनुष्योंको नरकमें लेजाती है ॥ १७ ॥ तस्मादेतत्त्समुत्सृज्य दैवीं प्रकृतिमाश्रय ॥ भक्तिं कुरु मदीयां त्वमनिशं दृढचेतसा ॥१८॥ इस कारण इसको छोडकर दैवी प्रकृतिको आश्रय करो और तुम दृढ चित्तसे मेरी दृढ भक्ति करो ॥ १८ ॥ सापि भक्तिस्त्रिधा राजन्सात्त्विकी राजसीतरा॥ यद्देवान्भजते भक्त्या सात्त्विकी सामताशुभा १९

( १०८ ) गणेशगीता-अ० १०. हे राजन् ! वह भक्ति सात्त्विकी राजसी तामसी इन भेदोंसे तीन प्रकारकी है, जो भक्तिसे देवताओंको भजन करते हैं, वह सात्त्विकी भक्ति है ॥ १९ ॥ राजसी सातु विज्ञेया भक्तिर्जन्ममृतिप्रदा ॥ यद्यक्षांश्चैव रक्षांसि यजन्ते सर्वभावतः ॥ २० ॥ और राजसी भक्ति जन्म मृत्यु देनेवाली है, जिसमें सर्व भावसे यक्ष और राक्षसोंकी पूजा होती है ॥ २० ॥ वेदेनाविहितंकूरं साहंकारं सदम्भकम् ॥ भजन्ते प्रेतभूतादीन्कर्म कुर्वन्ति कामुकम्॥२१॥ वेद विधानसे रहित क्रूर अहंकार तथा दम्भता सहित जो प्रेतभूतादिकोंको भजते हैं और कामुक कर्म करते हैं ॥२१॥ शोषयन्तो निजं देहमन्तःस्थं मां दृढाग्रहाः ॥ तामस्येतादृशी भक्तिर्नृणां सा निरयप्रदा ॥२२॥ अपने देहको शोषते हैं और हृदयमें स्थित मुझकूं दृढ आग्रह करते हैं यह तामसी भक्ति है जो मनुष्योंको नरक देने- हारी है ॥ २२ ॥

भाषाटीकासमेत । ( १०९ ) कामो लोभस्तथा क्रोधो दंभश्चत्वार इत्यमी ॥ महाद्वाराणि वीचीनां तस्मादेतांस्तु वर्जयेत् २३॥ ॐ तत्सदिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासु योगामृ- तार्थशास्त्रे श्रीगणेशपुराणे उ० श्रीगजाननवरेण्य- संवादे उपदेशयोगो नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥ काम, लोभ, क्रोध, दंभ यह नरकके चार महाद्वार हैं इस कारण इनको त्यागना चाहिये ॥ २३ ॥ ॐतत्सदिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासु योगामृतार्थ- शास्त्रे श्रीगणेशपुराणे उ०श्रीगजाननवरेण्यसम्वादे पण्डित- ज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायामुपदेशयोगोनाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥ ॥ श्रीगजानन उवाच ॥ तपोऽपि त्रिविधं राजन्कायिकादिप्रभेदतः ॥ ऋजुतार्जवशौचानि ब्रह्मचर्यमहिंसनम् ॥ १ ॥

( ११० ) गणेशगीता अ० ११. श्रीगणेशजी बोले हे राजन्! कायवचनमन इनभेदोंसे तपभी तीन प्रकारकाहै ऋजुता, आर्जव, पवित्रता, ब्रह्मचर्य, अहिंसा १ गुरुविज्ञद्विजातीनां पूजनं चासुरद्विषाम् ॥ स्वधर्मपालनं नित्यं कायिकं तप ईदृशम् ॥२॥ गुरु, पण्डित, ब्राह्मण देवतोंका पूजन करना, नित्य स्वधर्म पालन करना, यह कायिक तप कहा है ॥ २ ॥ मर्मास्पृक्च प्रियं वाक्यमनुद्वेगं हितं ऋतम् ॥ अधितिर्वेदशास्त्राणां वाचिकं तप ईदृशम् ॥३॥ हृदयग्राहक प्रिय वचन बोलना, उद्वेग रहित हितकारी और सत्य भाषण करना, वेदशास्त्रोंका पढना यह वचनका तप कहा है ॥ ३ ॥ अन्तःप्रसादःशान्तत्वं मौनमिन्द्रियनिग्रहः ॥ निर्मलाशयता नित्यं मानसं तप ईदृशम् ॥४॥ अन्तःकरण प्रसन्न, शान्ति, मौन, जितेन्द्रियता, सदा निर्मल भाव रखना, यह मानसिक तप है ॥ ४ ॥ अकामतः श्रद्धया च यत्तपः सात्त्विकं च तत् ॥ ऋद्धयै सत्कारपूजार्थं सदम्भं राजसं तपः ॥५॥

