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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

प्रेतकल्प ] विविध दानादि कर्मोंका फल प्रेतको प्राप्त होना ५२३


जिसका भाग्य जैसा होता है, उसको उस मार्गमें वैसा ही भोग प्राप्त होता है। प्राणी स्वयं अपने लिये स्वस्थचित्तसे श्रद्धापूर्वक जो कुछ दान देता है, उसको वहाँपर प्राप्त करता है। मरनेपर जो बन्धु-बान्धवोंके द्वारा उसके लिये दिया जाता है, उसका आश्रय ले करके वह सुखी होता है।

गरुडने कहा—हे देवेश! तेरह पददान किसलिये करना चाहिये? यह दान किसे देना चाहिये? यह सब यथोचित रूपसे मुझे बतायें।

श्रीभगवान्‌ने कहा—हे पक्षिराज! छत्र, पादुका, वस्त्र, मुद्रिका, कमण्डलु, आसन और भोजनपात्र—ये सात प्रकारके पद माने गये हैं। पूर्ववर्णित महापथमें जो महाभयंकर 'रौद्र' नामक आतप (धूप) है, उसके द्वारा मनुष्य जलता है। छत्रका दान देनेसे प्रेतको तृप्ति देनेवाली शीतल छाया प्राप्त होती है। पादुका दान देनेसे मृतप्राणी अश्वारूढ़ होकर घोर असिपत्रवनको निश्चित ही पार कर जाते हैं। मृतप्राणीके उद्देश्यसे ब्राह्मणको आसन और भोजन देकर स्वागत करनेपर प्रेत महापथमें धीरे-धीरे चलता हुआ उस दान दिये गये अन्नको सुखपूर्वक ग्रहण करता है। कमण्डलुका दान देनेसे प्राणी उस यमलोकके महापथमें फैले हुए बहुत धूपवाले, वायुरहित और जलहीन मार्गमें निश्चित ही यथेच्छ जल एवं वायु प्राप्तकर सुखपूर्वक गमन करता है। मृतकके उद्देश्यसे जो व्यक्ति जलपूर्ण कमण्डलुका दान करता है, उसको निश्चित ही हजार पौंसलोंके दानका फल प्राप्त होता है।

उदारतापूर्वक वस्त्रका दान देनेसे प्रेतात्माको महाक्रोधी काले और पीले वर्णवाले अत्यन्त भयंकर यमदूत कष्ट नहीं देते हैं। मुद्रिका दान देनेसे उस महापथमें अस्त्र-शस्त्रसे युक्त दौड़ते हुए यमदूत दिखायी नहीं देते हैं। पात्र, आसन, कच्चा अन्न, भोजन, घृत तथा यज्ञोपवीतके दानसे पददानकी पूर्णता होती है। यममार्गमें जाता हुआ भूख-प्याससे व्याकुल एवं थका हुआ प्रेत भैंसके दूधका दान करनेसे निश्चित ही सुखका अनुभव करता है।

गरुडने कहा—हे विभो! मृत व्यक्तिके उद्देश्यसे जो कुछ भी दान अपने घरमें किया जाता है, वह प्रेततक किसके द्वारा पहुँचाया जाता है?

श्रीभगवान्‌ने कहा—हे पक्षिन्! सर्वप्रथम वरुण दानको ग्रहण करते हैं, उसके बाद वे उस दानको मेरे हाथमें दे देते हैं। मैं सूर्यदेवके हाथोंमें सौंप देता हूँ और सूर्यदेवसे वह प्रेत उस दानको लेकर सुखका अनुभव करता है*।

बुरे कर्मके प्रभावसे वंशका विनाश हो जाता है और उस कुलके सभी प्राणियोंको नरकमें तबतक रहना पड़ता है, जबतक पापका क्षय नहीं हो जाता है।

इन नरकोंकी संख्या बहुत है। पर इनमेंसे इक्कीस नरक मुख्यरूपसे उल्लेख्य हैं—तामिस्र, लौहशंकु, महारौरव, शाल्मली, रौरव, कुड़वल, कालसूत्र, पूतिमृत्तिका, संघात, लोहतोद, सविष, सम्प्रतापन, महानरक, कालोल, सजीवन, महापथ, अवीचि, अन्धतामिस्र, कुम्भीपाक, असिपत्रवन और पतन नामवाले हैं। घोर यातना भोगते हुए जिनके बहुत-से वर्ष बीत जाते हैं और यदि संतति नहीं है तो वे यमके दूत बन जाते हैं। यमके द्वारा भेजे गये वे दूत मरे हुए मनुष्यके लिये प्रतिदिन बन्धु-बान्धवोंसे दानस्वरूप प्राप्त अन्न और जलका सेवन करते हैं। मार्गके मध्यमें जब वे भूख-प्याससे व्याकुल हो जाते हैं तो मरे हुए प्राणीका हिस्सा ही लूटकर खा-पी जाते हैं। मासके अन्तमें जो भोजन और पिण्डदान देते हैं, जब उसकी प्राप्ति उन्हें हो जाती है तो वे सभी उसको खाकर संतुष्ट हो जाते


* गृह्णाति वरुणो दानं मम हस्ते प्रयच्छति। अहं च भास्करे देवे भास्करात् सोऽश्नुते सुखम्॥ (१८। २७)

५२४ संक्षिप्त गरुडपुराण [ धर्मकाण्ड—


हैं। इसीसे उन्हें प्रतिदिन वर्षभर तृप्ति मिलती है।

इस प्रकार किये गये पुण्यके प्रभावसे प्रेत 'सौरिपुर'की यात्रा करता है। तदनन्तर एक वर्ष बीतनेपर वह प्रेत, यमराजके भवनके संनिकट स्थित 'बहुभीतिकर' नामक नगरमें पहुँचकर दशगात्रके पिण्डसे निर्मित हस्तमात्र परिमाणके शरीरको छोड़ देता है। जिस प्रकार रामको देखकर परशुरामका तेज उनके शरीरसे निकलकर राममें प्रविष्ट हो गया था, उसी प्रकार कर्मज शरीरका आश्रय लेकर वह पूर्व शरीरका परित्याग कर देता है, अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला वायुरूप वह शरीर शमीपत्रपर चढ़कर आश्रय लेता है। 'जिस प्रकार मनुष्य चलते हुए एक पैर भूमिपर रखकर दूसरे पैरको आगे बढ़ानेके लिये उठाता है, जैसे तृणजलौका (तृण जोंक) एक पाँवपर स्थिर होकर दूसरे पाँवको आगे बढ़ाती है, वैसे ही जीव भी कर्मानुसार एक देहसे दूसरे देहको धारण करता है। जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रका परित्याग कर नवीन वस्त्र धारण कर लेता है, उसी प्रकार जीव अपने पुराने शरीरका त्याग करके नये शरीरको धारण करता है'—

ब्रजंस्तिष्ठन् पदैकेन यथैवैकेन गच्छति।
यथा तृणजलौकेव देही कर्मानुगोऽवशः॥
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
  नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-
  न्यन्यानि संयाति नवानि देही॥

<p align="right">(१८।४१-४२)<br>(अध्याय १८)</p>

जीवका यमपुरीमें प्रवेश, वहाँ शुभाशुभ कर्मोंका फलभोग, कर्मानुसार अन्य देहकी प्राप्ति, मनुष्य-जन्म पाकर धर्माचरण ही मुख्य कर्तव्य

**श्रीभगवान्‌ने कहा—**वायुरूप होकर भूखसे पीड़ित, कर्मजन्य शरीरका आश्रय लेकर जीव यमके साथ चित्रगुप्तपुरकी ओर जाता है। चित्रगुप्तपुर बीस योजन विस्तृत है। वहाँ रहनेवाले कायस्थ* सभी प्राणियोंके पाप-पुण्यका भली प्रकारसे सर्वेक्षण करते हैं। महादान करनेपर वहाँ गया हुआ व्यक्ति सुखका भोग करता है। चौबीस योजन विस्तृत वैवस्वतपुर है। लौह, लवण, कपास और तिलसे पूर्ण पात्रका दान करनेपर इस दानके फलस्वरूप यमपुरमें निवास करनेवाले दाताके पितर लोग तृप्त होते हैं। वहाँपर धर्मध्वज नामका प्रतीहार सदैव द्वारपर अवस्थित रहता है। सप्तधान्यका दान देनेसे धर्मध्वज प्रसन्न हो जाता है। वहाँ जाकर प्रतीहार प्रेतके शुभाशुभका वर्णन करता है। धर्मराजका


* कायस्थ नामकी एक देवयोनि विशेष है।

२३८- प्रेतबाधाजन्य विविध स्वप्न तथा उसका प्रायश्चित्तविधान

प्रेतकल्प ] * प्रेतबाधाका स्वरूप तथा मुक्तिके उपाय * ५२५


जो प्रशस्त एवं सुन्दर स्वरूप है, उस स्वरूपका दर्शन सज्जन और सुकृतियोंको प्राप्त होता है। जो दुराचारी जन हैं, वे अत्यन्त भयंकर यमके स्वरूपको देखकर भयभीत होकर हाहाकार करते हैं।

