भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 19, कुल 656 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 19

[ १७ ] विषय पृष्ठ-संख्या ३०- विष्णुभक्त राजा बलिका आख्यान, बलिके द्वारा सौवाँ अश्वमेधयज्ञ करनेपर इन्द्रका चिन्तित होना तथा भगवान् विष्णुको अपनी चिन्ता निवेदित करना, भगवान् विष्णुद्वारा अदितिके गर्भसे वामनरूपमें प्रकट होना .................... ३४१ ३१- पिता कश्यपमुनिसे वामनको गणेशाराधनाका उपदेश प्राप्त होना, वामनद्वारा गणेशकी आराधना, गणेशका प्रकट होकर वामनको दर्शन और अनेक वर देना, वामन-भगवान्‌द्वारा बलिके यज्ञमें पधारना और तीन पग भूमिका दान प्राप्तकर अपने भक्त बलिको पाताल भेजना, वामनद्वारा स्थापित सुमुख नामक गणेश- प्रतिमाका माहात्म्य ................................................ ३४३ ३२-गणेशाराधनामें शमीका माहात्म्य, राजा प्रियव्रतका आख्यान, उनकी ज्येष्ठ पत्नी कीर्तिद्वारा गणेशजीकी आराधना ........................................................... ३४६ ३३-प्रियव्रतकी पत्नी कीर्तिद्वारा शमीपत्रोंसे विनायकका पूजन, स्वप्नमें कीर्तिको अनेक वरदानोंकी प्राप्ति, वरदानके प्रभावसे राजा प्रियव्रतका कीर्तिको धर्मपत्नीरूपमें स्वीकार कर लेना, यथासमय कीर्तिको 'क्षिप्तप्रसादन' नामक पुत्रकी प्राप्ति और सपत्नीद्वारा उसे विष देना, महर्षि गृत्समदद्वारा पुत्रको जिला देना, शमीका माहात्म्य ..................... ३४९ ३४-महर्षि भृशुण्डीके शापसे ब्राह्मण और्वकी पुत्री शमीकाका शमीवृक्षकी तथा महर्षि शौनकके शिष्य धौम्यपुत्र मन्दारका मन्दारवृक्षकी योनि प्राप्त करनेका आख्यान ............ ३५१ ३५-महर्षि शौनक तथा ब्राह्मण और्वके समक्ष भगवान् गजाननका प्राकट्य और उन्हें शमी तथा मन्दारके माहात्म्यको बतलाना ........................................ ३५४ ३६-गजाननकी पूजा किये बिना यज्ञारम्भ करनेपर विश्वस्वरूप देवी सावित्रीका रुष्ट होना और उन देवों तथा मुनियोंको जलरूप (नदीरूप) प्राप्त करनेका शाप देना, पुनः ब्रह्माजीके कहनेपर देवपत्नियोंका शमीपत्रद्वारा गणेशजीका पूजन करना, प्रसन्न होकर गजाननका उन्हें दर्शन देना ....... ३५६ ३७-देवपत्नियोंद्वारा की गयी गजाननस्तुति, गजाननसे वर प्राप्तकर देवोंको पुनः अपने पूर्ववत् स्वरूपकी प्राप्ति, देवताओंद्वारा हेरम्बगणपतिकी मूर्तिका शमीपत्रोंद्वारा पूजन, ब्रह्माजीद्वारा मन्दारकाष्ठसे निर्मित गणेशप्रतिमाका शमीपत्रोंद्वारा पूजन, मन्दार तथा शमीके माहात्म्यका वर्णन .................. ३५८ ३८-रानी कीर्तिके पुत्रको महर्षि गृत्समदद्वारा गणेशजीके 'ढुंढिराज' नामक चतुरक्षर मन्त्रका उपदेश, ढुंढिराज गणेशका माहात्म्य, काशीविश्वनाथ तथा गंगाजीकी महिमा, भस्मासुरपुत्र दुरासदद्वारा शंकरजीकी आराधना और वरप्राप्ति ...................................................... ३६० ३९-भस्मासुरपुत्र दुरासदद्वारा भूमण्डल तथा देवलोकमें विजय प्राप्त करना, भस्मासुरका शिवसे वरदान प्राप्त करना, मोहिनीरूप भगवान् विष्णुकी युक्तिसे उसका भस्म होना, दुरासदका अविमुक्तक्षेत्र काशीपुरीमें आना, दुरासदके अत्याचारोंका वर्णन............................................. ३६४