भाषाटीकासमेत। ( १११ ) अकामता और श्रद्धासे जो तप किया जाता है,वह सात्त्विक है,ऐश्वर्य सत्कार पूजाके निमित्त और दम्भ सहित जो किया जाता है वह राजसी तप है ॥ ५॥ तदस्थिरं जन्ममृती प्रयच्छति न संशयः ॥ परात्मपीडकं यच्च तपस्तामसमुच्यते ॥ ६ ॥ रजोगुणी तप जन्म मृत्यु और अस्थिरताका देनेहारा है और जिसमें दूसरेको पीडा हो वह तमोगुणी तप है ॥ ६॥ विधिवाक्यप्रमाणार्थं सत्पात्रे देशकालतः ॥ श्रद्धया दीयमानं यद्दानं तत्सात्त्विकं मतम् ॥७॥ विधियुक्त प्रमाणपूर्वक देशकालमें श्रद्धापूर्वक जो दान दिया जाता है वह सात्त्विक दान है ॥ ७ ॥ उपकारं फलं वापि काङ्क्षद्भिर्दीयते नरैः ॥ क्लेशतो दीयमानं वा भक्त्या राजसमुच्यते ॥८॥ और जो उपकार वा फलकी कामनासे मनुष्य दान करते हैं ऐसा दान जो क्लेश अथवा भक्ति किसी प्रकारसे दिया वह राजसी दान कहाता है ॥ ८ ॥ अकालदेशतोऽपात्रेऽवज्ञया दीयते तु यत् ॥ असत्काराच्च यद्दत्तं तद्दानं तामसं स्मृतम् ॥९॥

( ११२ ) गणेशगीता अ० ११. जो देश काल रहित अपात्रमें दिया जाता है, अथवा जो दान अवज्ञासे दिया जाता है, वह तमोगुणी दान है ॥९॥ ज्ञानं च त्रिविधं राजञ् शृणुष्व स्थिरचेतसा ॥ त्रिधा कर्म च कर्त्तारं ब्रवीमि ते प्रसंगतः ॥१०॥ हे राजन् ! मन लगाकर सुनो,ज्ञानभी तीनही प्रकारका है, कर्म और कर्त्ताभी तीनही प्रकारकेहैं,सो मैं प्रसंगसे कहताहूं १० नानाविधेषु भूतेषु मामेकं वीक्षते तु यः ॥ नाशवत्सु च नित्यं मां तज्ज्ञानं सात्त्विकंनृप ११ जो अनेक प्रकारके प्राणियोंमें एक मुझहीको देखता,भूतों- को नाशवान् और मुझे नित्य जानता है, हे राजन् ! वह सात्त्विक ज्ञान है ॥ ११ ॥ तेषु वेत्ति पृथग्भूतं विविधं भावमाश्रितः ॥ मामव्ययं च तज्ज्ञानं राजसं परिकीर्तितम् १२॥ और उन भूतोंसे मुझे पृथक् देखकर जो अनेक भावका आश्रय करते हैं और अव्यय जानते हैं, इस ज्ञानका नाम राजसी है ॥ १२ ॥ हेतुहीनमसत्यं च देहात्मविषयं च यत्॥ असदल्पार्थविषयं तामसं ज्ञानमुच्यते ॥ १३ ॥