जिन मनुष्योंने दान किया है, उनके लिये वहाँपर कहीं भी भय नहीं है। आये हुए सुकृती जनको देखकर यमराज अपने आसनका इसलिये परित्याग कर देते हैं कि यह सुकृती मेरे इस मण्डलका भेदन करके ब्रह्मलोकको जायगा।<sup></sup> दानसे धर्म सुलभ हो जाता है और यममार्ग सुखावह हो जाता है। इस यमलोकका मार्ग अत्यन्त विशाल है, इसकी दुर्गमताके कारण इसका अनुगमन कोई नहीं करना चाहता। हे वत्स! बिना दान-पुण्य किये प्राणीका धर्मराजके भवनमें पहुँचना सम्भव नहीं है। उस रौद्र मार्गमें महाभयंकर यमके सेवक रहते हैं। एक-एक पुरके आगे एक-एक हजार सेवकोंकी उपस्थिति रहती है। यातना देनेवाले यमदूत पापीको प्राप्त करके पकाते हैं। वहाँपर यमदूत उसको एक मासतक रखते हैं। उस मासके बीतते ही वह एक चौथाई शेष रह जाता है।

हे कश्यपपुत्र! जिन लोगोंने और्ध्वदैहिक क्रियामें विहित दानोंको नहीं किया है, वे लोग बहुत कष्ट झेलते हुए उस मार्गमें चलते हैं। अतः प्राणीको यथाशक्ति दान देना चाहिये। दान न देनेपर प्राणी पशुके समान यमदूतोंके द्वारा पाशमें बाँधकर ले जाया जाता है। मनुष्य जैसा-जैसा कर्म करता है, उसी प्रकारकी योनियोंमें उसको जाना पड़ता है। वैसा ही उन योनियोंमें भोग भोगता हुआ वह सभी प्रकारके लोकोंमें विचरण करता है। जब मनुष्य-योनि प्राप्त होती है, तब भी लौकिक सुखोंको अनित्य जानकर प्राणीको धर्माचरण करना चाहिये।

कृमि, भस्म अथवा विष्ठा ही शरीरकी परिणति है। जो मनुष्य-शरीर प्राप्त करके भी धर्माचरण नहीं करता, वह हाथमें दीपक रखता हुआ भी महाभयंकर अन्धकूपमें गिरता है। मनुष्य-जन्म प्राणीको बहुत बड़े पुण्यसे प्राप्त होता है। जो जीव इस योनिको पाकर धर्मका आचरण करता है, उसे परम गतिकी प्राप्ति होती है। धर्मको व्यर्थ माननेवाला प्राणी दुःखपूर्वक जन्म-मरण प्राप्त करता है। हे पक्षिन्! सैकड़ों बार विभिन्न योनियोंमें जन्म लेनेके बाद प्राणीको मनुष्य-योनि प्राप्त होती है, उसमें भी द्विज होना अत्यन्त दुर्लभ है। जो व्यक्ति द्विज होकर धर्मका पालन करता है और विभिन्न व्रतोंका आदर एवं श्रद्धापूर्वक अनुष्ठान करता है, वह उस धर्मकी ही कृपासे अमरत्व हस्तगत कर लेता है।<sup></sup> (अध्याय १९)


प्रेतबाधाका स्वरूप तथा मुक्तिके उपाय

श्रीगरुड़ने कहा— हे प्रभो! प्रेतयोनिमें जो कोई भी प्राणी जाते हैं, वे कहाँ वास करते हैं? प्रेतलोकसे निकलकर वे कैसे और किस स्थानमें चले जाते हैं? चौरासी लाख योनियोंसे परिव्यास, यम तथा हजारों भूतोंसे रक्षित होनेपर भी प्राणी नरकसे निकलकर कैसे इस संसारमें विचरण करते


१-प्राप्तं सुकृतिनं दृष्ट्वा स्थानाच्चलति सूर्यजः। एष मे मण्डलं भित्त्वा ब्रह्मलोकं प्रयास्यति॥ (१९।९)
२-यथा यथा कृतं कर्म तां तां योनिं व्रजेन्नरः। तत्तथैव च भुञ्जानो विचरेत् सर्वलोकगः॥
अशाश्वतं परिज्ञाय सर्वलोकोत्तरं सुखम्। यदा भवति मानुष्यं तदा धर्मं समाचरेत्॥
कृमयो भस्म विष्ठा वा देहानां प्रकृतिः सदा। अन्धकूपे महारौद्रे दीपहस्तः पतेत्तु वै॥
महापुण्यप्रभावेण मानुष्यं जन्म लभ्यते। यस्तत् प्राप्य चरेद्धर्मं स गच्छेत् परमां गतिम्॥
अपि जानन् वृथा धर्मं दुःखमायाति याति च॥
जातीशतेन लभते किल मानुषत्वं तत्रापि दुर्लभतरं खग भो द्विजत्वम्।
यस्तत्र पालयति लालयति व्रतानि तस्यामृतं भवति हस्तगतं प्रसादात्॥ (१९।१६-२१)

२३९- अल्पमृत्युके कारण तथा बालकोंकी अन्त्येष्टि-क्रियाका निरूपण

५२६संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड-

हैं? इसे आप बतानेकी कृपा करें।

**श्रीकृष्णने कहा—**हे पक्षिराज! जहाँ प्रेतगण निवास करते हैं, उसको तुम सुनो। छलसे पराये धन और परायी स्त्रीका अपहरण तथा द्रोहसे मनुष्य निशाचर-योनिको प्राप्त होते हैं। जो लोग अपने पुत्रके हितचिन्तनमें ही अनुरक्त रहते हैं तथा सभी प्रकारका पाप करते हैं, वे शरीररहित होकर भूख-प्यासकी अथाह पीड़ाको सहन करते हुए यत्र-तत्र भटकते रहते हैं। वे प्रेत चोरके समान उस महापथके लिये पितृभागमें दिये गये जलका अपहरण करते हैं। तदनन्तर पुनः अपने घरमें आकर वे मित्रके रूपमें प्रविष्ट हो जाते हैं और वहींपर रहते हुए स्वयं रोग-शोक आदिकी पीड़ासे ग्रसित होकर सब कुछ देखते रहते हैं। वे एक दिनका अन्तराल देकर आनेवाले ज्वरका रूप धारण करके अपने सम्बन्धियोंको पीड़ा पहुँचाते हैं अथवा तिजरिया ज्वर बनकर और शीत-वातादिसे उन्हें कष्ट देते हैं। उच्छिष्ट अर्थात् जूठे अपवित्र स्थानोंमें निवास करते हुए उन प्रेतोंके द्वारा सदैव अभिलक्षित प्राणियोंको कष्ट देनेके लिये शिरोवेदना, विषूचिका तथा नाना प्रकारके अन्य बहुत-से रोगोंका रूप धारण कर लिया जाता है। इस प्रकार वे दुष्कर्मी प्रेत नाना दोषोंमें प्रवृत्त होते हैं।

**गरुडने कहा—**हे प्रभो! वे प्रेत किस रूपसे किसका क्या करते हैं? किस विधिसे उनकी जानकारी प्राप्त की जा सकती है? क्योंकि वे न कुछ कहते हैं, न बोलते हैं? हे हृषीकेश! यदि आप मेरा कल्याण चाहते हों तो मेरे मनके इस व्यामोहको दूर कर दें। इस कलिकालमें प्रायः बहुत-से लोग प्रेतयोनिको ही प्राप्त होते हैं।

**श्रीविष्णुने कहा—**हे गरुड! प्रेत होकर प्राणी अपने ही कुलको पीड़ित करता है, वह दूसरे कुलके व्यक्तिको तो कोई आपराधिक छिद्र प्राप्त होनेपर ही पीड़ा देता है। जीते हुए तो वह प्रेमीकी तरह दिखायी देता है, किंतु मृत्यु होनेपर वही दुष्ट बन जाता है। जो भगवान् श्रीरुद्रके मन्त्रका जप करता है, धर्ममें अनुरक्त रहता है, देवता और अतिथिकी पूजा करता है, सत्य तथा प्रिय बोलनेवाला है, उसको प्रेत पीड़ा नहीं दे पाते हैं। जो व्यक्ति सभी प्रकारकी धार्मिक क्रियाओंसे परिभ्रष्ट हो गया है, नास्तिक है, धर्मकी निन्दा करनेवाला है और सदैव असत्य बोलता है, उसीको प्रेत कष्ट पहुँचाते हैं*। हे तार्क्ष्य! कलिकालमें अपवित्र क्रियाओंको करनेवाला प्राणी प्रेतयोनिको प्राप्त होता है। हे काश्यप! इस संसारमें उत्पन्न एक ही माता-पितासे पैदा हुए बहुत-से संतानोंमें एक सुखका उपभोग करता है, एक पाप कर्ममें अनुरक्त रहता है, एक संतानवान् होता है, एक प्रेतसे पीड़ित रहता है और एक पुत्र धनधान्यसे सम्पन्न रहता है, एकका पुत्र मर जाता है, एकके मात्र पुत्रियाँ ही होती हैं। प्रेतदोषके कारण बन्धु-बान्धवोंके साथ विरोध होता है। प्रेतयोनिके प्रभावसे मनुष्यको संतान नहीं होती है। यदि संतान उत्पन्न भी होती है तो वह मर जाती है। प्रेतबाधाके कारण तो व्यक्ति पशुहीन और धनहीन हो जाता है। उसके कुप्रभावसे उसकी प्रकृतिमें परिवर्तन आ जाता है, वह अपने बन्धु-बान्धवोंसे शत्रुता रखने लगता है। अचानक प्राणीको जो दुःख प्राप्त होता है, वह प्रेतबाधाके कारण होता है। नास्तिकता, जीवन-वृत्तिकी समाप्ति, अत्यन्त लोभ तथा प्रतिदिन होनेवाले कलह—यह प्रेतसे पैदा होनेवाली पीड़ा है। जो पुरुष माता-पिताकी हत्या करता है, जो


