गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४६ ) गणेशगीता अ० ३. सम्पूर्ण विषयोंसे मुक्त ज्ञानवानभी यदि यज्ञके निमित्त कर्म करै तौ वह कर्म उसे बाधक नहीं होते, लीन हो जाते हैं ॥ २९ ॥ अहमग्निर्हविर्दाता हुतं यन्मयि चार्पितम् ॥ ब्रह्माप्तव्यं च ते नाथ ब्रह्मण्येव यतो रतः ॥३०॥ अग्नि, होमका द्रव्य, हवन करनेहारे, और जो आहुति मुझे अर्पण की जाती है, वह सब ब्रह्मरूप है, इसे ब्रह्मस्वरूपसे देखकर जो हवन करता है,और ब्रह्मके ही अर्पण करता है वह ब्रह्मरूप कर्मकी समाधिसे ब्रह्महीको प्राप्त होता है ॥ ३० ॥ योगिनः केचिदपरे दिष्टं यज्ञं वदंति च ॥ ब्रह्माग्निरेव यज्ञो वै इति केचन मेनिरे ॥ ३१ ॥ कोई योगी देवयजनको यज्ञ कहते हैं, दूसरे ब्रह्मरूप अग्निमें यज्ञरूप उपायसे यज्ञ करनेको यज्ञ मानते हैं ॥ ३१ ॥ संयमाग्नौ परे भूप इंद्रियाण्युपजुह्वति ॥ खाग्निष्वन्ये तद्विषयांश्छन्दादीनुपजुह्वति॥३२॥ हे राजन् ! कोई योगी संयमरूप अग्निमें श्रोत्रादि इन्द्रि- योंको हवन करते हैं, कोई इन्द्रियरूपी अग्निमें शब्दादिकोंकी आहुति देते हैं ॥ ३२ ॥