गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४८ ) गणेशगीता अ० ३. दूसरे नियताहार होकर इन्द्रियोंकी वृत्तिको रोक पांचों प्राणोंमें पांचों प्राणोंकी आहुति देते हैं, इस प्रकार अनेक प्रकारके यज्ञकर यज्ञद्वारा पापोंका नाश करते हैं ॥ ३६ ॥ नित्यं ब्रह्म प्रयांत्येते यज्ञशिष्टामृताशिनः ॥ अयज्ञकारिणो लोको नायमन्यःकुतो भवेत् ३७ इस प्रकारसे जो नित्यही यज्ञसे बचे पदार्थको भोजन करते हैं वे नित्य ब्रह्मको प्राप्त होते हैं, यज्ञ न करनेवालोंको दूसरा लोक तौ कहां यह भी नहीं है ॥ ३७ ॥ कायिकादि त्रिधाभूतान्यज्ञान्वेदे प्रतिष्ठितान् ॥ ज्ञात्वा तानखिलान्भूप मोक्ष्यसेऽखिलबंधनात्॥ हे राजन् ! ब्रह्मके मुखमें मन वचन कर्मके बहुत प्रकारके यज्ञ वर्णन किये हैं, उन्हें क्रियासे उत्पन्न और क्रिया रहित आत्मासे न होनेवाले जानो, ऐसा जानकर संसारसे मुक्त होगे ॥ ३८ ॥ सर्वेषां भूप यज्ञानां ज्ञानयज्ञः परो मतः ॥ अखिलं लीयते कर्म ज्ञाने मोक्षस्य साधने ३९॥ हे राजन् ! सब यज्ञोंमें ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है, जिस मोक्षसाधन ज्ञानयज्ञमें सब कर्म क्षीण हो जाते हैं ॥ ३९ ॥