भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 20, कुल 656 में से

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पृष्ठ 20

[ १८ ] विषय पृष्ठ-संख्या ५०- महर्षि मुद्गलद्वारा काशिराजको विनायकके लोक 'स्वानन्दभुवन' का परिचय बताना तथा सदैव वहाँ विद्यमान रहनेवाले विनायकके स्वरूपका निरूपण करना, मुद्गलजीके उपदेशसे काशिराजद्वारा गणेशोपासना और अन्तमें विनायक-लोकको प्राप्त करना .................... ३८९ ५१- काशिराजके गणपतिधामगमनका वर्णन .......... ३९२ ५२- काशिराजका विभिन्न लोकोंका दर्शन करते हुए गणपतिधाममें पहुँचना .......... ३९४ ५३- काशिराजका गणपतिधाममें भगवान् विनायकका दर्शन करना और उनकी स्तुति करना .......... ३९७ ५४- काशीमें 'वरदविनायक' की स्थापना.......... ४०० ५५- भगवान् विनायकका अपने भक्त ब्राह्मण शुक्लको सर्ववैभवसम्पन्न भवन प्रदान करना .......... ४०३ ५६- नरान्तकका काशीपुरीपर आक्रमण करनेके लिये प्रस्थान .......... ४०६ ५७- काशिराजकी पराजय और नरान्तकका उन्हें बन्दी बना लेना .......... ४०८ ५८- काशिराजकी पत्नीका विलाप करना और विनायककी सिद्धि नामक शक्तिका विशाल सेना और क्रूर नामक कालपुरुषको प्रकट करना, कालपुरुषद्वारा नरान्तककी सेनाका भक्षणकर उसे विनायकके पास ले आना....... ४११ ५९- काशिराजकी नरान्तकसे मुक्ति .......... ४१३ ६०- भगवान् विनायक और नरान्तकका युद्ध .......... ४१५ ६१- भगवान् विनायकद्वारा नरान्तकका वध .......... ४१८ ६२- नरान्तकके सिरको लेकर उसके माता-पिताका देवान्तकके पास जाना और देवान्तकका काशिराजकी नगरीपर आक्रमण करना .......... ४२० ६३- अणिमादि सिद्धियोंकी सेनाका देवान्तककी सेनासे युद्ध. ४२३ ६४- देवान्तकसे युद्धमें सिद्धिसैनाकी पराजय .......... ४२५ ६५- विनायकका बुद्धिको युद्धके लिये भेजना, बुद्धिद्वारा एक भयंकर शक्तिका प्राकट्य और उस शक्तिद्वारा देवान्तककी सेनाका संहार .......... ४२६ ६६- देवान्तकका अघोरमन्त्रसे हवनकर दिव्य अश्व पाना और उसपर आरूढ़ हो रणक्षेत्रमें जाना तथा सिद्धियोंकी सम्पूर्ण सेनाका संहार कर डालना .......... ४२८ ६७- विनायक और देवान्तकका युद्ध .......... ४३० ६८- विनायक और देवान्तकके युद्धका वर्णन .......... ४३१ ६९- विनायक और देवान्तकके युद्धका वर्णन .......... ४३४ ७०- देवान्तक-वध .......... ४३६ ७१- काशिराजका अपने सभासदोंसे वार्तालाप, मगधराजकी कन्याके साथ काशिराजके पुत्रका विवाह, विनायकको साथ लेकर काशिराजका महर्षि कश्यपके आश्रममें गमन, पुरवासियोंका वियोगमें व्यथित होना तथा विनायकद्वारा उन्हें पुनः आनेका आश्वासन देना .......... ४३७ ७२- विनायकका पिता कश्यपके आश्रममें आगमन, काशिराजद्वारा विनायककी महिमाका कथन, काशिराजका काशीमें प्रत्यागमन विषय पृष्ठ-संख्या तथा ढुण्ढिविनायककी स्थापना, माता अदिति