* रुद्रजापी धर्मरतो देवतातिथिपूजकः। सत्यवाक् प्रियवादी च न प्रेतैः स हि पीड्यते ॥
सर्वक्रियापरिभ्रष्टो नास्तिको धर्मनिन्दकः। असत्यवादनिरतो नरः प्रेतैः स पीड्यते॥ (२०। १६-१७)

प्रेतकल्प ] प्रेतबाधाका स्वरूप तथा मुक्तिके उपाय ५२७

देवता और ब्राह्मणोंकी निन्दा करता है, उसे हत्याका दोष लगता है। यह पीड़ा प्रेतसे पैदा होती है। नित्य-कर्मसे दूर, जप-होमसे रहित और पराये धनका अपहरण करनेवाला मनुष्य दुःखी रहता है, इन दुःखोंका कारण भी प्रेतबाधा ही है। अच्छी वर्षा होनेपर भी कृषिका नाश होता है, व्यवहार नष्ट हो जाता है, समाजमें कलह उत्पन्न होता है, ये सभी कष्ट प्रेतबाधासे ही होते हैं। हे पक्षिराज ! मार्गमें चलते हुए पथिकको जो बवंडरसे पीड़ा होती है, उसको भी तुम्हें प्रेतबाधा समझना चाहिये। यह बात मैं सत्य ही कह रहा हूँ।

प्राणी जो नीच जातिसे सम्बन्ध रखता है, हीन कर्म करता है और अधर्ममें नित्य अनुरक्त रहता है, वह प्रेतसे उत्पन्न पीड़ा है। व्यसनोंसे द्रव्यका नाश हो जाता है, प्राप्तव्यका विनाश हो जाता है। चोर, अग्नि और राजासे जो हानि होती है, यह प्रेतसम्भूत पीड़ा है। शरीरमें महाभयंकर रोगकी उत्पत्ति, बालकोंकी पीड़ा तथा पत्नीका पीड़ित होना—ये सब प्रेतबाधाजनित हैं। वेद, स्मृति-पुराण एवं धर्मशास्त्रके नियमोंका पालन करनेवाले परिवारमें जन्म होनेपर भी धर्मके प्रति प्राणीके अन्तःकरणमें प्रेमका न होना प्रेतजनित बाधा ही है। जो मनुष्य प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूपसे देवता, तीर्थ और ब्राह्मणकी निन्दा करता है, यह भी प्रेतोत्पन्न पीड़ा है। अपनी जीविकाका अपहरण, प्रतिष्ठा तथा वंशका विनाश भी प्रेतबाधाके अतिरिक्त अन्य प्रकारसे सम्भव नहीं है। स्त्रियोंका गर्भ विनष्ट हो जाता है, जिनमें रजोदर्शन नहीं होता और बालकोंकी मृत्यु हो जाती है, वहाँ प्रेतजन्य बाधा ही समझनी चाहिये। जो मनुष्य शुद्ध भावसे सांवत्सरदिक श्राद्ध नहीं करता है, वह भी प्रेतबाधा है। तीर्थमें जाकर दूसरेमें आसक्त हुआ प्राणी जब अपने सत्कर्मका परित्याग कर दे तथा धर्मकार्यमें स्वार्जित धनका उपयोग न करे तो उसको भी प्रेतजन्य पीड़ा ही समझना चाहिये। भोजन करनेके समय कोपयुक्त पति-पत्नीके बीच कलह, दूसरोंसे शत्रुता रखनेवाली बुद्धि—यह सब प्रेत-सम्भूत पीड़ा है। जहाँ पुष्प और फल नहीं दिखायी देते तथा पत्नीका विरह होता है, वहाँ भी प्रेतोत्पन्न पीड़ा है।

जिन लोगोंमें सदैव उच्चाटनके अत्यधिक चिह्न दिखायी देते हैं, अपने क्षेत्रमें उसका तेज निष्फल हो जाता है तो उसे प्रेतजनित बाधा ही माननी चाहिये। जो व्यक्ति सगोत्रीका विनाशक है, जो अपने ही पुत्रको शत्रुके समान मार डालता है, जिसके अन्तःकरणमें प्रेम और सुखकी अनुभूतियोंका अभाव रहता है, वह दोष उस प्राणीमें प्रेतबाधाके कारण होता है। पिताके आदेशकी अवहेलना, अपनी पत्नीके साथ रहकर भी सुखोपभोग न कर पाना, व्यग्रता और क्रूर बुद्धि भी प्रेतजन्य बाधाके कारण होती है।

हे तार्क्ष्य ! निषिद्ध कर्म, दुष्ट-संसर्ग तथा वृषोत्सर्गके न होने और अविधिपूर्वक की गयी और्ध्वदैहिक क्रियासे प्रेत होता है। अकालमृत्यु या दाह-संस्कारसे वञ्चित होनेपर प्रेतयोनि प्राप्त होती है, जिससे प्राणीको दुःख झेलना पड़ता है। हे पक्षिराज ! ऐसा जानकर मनुष्य प्रेत-मुक्तिका सम्यक् आचरण करे। जो व्यक्ति प्रेत योनियोंको नहीं मानता है, वह स्वयं प्रेतयोनिको प्राप्त होता है। जिसके वंशमें प्रेत-दोष रहता है, उसके लिये इस संसारमें सुख नहीं है। प्रेतबाधा होनेपर मनुष्यकी मति, प्रीति, रति, लक्ष्मी और बुद्धि—इन पाँचोंका विनाश होता है। तीसरी या पाँचवीं पीढ़ीमें प्रेतबाधाग्रस्त कुलका विनाश हो जाता है। ऐसे वंशका प्राणी जन्म-जन्मान्तर दरिद्र, निर्धन और पापकर्ममें अनुरक्त रहता है। विकृत मुख तथा नेत्रवाले, क्रुद्ध स्वभाववाले, अपने गोत्र, पुत्र-पुत्री, पिता, भाई, भौजाई अथवा बहूको नहीं माननेवाले लोग भी विधिवश प्रेत-शरीर धारण कर सद्गतिसे रहित हो 'बड़ा कष्ट है', यह चिल्लाते हुए अपने पापको स्मरण करते हैं। (अध्याय २०)

५२८ संक्षिप्त गरुडपुराण [ धर्मकाण्ड-


प्रेतबाधाजन्य दीखनेवाले स्वप्न, उनके निराकरणके उपाय तथा नारायणबलिका विधान

**श्रीगरुडने कहा—**हे भगवन्! प्रेत किस प्रकारसे मुक्त होते हैं? जिनकी मुक्ति होनेपर मनुष्योंको प्रेतजन्य पीड़ा पुनः नहीं होती। हे देव! जिन लक्षणोंसे युक्त बाधाको आपने प्रेतजन्य कहा है, उनकी मुक्ति कब सम्भव है और क्या किया जाय कि प्राणीको प्रेतत्वकी प्राप्ति न हो सके? प्रेतत्व कितने वर्षोंका होता है? चिरकालसे प्रेतयोनिको भोग रहा प्राणी उससे किस प्रकार मुक्त हो सकता है? यह सब आप बतलानेकी कृपा करें।

**श्रीकृष्णने कहा—**हे गरुड! प्रेत जिस प्रकार प्रेतयोनिसे मुक्त होते हैं, उसे मैं बतला रहा हूँ। जब मनुष्य यह जान ले कि प्रेत मुझको कष्ट दे रहा है तो ज्योतिर्विदोंसे इस विषयमें निवेदन करे। प्रेतग्रस्त प्राणीको बड़े ही अद्भुत स्वप्न दिखायी देते हैं। जब तीर्थ-स्नानकी बुद्धि होती है, चित्त धर्मपरायण हो जाता है और धार्मिक कृत्योंको करनेकी मनुष्यकी प्रवृत्ति होती है तब प्रेतबाधा उपस्थित होती है एवं उन पुण्य कार्योंको नष्ट करनेके लिये चित्त-भंग कर देती है। कल्याणकारी कार्योंमें पग-पगपर बहुत-से विघ्न होते हैं। प्रेत बार-बार अकल्याणकारी मार्गमें प्रवृत्त होनेके लिये प्रेरणा देते हैं। शुभकर्मोंमें प्रवृत्तिका उच्चाटन और क्रूरता—यह सब प्रेतके द्वारा किया जाता है। जब व्यक्ति समस्त विघ्नोंको विधिवत् दूर करके मुक्ति प्राप्त करनेके लिये सम्यक् उपाय करता है तो उसका वह कर्म हितकारी होता है और उसके प्रभावसे शाश्वत प्रेतनिवृत्ति हो जाती है।

