गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेत । ( १०७ ) हे राजन् ! यज्ञसे अथवा दूसरे कर्मोंसे स्वर्गकी गति प्राप्त होती है, सो यह सकामी पुरुषोंको सुलभ है, परन्तु मुझमें भक्ति होनी दुर्लभ है ॥ १५ ॥ विमूढा मोहजालेन बद्धाः स्वेन च कर्मणा ॥ अहं हन्ता अहं कर्त्ता अहं भोक्तेति वादिनः१६॥ मूर्ख लोग मोहजाल तथा अपने कर्मोंसे बंधनमें पडते हैं, वे मैंही हन्ता, मैंही करता, मैंही भोक्ता ऐसे कहा करते हैं॥१६॥ अहमेवेश्वरः शास्ता अहं वेत्ता अहं सुखी ॥ एतादृशीमतिर्नॄणामधः पातयतीह तान्। १७॥ मैं ईश्वर, मैं शिक्षक, मैं जाननेवाला, मैंही सुखी हूं, इस प्रकारकी मति मनुष्योंको नरकमें लेजाती है ॥ १७ ॥ तस्मादेतत्त्समुत्सृज्य दैवीं प्रकृतिमाश्रय ॥ भक्तिं कुरु मदीयां त्वमनिशं दृढचेतसा ॥१८॥ इस कारण इसको छोडकर दैवी प्रकृतिको आश्रय करो और तुम दृढ चित्तसे मेरी दृढ भक्ति करो ॥ १८ ॥ सापि भक्तिस्त्रिधा राजन्सात्त्विकी राजसीतरा॥ यद्देवान्भजते भक्त्या सात्त्विकी सामताशुभा १९