भाषाटीकासमेत । ( ११३ ) हेतुरहित, असत्य, तथा देह और आत्माको एक मानना, क्रूर और थोडे अर्थयुक्त विषयोंमें लगना इस ज्ञानका नाम तामसी है ॥ १३ ॥ भेदतस्त्रिविधं कर्म विद्धि राजन्मयेरितम् ॥ कामनाद्वेषदम्भैर्यद्रहितं नित्यकर्म यत् ॥ १४ ॥ हे राजन् ! सत्,रज,तम इन भेदोंसे कर्म भी तीन प्रकारका है कामना,द्वेष और दंभरहित जो नित्य कर्म है ॥ १४ ॥ कृतं विना फलेच्छां यत्कर्म सात्त्विकमुच्यते ॥ यद्बहुक्लेशतः कर्म कृतं यच्च फलेच्छया ॥ १५ ॥ और फलकी इच्छा रहित जो कर्म किया जाता है, वह सात्त्विक कहाता है और जो बहुत क्लेश तथा फलकी इच्छासे किया है ॥ १५ ॥ क्रियमाणं नृभिर्दम्भात्कर्म राजसमुच्यते ॥ अनपेक्ष्य स्वशक्तिं यदर्थक्षयकरं च यत् ॥ १६ ॥ और जिसको मनुष्य दंभपूर्वक करते हैं वह राजसी कर्म कहाता है और जो अपनी शक्तिके बाहर तथा अर्थका क्षय करनेहारा कर्म किया जाता है ॥ १६ ॥

( ११४ ) गणेशगीता अ० ११. अज्ञानात्क्रियमाणं यत्कर्म तामसमीरितम् ॥ कर्तारं त्रिविधं विद्धि कथ्यमानं मया नृप ।१७॥ तथा जो अज्ञानसे कर्म किया जाता है वह तामसी कहाता है, इसी प्रकार हे राजन् ! तीन प्रकारके कर्ता होते हैं ॥१७॥ धैर्योत्साही समोऽसिद्धौसिद्धौ चाविक्रियस्तुयः। अहंकरविमुक्तो यः स कर्ता सात्त्विको नृप १८। हे राजन् ! धैर्य उत्साह युक्त सिद्धि असिद्धिमें समान दृष्टि- वाले, विकार और अहंकार रहित सात्त्विकी कर्ता कहाते हैं १८ कुर्वन्हर्षं च शोकं च हिंसां फलस्पृहां च यः ॥ अशुचिर्लुब्धको यश्च राजसोऽसौ निगद्यते १९॥ जो हर्ष शोक सहित कर्म करते, हिंसा और फलमें इच्छा रखते हैं, जिनमें अपवित्रता और लोभ है, वह राजसी कर्ता कहे जाते हैं ॥ १९ ॥ प्रमादाज्ञानसहितः परोच्छेदपरः शठः ॥ अलसस्तर्कवान्यस्तु कर्ताऽसौताम सो मतः २० प्रमाद और अज्ञान सहित दूसरोंके नाश करनेहारे मूर्ख आलसी और जो तर्क करनेवाले हैं वे तामसी कर्ता हैं॥२०॥

भाषाटीकासमेत । ( ११५ ) सुखं च त्रिविधं राजन्दुःखं च क्रमशः शृणु ॥ सात्त्विकं राजसं चैव तामसं च मयोच्यते २१॥ हे राजन् ! इसी प्रकार सुख दुःखभी तीन प्रकारके हैं, वह तुम क्रमसे सुनो, इनकेभी सात्विक, राजस, तामस भेद हैं सो मैं कहता हूं ॥ २१ ॥ विषवद्भासते पूर्वं दुःखस्यान्तकरं च यत् ॥ इच्छमानं तथा वृत्त्या यदन्तेऽमृतवद्भवेत् २२॥ जो पहले तौ विषकी समान प्रतीत हो और दुःखका अन्त करनेवाला हो और मनोवृत्तिसे इच्छा किया हुआ जो अन्तमें अमृतकी समान हो ॥ २२ ॥ प्रसादात्स्वस्य बुद्धेर्यत्सात्त्विकं सुखमीरितम् ॥ विषयाणां तु यो भोगो भासतेऽमृतवत्पुरा २३॥ और जो अपनी बुद्धिको प्रसन्न करनेहारा हो,वही सात्विक सुख वर्णन किया है, और जो विषयोंका भोग प्रथम तौ अमृतकी समान विदित हो ॥ २३ ॥ हालाहलमिवान्ते यद्राजसं सुखमीरितम् ॥ तन्द्राप्रमादसंभूतमालस्यप्रभवं च यत् ॥ २४ ॥