हे पक्षिन्! दान देना अत्यन्त श्रेयस्कर है, दान देनेसे प्रेत मुक्त हो जाता है। जिसके उद्देश्यसे दान दिया जाता है, उसको तथा स्वयंको वह दान तृप्त करता है। हे तार्क्ष्य! यह सत्य है कि जो दान देता है वही उसका उपभोग करता है। दानदाता दानसे अपना कल्याण करता है और ऐसा करनेसे प्रेतको भी चिरकालिक संतृप्ति प्राप्त होती है। संतृप्त हुए वे प्रेत सदैव अपने बन्धु-बान्धवोंका कल्याण चाहते हैं। यदि विजातीय दुष्ट प्रेत उसके वंशको पीड़ित करते हैं तो संतृप्त हुए सगोत्री प्रेत अनुग्रहपूर्वक उन्हें रोक देते हैं। उसके बाद समय आनेपर अपने पुत्रसे प्राप्त हुए पिण्डादिक दानके फलसे वे मुक्त हो जाते हैं। हे पक्षिराज! यथोचित दानादिके फलसे संतृप्त प्रेत बन्धु-बान्धवोंको धन्य-धान्यसे समृद्धि प्रदान करते हैं।*

जो व्यक्ति स्वप्नमें प्रेत-दर्शन, भाषण, चेष्टा और पीड़ा आदिको देखकर भी श्राद्धादिद्वारा उनकी मुक्तिका उपाय नहीं करता, वह प्रेतोंके द्वारा दिये गये शापसे संलिप्त होता है। ऐसा व्यक्ति जन्म-जन्मान्तरतक निःसन्तान, पशुहीन, दरिद्र, रोगी, जीविकाके साधनसे रहित और निम्नकुलमें उत्पन्न होता है। ऐसा वे प्रेत कहते हैं और पुनः यमलोक जाकर पापकर्मोंका भोगद्वारा नाश हो जानेके अनन्तर अपने समयसे प्रेतत्वकी मुक्ति हो जाती है।

**गरुडने कहा—**हे देवेश्वर! यदि किसी प्रेतका नाम और गोत्र न ज्ञात हो सके, उसके विषयमें


* स भवेत् तेन मुक्तस्तु दत्तं श्रेयस्करं परम्। स्वयं तृप्यति भोः पक्षिन् यस्योद्देश्येन दीयते॥
शृणु सत्यमिदं तार्क्ष्य यद्ददाति भुनक्ति सः। आत्मानं श्रेयसा युञ्ज्यात् प्रेतस्तृप्तिं चिरं व्रजेत्॥
ते तृप्ताः शुभमिच्छन्ति निजबन्धुषु सर्वदा। अज्ञातयस्तु ये दुष्टाः पीडयन्ति स्ववंशजान्॥
निवारयन्ति तृप्तास्ते जायमानानुकम्पकाः। पश्चात् ते मुक्तिमायान्ति काले प्राप्ते स्वपुत्रतः॥ (२१। १२—१५)

२४०- बालकोंकी अन्त्येष्टिक्रियाका स्वरूप, सत्पुत्रकी महिमा तथा औरस और क्षेत्रज आदि पुत्रोंद्वारा अन्त्येष्टि करनेका फल

प्रेतकल्प ] प्रेतयोनि दिलानेवाले निन्दित कर्म ५२९


विश्वास न हो रहा हो, कुछ ज्योतिषी पीड़ाको प्रेतजन्य कहते हों, कभी भी मनुष्यको प्रेत स्वप्नमें न दिखायी दे, उसकी कोई चेष्टा न होती हो तो उस समय मनुष्यको क्या करना चाहिये ? उस उपायको मुझे बतायें।

श्रीभगवान्ने कहा— हे खगराज ! पृथ्वीके देवता ब्राह्मण जो कुछ भी कहते हैं, उस वचनको हृदयसे सत्य समझकर भक्ति-भावपूर्वक पितृभक्तिनिष्ठ हो पुरश्चरणपूर्वक नारायणबलि करके जप, होम तथा दानसे देह-शोधन करना चाहिये। उससे समस्त विघ्न नष्ट हो जाते हैं। यदि वह प्राणी भूत, प्रेत, पिशाच अथवा अन्य किसीसे पीड़ित होता है तो उसको अपने पितरोंके लिये नारायणबलि करनी चाहिये। ऐसा कर वह सभी प्रकारकी पीड़ाओंसे मुक्त हो जाता है। यह मेरा सत्य वचन है। अतः सभी प्रयत्नोंसे पितृभक्तिपरायण होना चाहिये।

नवें या दसवें वर्ष अपने पितरोंके निमित्त प्राणीको दस हजार गायत्री-मन्त्रोंका जप करके दशांश होम करना चाहिये। नारायणबलि करके वृषोत्सर्गादि क्रियाएँ करनी चाहिये। ऐसा करनेसे मनुष्य सभी प्रकारके उपद्रवोंसे रहित हो जाता है, समस्त सुखोंका उपभोग करता है तथा उत्तम लोकको प्राप्त करता है और उसे जाति-प्राधान्य प्राप्त होता है। इस संसारमें माता-पिताके समान श्रेष्ठ अन्य कोई देवता नहीं है। अतः सदैव सम्यक् प्रकारसे अपने माता-पिताकी पूजा करनी चाहिये। हितकर बातोंका उपदेष्टा होनेसे पिता प्रत्यक्ष देवता है। संसारमें जो अन्य देवता हैं वे शरीरधारी नहीं हैं—

पितृमातृसमं लोके नास्त्यन्यद्दैवतं परम्।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन पूजयेत् पितरौ सदा॥
हितानामुपदेष्टा हि प्रत्यक्षं दैवतं पिता।
अन्या या देवता लोके न देहप्रभवो हि ताः ॥ (२१।२८-२९)

प्राणियोंका शरीर ही स्वर्ग एवं मोक्षका एकमात्र साधन है। ऐसा शरीर जिसके द्वारा प्राप्त हुआ है, उससे बढ़कर पूज्य कौन है ?

हे पक्षिन् ! ऐसा विचार करके मनुष्य जो-जो दान देता है उसका उपभोग वह स्वयं करता है, ऐसा वेदविद् विद्वानोंका कथन है। पुन्नामका जो नरक है उससे पिताकी रक्षा पुत्र करता है। उसी कारणसे इस लोक और परलोकमें उसे पुत्र कहा जाता है—

पुन्नामनरकाद्यस्मात् पितरं त्रायते सुतः।
तस्मात् पुत्र इति प्रोक्त इह चापि परत्र च॥ (२१।३२)

हे खगराज ! किसीके माता-पिताकी अकालमृत्यु हो जाय तो उसे व्रत, तीर्थ, वैवाहिक माङ्गलिक कार्य संवत्सरपर्यन्त नहीं करना चाहिये। जो मनुष्य प्रेत-लक्षण बतानेवाले इस स्वप्नाध्यायका अध्ययन अथवा श्रवण करता है, वह प्रेतका एक चिह्न नहीं देखता है। (अध्याय २१)


प्रेतयोनि दिलानेवाले निन्दित कर्म, पञ्चप्रेतोपाख्यान तथा प्रेतत्वप्राप्ति न करानेवाले श्रेष्ठ कर्म

श्रीगरुड़ने कहा— हे प्रभो ! प्रेतोंकी उत्पत्ति कैसे होती है ? वे कैसे चलते हैं ? उनका कैसा रूप और कैसा भोजन होता है ? वे किस प्रकार प्रसन्न होते हैं और उनका कहाँ निवास होता है? हे प्रसन्नचित्त देवेश ! कृपा कर मेरे इन प्रश्नोंका समाधान करें।

श्रीभगवान्ने कहा— हे पक्षिराज ! सुनो। जो पूर्वजन्मसंचित कर्मके अधीन रहकर पापकर्ममें

५३०संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड-

अनुरक्त रहते हैं, वे मृत्युके पश्चात् प्रेतयोनिमें जन्म लेते हैं। जो मनुष्य बावली, कूप, जलाशय, उद्यान, देवालय, प्याऊ, घर, आम्रादिक फलदार वृक्ष, रसोईघर, पितृ-पितामहके धर्मको बेच देता है, वह पापका भागी होता है। ऐसा व्यक्ति मरनेके बाद प्रलयकालतक प्रेतयोनिमें रहता है। जो लोग लोभवश गोचारणकी भूमि, ग्रामकी सीमा, जलाशय, उपवन और गुफाभागको जोत लेते हैं, वे प्रेत होते हैं।<sup></sup> पापियोंकी मृत्यु चण्डाल, जल, सर्पदंश, ब्राह्मण-शाप, विद्युत्-निपात, अग्नि, दन्त-प्रहार तथा पशुके आक्रमणसे होती है। जो लोग फाँसी लगानेसे, विषद्वारा और शस्त्रसे मरते हैं, जो आत्मघाती हैं, जिनकी विषूचिका (हैजा) आदि रोगोंसे मृत्यु होती है, जो क्षयादिक महारोग, पापजन्य रोग और चोर-डकैतोंके द्वारा मारे जाते हैं, जिनका मरनेपर संस्कार नहीं हुआ है, विहित आचारसे रहित, वृषोत्सर्गादिसे रहित और मासिक पिण्डदान जिनका लुप्त हो गया है, जिस मरे हुए प्राणीके लिये तृण, काष्ठ, हविष्य तथा अग्नि शूद्र लाता है, पर्वतों अथवा दीवालके ढहनेसे जिनकी मृत्यु हो जाती है, निन्दित दोषोंसे जिनकी मृत्यु होती है, जिनकी मृत्यु भूमिमें नहीं होती, जिनकी मृत्यु अन्तरिक्षमें होती है, जो भगवान् विष्णुका स्मरण न करते हुए मर जाते हैं, जिनकी मृत्यु सूतक और श्वानादि निकृष्ट योनियोंके संसर्गमें होती है, वे प्रेतयोनिमें जाते हैं।<sup></sup> इसी प्रकारके अन्य कारणोंसे जो प्राणी दुर्मृत्युको प्राप्त होते हैं, उनको प्रेतयोनिमें मरुस्थल प्रदेशमें भटकना पड़ता है।