विषय पृष्ठ-संख्या ४०-दुरासददैत्यके वधका निवेदन करनेके लिये देवताओं तथा ऋषियोंका केदारक्षेत्रमें भगवान् शिव एवं पार्वतीके पास जाना, देवोंद्वारा भगवतीकी स्तुति, भगवतीके मुखमण्डलसे गजाननका प्राकट्य, देवीका उनका 'वक्रतुण्ड' नाम रखना ........................................... ३६६ ४१-विनायकदेव और दैत्य दुरासदका युद्ध, भयभीत दैत्य दुरासदका युद्धक्षेत्रसे वापस लौटना ........................ ३६८ ४२- दैत्य दुरासदद्वारा पुनः विनायकसे युद्ध, विनायकद्वारा अपने तेजसे छप्पन विनायकोंको प्रकट करना, विनायकोंद्वारा सम्पूर्ण सेनाके मारे जानेपर दुरासदद्वारा भगवान् शंकरसे प्राप्त वरदानका स्मरण करना, विनायकद्वारा योगबलसे विराट् रूप धारणकर एक पैर काशीमें तथा दूसरा पैर दुरासदके सिरपर रखकर उसे काशीके द्वारके रूपमें काशीमें प्रतिष्ठित करना और स्वयं भी 'एकपाद विनायक'के नामसे काशीमें स्थित होना ................................... ३७० ४३-देवताओं तथा मुनियोंद्वारा ढुंढिराज गणेश तथा छप्पन विनायकोंकी स्तुति तथा पूजाका वर्णन ................. ३७२ ४४- मुनि गृत्समदद्वारा रानी कीर्तिसे विनायकदेवकी महिमाका कथन, काशीमें राजा दिवोदासके राज्य-शासनका वर्णन .............................................................. ३७३ ४५- शंकरजीका सभी देवताओंको लेकर मन्दरगिरिपर जाना, राजा दिवोदासका काशीमें राज्य करना, भगवान् शिवका दिवोदासके विकार देखनेके लिये देवताओं तथा ऋषियोंको काशी भेजना, किंतु दिवोदासको निर्विकार देखकर उन सभीका काशीमें स्थित हो जाना, फलस्वरूप शिवका काशीदर्शनके लिये चिन्तित होना ........................... ३७४ ४६- भगवान् शिवद्वारा ढुंढिराज गणेशसे काशी जानेकी प्रार्थना करना, ढुंढिराजका एक मायावी ज्योतिषीके रूपमें काशी जाना तथा वहाँकि स्त्री-पुरुषों एवं राजा दिवोदासको भी अपनी भविष्यवाणियोंसे मोहित करना................ ३७९ ४७- भगवान् विष्णुद्वारा बौद्धरूप धारणकर काशीनिवासियोंको उपदेश प्रदान करना, काशीमें अधर्माचरणकी वृद्धि, भगवान् विष्णुका अपने चतुर्भुजरूपमें दिवोदासको दर्शन देना और अनेक वर प्रदान करना तथा शिवके काशी- आगमनके लिये दूतद्वारा सन्देश भेजना, दिवोदासद्वारा काशीका राज्य त्यागकर तपस्यामें निरत होना .......... ३८१ ४८- ढुंढिराजका शिवको काशीमें आनेके लिये सन्देश भेजना, भगवान् शिवका काशीमें आकर ढुंढिराजकी स्तुति करना तथा ढुंढिराजकी महिमाका प्रतिपादन करना, रानी कीर्तिका काशी आकर ढुंढिराजकी भक्ति करना, ढुंढिराजका प्रत्यक्ष दर्शन देकर उसे तथा उसके पुत्रको अनेक वर प्रदानकर कीर्तिपुत्रका 'पर्शुबाहु' नामकरण करना .............................................................. ३८३ ४९- कीर्तिके पुत्रका राज्याभिषेक, ब्रह्माजीद्वारा विनायकलोकका तथा उसकी महिमाका वर्णन, विनायकके भक्तोंको विनायकलोककी प्राप्ति ........................................ ३८७