(११६) गणेशगीता अ० ११. और अन्तमें विषकी समान फल दे, उसे राजसी सुख कहते हैं, और जो तन्द्रा तथा प्रमादसे उत्पन्न हुआ और जो आलस्यसे हुआ है ॥ २४ ॥ सर्वदा मोहकं स्वस्य सुखं तामसमीदृशम् ॥ न तदस्ति यदेतैर्यन्युक्तं स्यात्त्रिविधैर्गुणैः॥२५॥ तथा जो अपनेको सदा मोह करता है, उसका नाम तामसी सुख है, ऐसा कोई भी प्राणी नहीं जो इन तीनों गुणोंसे मुक्त हो ॥ २५ ॥ राजन्ब्रह्मापि त्रिविधमोंतत्सदिति भेदतः ॥ त्रिलोकेषु त्रिधाभूतमखिलं भूप वर्तते ॥ २६ ॥ हे राजन् ! ब्रह्म भी तौ ( ॐ ) ( तत् ) ( सत् ) इस भेदसे तीन प्रकारका है, हे राजन् ! वह तीन प्रकारसे ब्रह्म त्रिलोकीमें व्याप्त है ॥ २६ ॥ ब्रह्मक्षत्रियविट्शूद्राः स्वभावाद्भिन्नकर्मणः ॥ तानि तेषां तु कर्माणि संक्षेपात्तेऽधुना वदे ॥२७॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, यह स्वभावसेही भिन्न २ कर्म करनेवाले हैं, इनके कर्म संक्षेपसे मैं तुमसे कहताहूं ॥ २७ ॥

भाषाटीकासमेत । ( ११७ ) अन्तर्बाह्येन्द्रियाणां च वश्यत्वमार्जवं क्षमा ॥ नानातपांसि शौचं च द्विविधं ज्ञानमात्मनः २८ बाह्य और अन्तर इन्द्रियोंका वश करना, सरलता, क्षमा, अनेक प्रकारके तप,पवित्रता,दोनों प्रकार आत्माका ज्ञान २८॥ वेदशास्त्रपुराणानां स्मृतीनां ज्ञानमेव च ॥ अनुष्ठानं तदर्थानां कर्म ब्राह्ममुदाहृतम् ॥ २९ ॥ वेद शास्त्र पुराण और स्मृतियोंका ज्ञान होना और उनके अर्थोंका अनुष्ठान करना, यह ब्राह्मणके कर्म हैं ॥ २९ ॥ दार्ढ्यं शौर्यं च दाक्ष्यं च युद्धे पृष्ठाप्रदर्शनम् ॥ शरण्यपालनं दानं धृतिस्तेजः स्वभावजम् ३० दृढता, शूरता, चतुरता, युद्धसे पलायन न करना, शरणा- गतकी रक्षा, दान, धैर्य, स्वाभाविक तेज ॥ ३० ॥ प्रभुता मन औन्नत्यं सुनीतिर्लोकपालनम् ॥ पञ्चकर्माधिकारित्वं क्षात्रं कर्म समीरितम् ३१॥ प्रभुता,मनकी उदारता,अच्छीनीति, लोकपालन इन पांच- कर्मोंमें अधिकार यह क्षत्रियोंका स्वाभाविक कर्म है ॥ ३१ ॥

( ११८ ) गणेशगीता अ० ११, नानावस्तुक्रयो भूमेः कर्षणं रक्षणं गवाम् ॥ त्रिधाकर्माधिकारित्वंवैश्यकर्म समीरितम् ३२॥ अनेक प्रकारकी वस्तुओंका क्रय, विक्रय, पृथ्विकर्षण अर्थात् खेती आदि करना, गायोंकी रक्षा करना, इन तीन प्रका- रके कर्मोंमें वैश्यका अधिकार है, यही वैश्यके कर्म हैं ॥३२॥ दानं द्विजानां शुश्रूषा सर्वदा शिवसेवनम् ॥ एतादृशं नरव्याघ्र कर्म शौद्रमुदीरितम् ॥ ३३ ॥ दान, ब्राह्मणोंकी सेवा, सदाशिवजीकी सेवा, हे राजन् । यह शूद्रोंका स्वकर्म वर्णन किया ॥ ३३ ॥ स्वस्वकर्मरता एते मय्यर्प्याखिलकारिणः ॥ मत्प्रसादात्स्थिरं स्थानं यान्ति ते परमं नृप३४ यह सब वर्ण अपने अपने कर्म यथावत् करते हुए और सम्पूर्ण कर्म मुझे अर्पण करते हुए मेरी कृपासे निश्चल परम स्थानको गमन करते हैं ॥ ३४ ॥ इति ते कथितो राजन्प्रसादाद्योग उत्तमः ॥ सांगोपांगःसविस्तारोऽनादिसिद्धो मया प्रिय३५