हे तार्क्ष्य ! जो व्यक्ति निर्दोष माता, बहन, पत्नी, पुत्रवधू तथा कन्याका परित्याग करता है, वह निश्चित ही प्रेत होता है। जो भ्रातृद्रोही, ब्रह्मघाती, गोहन्ता, मद्यपी, गुरुपत्नीके साथ सहवास करनेवाला, स्वर्ण और रेशमका चोर है, वह प्रेतत्वको प्राप्त होता है। घरमें रखी हुई धरोहरका अपहारक, मित्रद्रोही, परस्त्रीरत, विश्वासघाती एवं क्रूर व्यक्ति अवश्य प्रेतयोनिमें जन्म लेता है। जो वंशपरम्परागत धर्मपथका परित्याग करके दूसरे धर्मको स्वीकार करनेवाला है, विद्या और सदाचारसे जो विहीन है, वह भी निस्संदेह प्रेत ही होता है।<sup></sup>

हे सुव्रत ! इस विषयमें एक प्राचीन इतिहास है, जो पितामह भीष्म और युधिष्ठिरके संवादमें कहा गया था। मैं उसीको कहता हूँ, उसे सुन करके मनुष्य सुख प्राप्त करता है।

युधिष्ठिरने कहा—हे पितामह ! प्राणी किस कर्मफलसे प्रेत होता है ? उसकी कैसे और किस उपायसे मुक्ति होती है ? इस बातको आप मुझे बतानेकी कृपा करें, जिसको सुन करके मैं पुनः


१-पापकर्मरता ये वै पूर्वकर्मवशानुगाः। जायन्ते ते मृताः प्रेतास्ताञ्छृणुष्व वदाम्यहम् ॥
वापीकूपतडागांश्च आरामं सुरमन्दिरम् । प्रपां सद्म सुवृक्षांश्च तथा भोजनशालिकाः ॥
पितृपैतामहं धर्मं विक्रीणाति स पापभाक् । मृतः प्रेत्वमाप्नोति यावदाभूतसम्प्लवम् ॥
गोचरं ग्रामसीमां च तडागारामगह्वरम् । कर्षयन्ति च ये लोभात् प्रेतास्ते वै भवन्ति हि ॥ (२२। ३—६)
२- असंस्कृतप्रमीता ये विहिताचारवर्जिताः ॥
वृषोत्सर्गादिलुप्ताश्च लुप्तमासि कपिण्डकाः । यस्यानयति शूद्रोऽग्निं तृणकाष्ठहवींषि सः ॥
पतनात् पर्वतानां च भित्तिपातेन ये मृताः। रजस्वलादिदोषैश्च न च भूमौ मृताश्च ये ॥
अन्तरिक्षे मृता ये च विष्णुस्मरणवर्जिताः। सूतकैः श्वादिसम्पर्कैः प्रेतभावा इह क्षितौ ॥ (२२। ९—१२)
३-मातरं भगिनीं भार्यां स्नुषां दुहितरं तथा। अदुष्टदोषां त्यजति स प्रेतो जायते ध्रुवम् ॥
भ्रातृध्रुग्ब्रह्महा गोघ्नः सुरापो गुरुतल्पगः । हेमक्षौमहरस्तार्क्ष्य स वै प्रेतत्वमाप्नुयात् ॥
न्यासापहर्ता मित्रध्रुक् परदाररतस्तथा। विश्वासघाती क्रूरस्तु स प्रेतो जायते ध्रुवम् ॥
कुलमार्गांश्च संत्यज्य परधर्मरतस्तथा। विद्यावृत्तविहीनश्च स प्रेतो जायते ध्रुवम् ॥ (२२ । १४—१७)

प्रेतकल्प ] प्रेतयोनि दिलानेवाले निन्दित कर्म ५३१


भ्रमित न हो सकूँ।

भीष्मने कहा—हे वत्स! मनुष्यको जैसे प्रेतयोनि प्राप्त होती है, वह जैसे उस योनिसे मुक्त होता है, जैसे वह दुस्तर घोर नरकमें जाता है, नरकमें जाकर दुःख झेल रहे प्राणियोंको जिसका नाम, गुण, कीर्तन और श्रवण करनेसे मुक्ति प्राप्त होती है, वह सब मैं तुम्हें बता रहा हूँ।

हे पुत्र! ऐसा सुना जाता है कि प्राचीनकालमें एक ख्यातिलब्ध संतसक नामक सुव्रत तपस्वी ब्राह्मण वनमें रहता था। दयावान्, योगयुक्त, स्वाध्यायरत, अग्निहोत्री उस द्विजश्रेष्ठका समय सदैव यज्ञादिक धार्मिक कृत्योंमें बीतता था। परलोकका भय उसे बहुत था, अतः ब्रह्मचर्य, सत्य, शौचका पालन करते हुए और निर्मलचित्त होकर वह तपस्यामें संलग्न रहता था। श्रद्धापूर्वक गुरुके उपदेश, अतिथि-पूजन तथा आत्मतत्त्वके चिन्तनमें अनुरक्त वह तपस्वी सांसारिक द्वन्द्वोंसे रहित था। इस संसारको जीतनेकी इच्छासे योगाभ्यासमें सदैव अपनेको वह समर्पित रखता था। इस प्रकारका आचरण करते हुए उस जितेन्द्रिय मुमुक्षु ब्राह्मणको वनमें ही बहुत-से वर्ष बीत गये। एक दिन तपस्वी संतसकके मनमें तीर्थाटनकी इच्छा उत्पन्न हुई। उसने मनमें यह संकल्प किया कि अब मैं तीर्थोंके पवित्र जलसे इस शरीरको पवित्र बनाऊँगा, अनन्तर वह स्नान तथा जप-नमस्कारादि कृत्योंको सम्पन्न कर सूर्योदय होनेपर वह तीर्थ-यात्रापर निकल पड़ा।

चलते-चलते वह महातपस्वी ब्राह्मण मार्ग भूल गया। भ्रान्त मार्गमें चलते हुए उसे अत्यन्त भयानक पाँच प्रेत दिखायी पड़े। उस निर्जन वनमें विकृत शरीरवाले भयंकर प्रेतोंको देखकर ब्राह्मणका हृदय कुछ भयभीत हो उठा। अतः वहींपर खड़े होकर वह विस्फारित नेत्रोंसे उसी ओर देखता रहा। तत्पश्चात् ब्राह्मणने अपने भयको दूरकर धैर्यका सहारा लिया और मधुर भाषामें पूछा—'हे विकृत मुखवालो! तुम सब कौन हो? कैसा पापकर्म तुम लोगोंने किया है, जिसके फलस्वरूप तुम्हें यह विकृति प्राप्त हुई है? तुम सब कहाँ जानेका निश्चय कर रहे हो?'

प्रेतराजने कहा—हे द्विजश्रेष्ठ! हम सभीने अपने-अपने कर्मके कारण प्रेतयोनिको प्राप्त किया है। परद्रोहमें रत होनेके कारण हम पाप और मृत्युके वशमें हुए। नित्य भूख-प्याससे पीड़ित रहकर यह प्रेत-जीवन बिता रहे हैं। हम लोगोंकी वाणी उसी पापसे विनष्ट हुई है, शरीर कान्तिहीन हो गया है, हम संज्ञाहीन और विकृत चित्तवाले हो गये हैं। हे तात! हमें दिशाओं तथा विदिशाओंका कोई ज्ञान नहीं है। पाप-कर्मसे पिशाच बने हुए हम मूढ़ प्राणी कहाँ जा रहे हैं, इसका भी ज्ञान हमें नहीं है। हम लोगोंके न माता हैं और न पिता हैं। अपने कर्मोंके फलस्वरूप, अत्यन्त दुःखदायी यह प्रेतयोनि हम सभीको प्राप्त हुई है। हे ब्रह्मन्! आपके दर्शनसे हम लोग अत्यधिक प्रसन्न हैं। आप मुहूर्तभर रुकें। आपसे हम अपना सम्पूर्ण वृत्तान्त प्रारम्भसे कहेंगे। उनमेंसे एक प्रेतने कहा—

हे विप्रदेव! मेरा नाम पर्युषित है, यह दूसरा सूचीमुख है, तीसरा शीघ्रग, चौथा रोधक और पाँचवाँ लेखक है।

ब्राह्मणने कहा—हे प्रेत! प्राणीको कर्मफलानुसार प्रेतयोनि मिलती है यह तो ठीक बात है, पर अपने जो नाम तुम बताते हो, उसके प्राप्त होनेका क्या कारण है?