तथा पिता कश्यपको आश्वासन देकर विनायकका निजलोकगमन .. ४३९ ७३- गण्डकीनगराधिपति राजा चक्रपाणिका आख्यान, निःसंतान राजाको महर्षि शौनकद्वारा पुत्रप्राप्तिके लिये सौरव्रतके अनुष्ठानका उपदेश करना, राजा-रानीद्वारा सम्यग् रूपसे सौरव्रतके नियमोंका पालन, भगवान् सूर्यद्वारा स्वप्नमें रानीको पुत्रकी प्राप्ति, रानीद्वारा गर्भके तापको सहन न कर सकनेके कारण समुद्रमें उसका त्याग .......... ४४२ ७४- राजा चक्रपाणिके पुत्र सिन्धुद्वारा भगवान् सूर्यकी आराधना और उनसे विभिन्न वरोंकी प्राप्ति .......... ४४५ ७५- दैत्यराज सिन्धुका आख्यान, सिन्धुद्वारा दिग्विजयसे सम्पूर्ण पृथ्वीको विजित करना, अमरावतीपर आधिपत्य और स्वयं इन्द्रासनपर विराजमान होना .......... ४४८ ७६- सिन्धुसेनासे पराजित देवोंका वैकुण्ठलोकमें विष्णुकी शरणमें जाना, देवताओंको आश्वस्तकर भगवान् विष्णुका गरुड़पर आरूढ़ हो देवताओंसहित वहाँ आना, दैत्यसेना तथा देवसेनाका युद्ध .......... ४५० ७७- सिन्धुदैत्यका देवताओंको पराजित करना, विष्णुका उसके पराक्रमसे प्रसन्न हो वरदानके रूपमें देवोंसहित उसके नगर गण्डकीपुरमें रहना, विष्णुका देवताओंको आश्वस्त करना, दुष्ट सिन्धुदैत्यद्वारा किये गये अधर्माचरणका वर्णन ....... ४५२ ७८- बृहस्पतिके कथनानुसार देवताओंका माघमासके कृष्ण- पक्षकी चतुर्थी तिथिको संकटचतुर्थीव्रत करना तथा स्तुतिद्वारा विनायकदेवको प्रसन्न करना, संकटहरस्तोत्रकी महिमा, प्रसन्न हो विनायकदेवका देवोंको वरदान देना और चारों युगोंमें होनेवाले अपने स्वरूपका परिचय देना .......... ४५३ ७९- भगवान् शिवका गौरी तथा गणोंसहित त्रिसन्ध्याक्षेत्रमें गमन, भगवान् शिवद्वारा गौरीको गणेशजीके माहात्म्यका प्रतिपादन और उन्हें गणेशाराधनाका उपदेश, देवी पार्वतीका तपस्या करनेके लिये लेखनाद्रिपर्वतपर गमन .......... ४५६ ८०- पार्वतीजीका लेखनाद्रिपर्वतपर बारह वर्षतक तपस्या करना, प्रसन्न हुए भगवान् गणेशका प्रकट होकर दर्शन देना, गौरीका उन्हें पुत्ररूपमें प्राप्त करनेका वर माँगना और गणेशजीका उन्हें आश्वासन देना, पार्वतीजीद्वारा सिद्धिक्षेत्रमें प्रासाद तथा गणेशप्रतिमाकी प्रतिष्ठा करना, पुनः त्रिसन्ध्याक्षेत्रमें आकर भगवान् शिवको सम्पूर्ण वृत्तान्त निवेदित करना, शिव-पार्वती दोनोंका प्रसन्न होना..... ४५८ ८१- पार्वतीका भाद्रमासकी चतुर्थीको गणेशकी पार्थिव प्रतिमा बनाकर पूजन करना, भगवान् गणेशका उस पार्थिव प्रतिमासे प्रकट होना .......... ४६० ८२- शंकरद्वारा गौरीपुत्र गणेशकी महिमाका कथन, गणेशका प्रादुर्भाव, गौरीपुत्रका 'गणेश' यह नामकरण, गणेशचतुर्थी तिथिका माहात्म्य, सिन्धुदैत्यको दूतोंद्वारा गणेशके अवतारका वृत्तान्त ज्ञात होना, सिन्धुके दूतोंका त्रिसन्ध्याक्षेत्रमें जाकर गुप्तरूपसे निवास करना और गणेशके वधकलिये प्रयत्नशील होना .......... ४६२