भाषाटीकासमेत । ( ११९ ) हे राजन् इस प्रकार तेरे स्नेहसे अंग उपांग सहित निस्तार पूर्वक अनादि सिद्धयोग वर्णन किया, यह योग परमोत्तम है ३५ युंक्ष्व योगं मयाख्यातं नाख्यातं कस्यचिन्नृप ॥ गोपयैनं ततः सिद्धिं परां यास्यस्यनुत्तमाम् ३६ हे राजन् ! इस मेरे कहे योगको धारण करो और किसीसे इसे मत कहो, जो तुम इसे गुप्त रखवोगे तो परम उत्तम सिद्धि- को प्राप्त होगे ॥ ३६ ॥ व्यास उवाच । इति तस्य वचः श्रुत्वा प्रसन्नस्य महात्मनः ॥ गणेशस्य वरेण्यः स चकार च यथोदितम् ३७॥ व्यासजी बोले इस प्रकार प्रसन्नचित्त महात्मा गणेशजीके वचन सुनकर राजा वरेण्य उनके वचनके अनुसार करता हुआ ॥ ३७ ॥ त्यक्त्वा राज्यं कुटुम्बं च कान्तारंप्रययौ रयात् । उपदिष्टं यथा योगमास्थाय मुक्तिमाप्तवान् ३८॥

( १२० ) गणेशगीता अ० ११. राज्य और कुटुम्बको त्यागकर वेगसे वनको चलागया, उपदेश किये योगमें यथास्थित हो मुक्त होगया ॥ ३८ ॥ इमं गोप्यतमं योगं शृणोति श्रद्धया तु यः॥ सोऽपिकैवल्यमाप्नोति यथा योगी तथैव सः ३९ इस महागुप्त योगको जो कोई श्रद्धासे श्रवण करता है,वह भी मुक्तिको प्राप्त होजाता है, जिस प्रकार योगी होते हैं॥३९॥ य इमं श्रावयेद्योगं कृत्वा स्वार्थे सुबुद्धिमान् ॥ यथा योगी तथा सोऽपि परं निर्वाणमृच्छति४० जो बुद्धिमान् इस योगको स्वार्थके निमित्त भी सुनाता है वह भी योगीकी समान मुक्त होजाता है ॥ ४० ॥ यो गीतां सम्यगभ्यस्य ज्ञात्वा चार्थं गुरोर्मुखात्। कृत्वा पूजां गणेशस्य प्रत्यहं पठते तु यः॥४१॥ जो इस गीताको भलीप्रकार अभ्यास कर गुरुमुखसे इसका अर्थ जानकर गणेशकी पूजाकर प्रतिदिन पाठ करता है॥४१॥ एककालं द्विकालं वा त्रिकालं वापि यः पठेत् ॥ ब्रह्मीभूतस्य तस्यापि दर्शनान्मुच्यते नरः ४२॥

भाषाटीकासमेत । ( १२१ ) जो एक काल दो काल वा तीनों कालमें इसको पढता हैं वह ब्रह्म स्वरूपको प्राप्त होजाता है, उसके दर्शनसे मनुष्य मुक्त होजाता है ॥ ४२ ॥ न यज्ञैर्न व्रतैर्दानैर्नाग्निहोत्रैर्महाधनैः ॥ न वेदैः सम्यगभ्यस्तैः सम्यग्ज्ञातैःसहाङ्गकैः ४३ न यज्ञ, न व्रत, न दान, न अग्निहोत्र, न महाधन, न वेदोंके उत्तम अभ्यास, न सांग ज्ञानसे ॥ ४३ ॥ पुराणश्रवणैनैव न शास्त्रैः साधुचिन्तितैः ॥ प्राप्यते ब्रह्म परममनया प्राप्यते नरैः ॥ ४४ ॥ न पुराणोंके श्रवणसे, न अच्छा चिंतन किये हुये शास्त्रोंसे ऐसी ब्रह्मकी प्राप्ति होती है, जैसी इस गीतासे मनुष्यको प्राप्त होती है ॥ ४४ ब्रह्मघ्नो मद्यपस्तेयी गुरुतल्पगमोऽपि यः ॥ चतुर्णी यस्तु संसर्गी महापातककारिणाम्॥४५॥ ब्रह्महत्यारा, मद्यपी, चोर, गुरुदारगामी, चारों वर्णोंमें गमन करनेहारे तथा और भी महापाप करनेहारे ॥ ४५ ॥