प्रेतराजने कहा—हे द्विजश्रेष्ठ! मैंने सदैव सुस्वादु भोजन किया और ब्राह्मणको बासी अन्न दिया है, इस कारण मेरा नाम पर्युषित (बासी) है। भूखे ब्राह्मणकी याचनाको सुनकर यह शीघ्र ही वहाँसे

२४१- सपिण्डीकरण श्राद्धका महत्त्व, प्रतिवर्ष विहित मासिक श्राद्ध आदिकी अनिवार्यता, पति-पत्नीके सह-मरण आदिकी विशेष परिस्थितिमें पाक एवं पिण्डदान आदिकी विभिन्न व्यवस्थाका निरूपण तथा बभ्रुवाहनकी कथा

५३२संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड-

हट जाता था, इसलिये यह शीघ्रग नामका प्रेत हुआ। अन्नादिकी आकांक्षासे इसने बहुत-से ब्राह्मणोंको पीड़ित किया था, इस कारण यह सूचीमुख नामक प्रेत हो गया। इसने पोष्यवर्ग एवं ब्राह्मणोंको दिये बिना अकेले ही मिष्टान्न खाया था, इसलिये इसको रोधक कहा गया है। यह कुछ माँगनेपर मौन धारण करके पृथ्वी कुरेदने लगता था, अतः उस कर्मफलके अनुसार यह लेखक कहलाया।

हे ब्राह्मण! कर्मभावसे ही प्रेतत्व और इस प्रकारके नामकी प्राप्ति हुई है। यह लेखक मेषमुख, रोधक पर्वताकार मुखवाला, शीघ्रग पशुकी तरह मुखवाला और सूचक सुईके समान मुखवाला है, इसके बेढंगे रूपको देखें। हे नाथ! हम अत्यन्त दुःखित हैं। मायावी रूप बनाकर हम लोग पृथ्वीपर विचरण करते हैं। हम सभी अपने ही कर्मसे विकृत आकारवाले, लम्बे ओठवाले, विकृत मुखवाले और बृहद् शरीरवाले तथा भयावह हो गये हैं। हे विप्र! यह सब मैंने आपसे प्रेतत्वका कारण बता दिया है। आपके दर्शनसे हम सभीमें ज्ञान उत्पन्न हो गया है, आपकी जिस बातको सुननेकी अभिरुचि हो, वह आप पूछें, उसे मैं आपको बतानेके लिये तैयार हूँ।

ब्राह्मणने कहा— हे प्रेतराज! पृथ्वीपर जो भी जीव जीते हैं, वे सब आहारसे ही जीवित रहते हैं। यथार्थरूपमें तुम लोगोंके भी आहारको सुननेकी मेरी इच्छा है।

प्रेतोंने कहा— हे द्विजराज! यदि आपकी श्रद्धा हमारे आहारको जाननेकी है तो सावधान हो करके आप सुनें।

हम सभीका आहार समस्त प्राणियोंके लिये निन्दनीय है, जिसको सुनकर आप बार-बार निन्दा करेंगे। प्राणियोंके शरीरसे निकले हुए कफ, मूत्र और पुरीषादि मल एवं अन्य प्रकारसे उच्छिष्ट भोजन प्रेतोंका आहार है। जो घर अपवित्र रहते हैं, जिनकी घरेलू सामग्रियाँ इधर-उधर बिखरी रहती हैं, जिन घरोंमें प्रसूतादिके कारण मलिनता बनी रहती है, वहींपर प्रेत भोजन करते हैं। जिस घरमें सत्य, शौच और संयम नहीं होता, पतित एवं दस्युजनोंका साथ है, उसी घरमें प्रेत भोजन करते हैं। जो घर भूतादिक बलि, देवमन्त्रोच्चार, अग्निहोत्र, स्वाध्याय तथा व्रतपालनसे हीन है, प्रेत उसमें ही भोजन करते हैं। जो घर लज्जा एवं मर्यादासे रहित है, जिसका स्वामी स्त्रीसे जीत लिया गया है, जहाँ माता-पिता और गुरुजनोंकी पूजा नहीं होती है, प्रेत वहाँ ही भोजन करते हैं। जिस घरमें नित्य लोभ, क्रोध, निद्रा, शोक, भय, मद, आलस्य तथा कलह—ये सब दुर्गुण विद्यमान रहते हैं, वहाँ प्रेत भोजन करते हैं। हे दृढ़व्रत तपोनिधि विप्रदेव! हम सब इस प्रेतभावसे दुःखित हैं, जिससे प्रेतयोनि प्राप्त न हो वह हमें बतायें। प्राणीकी नित्य मृत्यु हो वह अच्छा है पर उसे कभी भी प्रेतयोनि न प्राप्त हो।

ब्राह्मणने कहा— नित्य उपवास रखकर कृच्छ्र एवं चान्द्रायणव्रतमें लगा हुआ तथा अनेक प्रकारसे अन्य व्रतोंसे पवित्र मनुष्य प्रेत नहीं होता है। जो व्यक्ति जागरणसहित एकादशीव्रत करता है और अन्य सत्कर्मोंसे अपनेको पवित्र रखता है, वह प्रेत नहीं होता है। जो प्राणी अश्वमेधादि यज्ञोंको सम्पन्न करके नाना प्रकारके दान देता है तथा क्रीडा, उद्यान, वापी एवं जलाशयका निर्माता है, ब्राह्मणकी कन्याओंका यथाशक्ति विवाह कराता है, विद्यादान और अशरणको शरण देनेवाला है, वह प्रेत नहीं होता है।*


* उपवासपरो नित्यं कृच्छ्रचान्द्रायणे रतः। व्रतैश्च विविधैः पूतो न प्रेतो जायते नरः ॥
एकादश्यां व्रतं कुर्वञ्जागरेण समन्वितम्। अपरैः सुकृतैः पूतो न प्रेतो जायते नरः ॥
इष्ट्वा वै वाश्वमेधादीन् दद्याद् दानानि यो नरः। आरामोद्यानवाप्यादेः प्रपायाश्चैव कारकः ॥
कुमारीं ब्राह्मणानां तु विवाहयति शक्तितः। विद्यादोऽभयदश्चैव न प्रेतो जायते नरः ॥ (२२।६४-६७)

प्रेतकल्प ] प्रेतबाधाजन्य विविध स्वप्न तथा उसका प्रायश्चित्तविधान ५३३

खाये हुए शूद्रान्नके जठरस्थित रहते हुए जिसकी मृत्यु हो जाती है या जो दुर्मृत्युसे मरता है, वह प्रेत होता है। जो अयाज्यका याजक तथा मद्यपीका साथ करके मदिरा पीनेवाली स्त्रीका संसर्ग करता है और अज्ञानवश भी मांस खाता है, वह प्रेत होता है। जो देवता, ब्राह्मण और गुरुके धनका अपहारक है, जो धन लेकर अपनी कन्या देता है, वह प्रेत होता है। जो माता, भगिनी, स्त्री, पुत्रवधू तथा पुत्रीका बिना कोई दोष देखे परित्याग कर देता है, उसे भी प्रेत होना पड़ता है। जो विश्वासपर रखी हुई परायी धरोहरका अपहर्ता है, मित्रद्रोही है, सदैव परायी स्त्रीमें अनुरक्त रहता है, विश्वासघाती और कपटी है, वह प्रेतयोनिमें जाता है, जो प्राणी भ्रातृद्रोही, ब्रह्महन्ता, गोहन्ता, मद्यपी, गुरुपत्नीगामी, इनका संसर्गी और वंशपरम्पराका परित्याग करके सदा झूठ बोलता रहता है, स्वर्णकी चोरी तथा भूमिका अपहरण करता है, वह प्रेत होता है।*

**भीष्मने कहा—**हे युधिष्ठिर ! इस प्रकार ब्राह्मण संतसक ऐसा कह ही रहा था कि आकाशमें दुन्दुभि बजने लगी। देवोंने उस ब्राह्मणके ऊपर फूलोंकी वर्षा की। प्रेतोंके लिये वहाँ पाँच देवविमान आ गये। विधिवत् उस ब्राह्मणकी आज्ञा लेकर वे सभी प्रेत दिव्य विमानोंमें बैठकर स्वर्ग चले गये। इस प्रकार ब्राह्मणके द्वारा प्राप्त ज्ञान एवं उसके साथ सम्भाषण एवं पुण्य-संकीर्तनके प्रभावसे उन सभी प्रेतोंका पाप विनष्ट हो गया और उन्हें परम पदकी प्राप्ति हुई।

**सूतजीने कहा—**इस आख्यानको सुनकर गरुड़जी पीपल-पत्रके समान काँप उठे। उन्होंने पुनः मनुष्योंके कल्याणके लिये श्रीभगवान् विष्णुसे पूछा।

(अध्याय २२)


प्रेतबाधाजन्य विविध स्वप्न तथा उसका प्रायश्चित्तविधान

**श्रीगरुड़ने कहा—**हे देवेश ! पिशाचयोनिमें रहनेवाले प्रेत क्या-क्या करते हैं ? वे क्या कहते हैं ? उसे आप कहिये।

**श्रीभगवान्‌ने कहा—**हे पक्षिराज ! उनका जैसा स्वरूप है, जो उनकी पहचान है और जिस प्रकार वे स्वप्न दिखाते हैं, वह सब मैं तुम्हें सुनाता हूँ। भूख-प्याससे दुःखित वे अपने घरमें प्रवेश करते हैं। उसी वायुरूपी देहमें प्रविष्ट होकर अपने वंशजोंको अपना चिह्न दिखाते हैं। प्रेत अपने पुत्र, अपनी स्त्री तथा अपने बन्धु-बान्धवोंके पास


* देवद्रव्यं च ब्रह्मस्वं गुरुद्रव्यं तथैव च। कन्यां ददाति शुक्लेन स प्रेतो जायते नरः॥
मातरं भगिनीं भार्यां स्नुषां दुहितरं तथा। अदृष्टदोषास्त्यजति स प्रेतो जायते नरः॥
न्यासापहर्ता मित्रध्रुक्परदाररतः सदा। विश्वासघाती कूटश्च स प्रेतो जायते नरः॥
भ्रातृध्रुग्ब्रह्महा गोघ्नः सुरापो गुरुतल्पगः। कुलमार्गं परित्यज्य ह्यनृतोक्तौ सदा रतः।
हर्ता हेम्नश्च भूमेश्च स प्रेतो जायते नरः॥ (२२। ७१–७४)

५३४संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड-

जाता है और अश्व, हाथी, बैल अथवा मनुष्यका विकृत रूप धारण करके वह स्वप्नमें दिखायी देता है। जो व्यक्ति सोकर उठनेपर अपनेको शय्यापर विपरीत स्थितिमें देखता है, वह अवस्थिति प्रेतयोनिके कारण हुई है, ऐसा मानना चाहिये। यदि स्वप्नमें अपने-आपको जंजीरमें बँधा हुआ देखे और मरा हुआ पूर्वज निन्दनीय वेषमें दिखायी दे, खाते हुए व्यक्तिका अन्न लेकर भाग जाय और प्याससे पीड़ित वह अपना या परायेका जलपान कर ले तो उसे पिशाचयोनिमें गया हुआ मानें।

यदि स्वप्नमें वह बैलकी सवारी करता है, बैलोंके साथ कहीं जाता है, डरकर आकाश या भूखसे व्याकुल होकर तीर्थमें चला जाता है, अपनी वाणीसे गौ, बैल, पक्षी और घोड़ेकी भाषामें बोलता है, उसे हाथी, देव, भूत, प्रेत तथा निशाचरके चिह्न दिखायी देते हैं तो उसे पिशाच योनि प्राप्त हुआ ही मानें।

हे पक्षीन्द्र ! प्राणीको स्वप्नमें प्रेतयोनिसे सम्बन्धित बहुत-से चिह्न दिखायी देते हैं। जो स्वप्नमें अपनी जीवित स्त्री, अपने जीवित भाई, पुत्र या पुत्रीको मरा हुआ देखे तो उसे प्रेतदोष समझना चाहिये। प्रेतदोषसे ही व्यक्ति स्वप्नमें भूख-प्याससे व्यथित होकर दूसरेसे याचना करता है तथा तीर्थमें जाकर पिण्डदान करता है। यदि स्वप्नमें घरसे निकलते हुए पुत्र, पिता, भ्राता, पति तथा पशु दिखायी दे तो ऐसा प्रेतदोषसे दिखायी देता है।

हे द्विजराज ! स्वप्नमें ऐसे चिह्न दिखायी देनेपर प्रायश्चित्त करनेका विधान बताया गया है। घर या तीर्थमें स्नान करके मनुष्य बेलके वृक्षमें जल-तर्पण करे तथा वेदपारंगत ब्राह्मणकी सम्यक् पूजा करके उन्हें काले धान्यका दान दे, तदनन्तर यथाशक्ति हवन करके गरुडमहापुराणका पाठ करे। जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक प्रेतचिह्न बतानेवाले इस अध्यायका पाठ करता है अथवा सुनता है, उसका प्रेतदोष स्वतः ही नष्ट हो जाता है। (अध्याय २३)


अल्पमृत्युके कारण तथा बालकोंकी अन्त्येष्टिक्रियाका निरूपण

श्रीगरुडने कहा— हे प्रभो! वेदका यह कथन है कि अकालमें किसीकी मृत्यु नहीं होती है तो फिर राजा या श्रोत्रिय ब्राह्मण किस कारणसे अकाल मृत्युको प्राप्त होते हैं। ब्रह्माने जैसा पहले कहा था, वह असत्य दिखायी देता है। हे भगवन् ! वेदोंमें यह कहा गया है कि मनुष्य सौ वर्षतक जीवित रहता है। इस भारतवर्षमें ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्यवर्णवाली द्विजातियाँ, शूद्र और म्लेच्छ रहते है, किस कारणसे कलिकालमें ये शतायु नहीं देखे जाते। बालक, धनवान्, निर्धन, सुकुमार, मूर्ख, ब्राह्मण, अन्य वर्णवाले, तपस्वी, योगी, महाज्ञानी, सर्वज्ञानरत, लक्ष्मीवान्, धर्मात्मा, अद्वितीय पराक्रमी—जो कोई भी हों इस वसुधातलपर अवश्य मृत्युको प्राप्त करते हैं। इनके गर्भमें आनेके साथ ही इनके पीछे मृत्यु लगी रहती है। इसका क्या कारण है?

श्रीभगवान्‌ने कहा— हे महाज्ञानी गरुड ! तुम्हें साधुवाद है। तुम मेरे प्रिय भक्त हो। अतः प्राणीकी मृत्युसे सम्बन्धित गोपनीय बातको सुनो।

हे पक्षिराज कश्यपपुत्र महातेजस्वी गरुड ! विधाताद्वारा निश्चित की गयी मृत्यु प्राणीके पास आती है और शीघ्र ही उसे लेकर यहाँसे चली जाती है। प्राचीन कालसे ही वेदका यह कथन है कि मनुष्य सौ वर्षतक जीवित रहता है, किंतु जो व्यक्ति निन्दित कर्म करता है वह शीघ्र ही विनष्ट हो जाता है, जो वेदोंका ज्ञान न होनेके कारण

प्रेतकल्प ] अल्पमृत्युके कारण तथा बालकोंकी अन्त्येष्टिक्रियाका निरूपण ५३५


वंशपरम्पराके सदाचारका पालन नहीं करता है, जो आलस्यवश कर्मका परित्याग कर देता है, जो सदैव त्याज्य कर्मको सम्मान देता है, जो जिस-किसीके घरमें भोजन कर लेता है और जो परस्त्रीमें अनुरक्त रहता है, इसी प्रकारके अन्य महादोषोंसे मनुष्यकी आयु क्षीण हो जाती है। श्रद्धाहीन, अपवित्र, नास्तिक, मङ्गलका परित्याग करनेवाले, परद्रोही, असत्यवादी ब्राह्मणको मृत्यु अकालमें ही यमलोक ले जाती है। प्रजाकी रक्षा न करनेवाला, धर्माचरणसे हीन, क्रूर, व्यसनी, मूर्ख, वेदानुशासनसे पृथक् और प्रजापीड़क क्षत्रियको यमका शासन प्राप्त होता है। ऐसे दोषी ब्राह्मण एवं क्षत्रिय मृत्युके वशीभूत हो जाते हैं और यम-यातनाको प्राप्त करते हैं। जो अपने कर्मोंका परित्याग तथा जितने मुख्य आचरण हैं, उनका परित्याग करता है और दूसरेके कर्ममें निरत रहता है वह निश्चित ही यमलोक जाता है।<sup></sup> जो शूद्र द्विज-सेवाके बिना अन्य कर्म करता है, वह यमलोक जाता है। तदनन्तर वह उत्तम-मध्यम या अधम कोटिवाले यमलोकमें पहुँचकर दुःख भोगता है।

जिस दिन स्नान, दान, जप, होम, स्वाध्याय और देवपूजन नहीं होता है, मनुष्योंका वह दिन व्यर्थ ही जाता है—

स्नानं दानं जपो होमो स्वाध्यायो देवतार्चनम्॥
यस्मिन् दिने न सेव्यन्ते स वृथा दिवसो नृणाम्।
(२४। १७-१८)

रसोद्भूत यह शरीर अनित्य, अध्रुव तथा आधारहीन है।

हे पक्षीन्द्र ! अब मैं अन्न और जलसे बने हुए इस शरीरके गुणोंका वर्णन करता हूँ।

प्रातःकाल संस्कृत (सुपाचित) अन्न निश्चित ही सायंकाल नष्ट हो जाता है, अतः उस अन्नके रससे पुष्ट शरीरमें नित्यता कैसे आ सकती है<sup></sup>? हे गरुड ! अपने प्राकृत कर्मोंके अनुसार शरीर तो मिल चुका है, इस तरह यथायोग्य शरीर-निर्माणरूप आधा कार्य तो हो चुका है, पर आगे दुष्कर्मोंसे बचनेके लिये एवं अपनी सुरक्षाके लिये परम औषधका सेवन करना चाहिये। क्या यह शरीर अन्नदाता पिता या जन्म देनेवाली माताका है अथवा उन दोनोंका है? यह राजाका है या बलवान्‌का है, अग्नि अथवा कुत्तेका है? कीटाणु, विष्ठा अथवा भस्मके रूपमें परिणत होनेवाले इस शरीरके लिये श्रेष्ठतम यज्ञ कौन हो सकता है? पाप-विनाशके निमित्त प्राणीको उत्कृष्ट यत्न करना चाहिये। जीवने अनेक बार इस संसारमें जन्म ग्रहणकर मन, वाणी और शरीरके द्वारा पापकर्म किया है। मनुष्य-जन्म मिलनेपर प्राणीको पूर्व सभी जन्मोंके पापोंका स्मरण करके तपके द्वारा उन्हें विनष्ट करनेका प्रयास करना चाहिये। कर्मके अनुसार प्राप्त होनेवाले गर्भवासके महान् कष्टको देखकर भी जो मनुष्य पुनः गर्भवासमें आता है अर्थात् मानवयोनिमें ही उससे मुक्तिका प्रयास नहीं करता, वह पातकी अण्डजादि योनियोंमें जहाँ-जहाँ जाता है, वहीं आधियाँ-व्याधियाँ, क्लेश और वृद्धावस्थाजनित रूप-परिवर्तन होते रहते हैं।<sup></sup>