( १२२ ) गणेशगीता-अ० ११. स्त्रीहिंसागोवधादीनां कर्त्तारो ये च पापिनः ॥ ते सर्वे प्रतिमुच्यन्ते गीतामेतां पठन्ति चेत्४६॥ स्त्रीहिंसा, गोवध करनेहारे तथा और भी पापी वे सब इस गीताके पढनेसे छूट जाते हैं ॥ ४६ ॥ यः पठेत्प्रयतो नित्यं स गणेशो न संशयः ॥ चतुर्थ्यां यः पठेद्भक्त्या सोऽपिमोक्षाय कल्पते४७ जो नियमसे इसे नित्य पढते हैं वह निःसन्देह गणेश हैं, और जो चतुर्थीके दिन भक्तिसे पढते हैं, वहभी मुक्त हो जाते हैं ॥ ४७ ॥ तत्तत्क्षेत्रं समासाद्य स्नात्वाभ्यर्च्य गजाननम् ॥ सकृद्गीतां पठन्भक्त्या ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥४८॥ उनउन क्षेत्रोंमें प्राप्त होकर स्नानकर गणेशजीका पूजन कर एकवारभी भक्तिसे गीताका पाठ करै तौ, ब्रह्मस्वरूपको प्राप्त होता है ॥ ४८ ॥ भाद्रे मासे सिते पक्षे चतुर्थ्यां भक्तिमान्नरः ॥ कृत्वा महीमयीं मूर्तिं गणेशस्य चतुर्भुजाम्४९॥

भाषाटीकासमेत । ( १२३ ) भादोंके महीनेके शुक्ल पक्षमें चौथके दिन भक्तिपूर्वक मृत्तिकाकी चतुर्भुजी मूर्ति बनाकर ॥ ४९ ॥ सवाहनां सायुधां च समभ्यर्च्य यथाविधि ॥ यः पठेत्सप्तकृत्वस्तु गीतामेतां प्रयत्नतः॥५०॥ वाहन और आयुधसहित विधिपूर्वक पूजन करके,जो यत्न- पूर्वक सातवार गीताका पाठ करता है ॥ ५० ॥ ददाति तस्य संतुष्टो गणेशो भोगमुत्तमम् ॥ पुत्रान्पौत्रान्धनं धान्यं पशुरत्नादिसंपदः ५१॥ उसको संतुष्ट होकर गणेशजी पुत्र, पौत्र, धन, धान्य, पशु, रत्नादि संपत् और अनेक भोग प्रदान करते हैं ॥ ५१ ॥ विद्यार्थिनो भवेद्विद्या सुखार्थी सुखमाप्नुयात् ॥ कामानन्याँल्लभेतकामी मुक्तिमन्तेप्रयान्तिते ५२ इति श्रीगणेशपुराणे श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासु योगामृतार्थशास्त्रे श्रीगजाननवरेण्यसम्वादे त्रिविध- वस्तुविवेकनिरूपणं नामैकादशोऽध्यायः॥११॥ श्रीगजाननार्पणमस्तु ॥

( १२४ ) गणेशगीता अ० ११. विद्यार्थी विद्या, सुखार्थी सुख, कामार्थी कामको प्राप्त होकर अन्तमें मुक्तिको प्राप्त होते हैं ॥ ५२ ॥ ॐ तत्सदिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासु योगामृतार्थशास्त्रे श्रीमद्गजाननवरेण्यसंवादे कात्यायनगोत्रोद्भवकामेश्वरनाथ- संस्कृतपाठशालामुख्याध्यापकपंडितज्वालाप्रसादमिश्र कृतभाषाटीकायां विविधवस्तुविवेकनिरूपणं नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ व्योम बाण अरु अङ्क शशि, सम्वत्सर सुखदान ॥ पौषपूर्णिमा रविदिवस, पूर्ण कियो शुभज्ञान ॥ श्रीगणेशार्पणमस्तु ।

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