१-विधातृविहितो मृत्युः शीघ्रमादाय गच्छति। ततो वक्ष्यामि पक्षीन्द्र काश्यपेय महाद्युते ॥
मानुषः शतजीवीति पुरा वेदेन भाषितम्। विकर्मणः प्रभावेण शीघ्रं चापि विनश्यति ॥
वेदानभ्यसनेनैव कुलाचारं न सेवते। आलस्यात्कर्मणां त्यागो निषिद्धेऽप्यादरः सदा ॥
यत्र तत्र गृहेऽश्नाति परक्षेत्ररतस्तथा। एतैरन्यैर्महादोषैर्जायते चायुषः क्षयः॥
अश्रद्धधानमशुचिं नास्तिकं त्यक्तमङ्गलम्। परद्रोहानृतकरं ब्राह्मणं यत (म) मन्दिरम् ॥
अरक्षितारं राजानं नित्यं धर्मविवर्जितम्। क्रूरं व्यसनिनं मूर्खं वेदवादबहिष्कृतम् ॥
२-यत्प्रातः संस्कृतं सायं नूनमन्नं विनश्यति॥ तदीयरससम्पृष्टकाये का बत नित्यता। (२४। ९—१४)
३-कर्तव्यः परमो यत्नः पातकस्य विनाशने। अनेकभवसम्भूतं पातकं तु त्रिधा कृतम्॥ (२४। १९-२०)
यदा प्राप्नोति मानुष्यं तदा सर्वं तपत्यपि। सर्वजन्मानि संस्मृत्य विषादी कृतचेतनः॥
अवेक्ष्य गर्भवासांश्च कर्मजा गतयस्तथा। मानुषोदरवासी चेत्तदा भवति पातकी॥
अण्डजादिषु भूतेषु यत्र यत्र प्रसर्पति। आधयो व्याधयः क्लेशा जरारूपविपर्ययः॥ (२४। २३-२६)

५३६संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड-

हे द्विजोत्तम (पक्षिश्रेष्ठ)! गर्भवाससे निकला हुआ प्राणी अज्ञानरूपी अन्धकारसे आच्छन्न हो जाता है। बाल्यावस्थामें रहनेके कारण वह सदसत्‌का कुछ भी ज्ञान नहीं रखता है। यौवनान्धकारसे वह अन्धा हो जाता है। इस बातको जो देखता है वह मुक्तिका भागी होता है। प्राणी चाहे बालक हो चाहे युवा हो अथवा वृद्ध हो, वह जन्म लेनेके बाद मृत्युको अवश्य प्राप्त होता है। धनी-निर्धन, सुकुमार, कुरूप, मूर्ख, विद्वान्, ब्राह्मण या अन्य वर्णवाले जनोंकी भी वही स्थिति होती है। मनुष्य चाहे तपस्वी, योगी, परमज्ञानी, दानी, लक्ष्मीवान्, धर्मात्मा, अतुलनीय पराक्रमी कोई भी हो मृत्युसे नहीं बच सकता है। बिना मनुष्यदेहको प्राप्त किये सुख-दुःखका अनुभव नहीं किया जा सकता है। व्यक्ति प्राकृत कर्मके पाशमें बँधकर मृत्युको प्राप्त करता है। गर्भसे लेकर पाँच वर्षतक मनुष्यके ऊपर पापका अल्प प्रभाव पड़ता है, किंतु उसके बाद वह यथायोग्य पापके न्यूनाधिक प्रभावका भागी होता है। इस प्रकार प्राणीको बार-बार इस संसारमें आना-जाना पड़ता है। इस पृथ्वीपर मरा हुआ मनुष्य दानादि सत्कर्मोंके प्रभावसे पुनः जन्म लेकर अधिक दिनोंतक जीवित रहता है।*

सूतजीने कहा— भगवान् कृष्णके ऐसे वचनको सुनकर गरुडजीने यह कहा—

गरुडने कहा— हे प्रभो! बालककी मृत्यु हो जानेपर पिण्डदानादि क्रियाओंको कैसे करना चाहिये? यदि विपन्नावस्थामें फँसे हुए भ्रूणकी मृत्यु गर्भमें ही हो जाती है अथवा चूडाकरणके बीच शिशु मर जाता है तो कैसे, किसके द्वारा दान दिया जाना चाहिये? मृत्युके बाद कौन-सी विधि है?

गरुडके ऐसे वाक्यको सुनकर भगवान् विष्णुने कहा—

हे गरुड! यदि स्त्रीका गर्भपात हो जाय अथवा गर्भस्राव हो जाय तो जितने मासका गर्भ होता है, उतने दिनका अशौच मानना चाहिये। आत्मकल्याणकी इच्छा रखनेवाले व्यक्तिको उसके लिये कुछ भी नहीं करना चाहिये। यदि जन्मसे लेकर चूडाकरण-संस्कारके बीच बालककी मृत्यु हो जाती है तो उसके निमित्त यथाशक्ति बालकोंको दूधका भोजन देना चाहिये। यदि चूडाकरण संस्कार होनेके बाद पाँच वर्षतक बालककी मृत्यु होती है तो शरीरदाहका विधान है, उसके लिये दूध देना चाहिये और बालकोंको भोजन कराना चाहिये। पाँच वर्षसे अधिक आयुवाले बालककी मृत्यु होनेपर अपनी जातिके लिये विहित समस्त और्ध्वदेहिक क्रियाओंको सम्पन्न करना अपेक्षित है। ऐसे मृत बालकके कल्याणार्थ जलपूर्ण कुम्भ तथा खीरका दान करना चाहिये; क्योंकि उसका ऋणानुबन्ध हो जाता है।

हे पक्षीन्द्र! जन्म लेनेवालेकी मृत्यु और मृत्युको प्राप्त हुए प्राणीका जन्म निश्चित है। अतः पुनः शरीरका जन्म न हो इसके लिये व्यक्तिको जीवनकालमें जो कुछ अच्छा लगता था, उसीका दान करना चाहिये। ऐसा न करनेपर उस प्राणीका जन्म निर्धनकुलमें होता है। वह स्वल्पायु और


* गर्भावासादद्विनिर्मुक्तस्त्वज्ञानतिमिरावृतः । न जानाति खगश्रेष्ठ बालभावं समाश्रितः ॥
यौवने तिमिरान्धश्च यः पश्यति स मुक्तिभाक् । आधानान्मृत्युमाप्नोति बालो वा स्थविरो युवा ॥
सधनो निर्धनश्चैव सुकुमारः कुरूपवान् । अविद्वांश्चैव विद्वांश्च ब्राह्मणस्त्वितरो जनः ॥
तपोरतो योगशीलो महाज्ञानी च यो नरः । महादानरतः श्रीमान् धर्मात्मातुलविक्रमः ।
विना मानुषदेहं तु सुखं दुःखं न विन्दति ॥
प्राकृतैः कर्मपाशैस्तु मृत्युमाप्नोति मानवः । आधानात्पञ्च वर्षाणि स्वल्पपापैर्विपच्यते ॥
पञ्चवर्षाधिको भूत्वा महापापैर्विपच्यते । योनिं पूरयते यस्मान्मृतोऽप्यायाति याति च ॥
मृतो दानप्रभावेण जीवन्मर्त्यश्चिरं भुवि । (२४। २७-३३)

प्रेतकल्प ] बालकोंकी अन्त्येष्टिक्रियाका स्वरूप ५३७


निर्धन होकर प्रेम तथा भक्तिसे दूर रहता है। उसे पुनर्जन्म प्राप्त होता है, अतः मृत शिशुके लिये यथेप्सित दान आवश्यक है। ऐसा होनेपर ब्राह्मण-बालकोंको मिष्टान्न-भोजन अवश्य देना चाहिये। पुराणमें इससे सम्बन्धित जिस गाथाका गान हुआ है सब प्रकारसे वह मुझे सत्य प्रतीत होती है। गाथा इस प्रकार है—

भोज्ये भोजनशक्तिश्च रतिशक्तिर्वरस्त्रियः॥
विभवे दानशक्तिश्च नाल्पस्य तपसः फलम्।
दानाद्भोगानवाप्नोति सौख्यं तीर्थस्य सेवनात्।
सुभाषान्मृतो यस्तु स विद्वान्धर्मवित्तमः॥
अदत्तदानाच्च भवेद्दरिद्रो
दरिद्रभावाच्च करोति पापम्।
पापप्रभावान्नरकं प्रयाति
पुनर्दरिद्रः पुनरेव पापी॥
(२४।४४–४६)

भोज्य वस्तु एवं भोजनशक्ति, रतिशक्ति रहनेपर श्रेष्ठ स्त्रीकी प्राप्ति तथा धन-वैभव एवं दानशक्ति—ये तीनों अल्प तपस्याका फल नहीं हैं, ऐसा साथ-साथ होना बड़ा ही दुर्लभ है। दान देनेसे प्राणीको भोगोंकी प्राप्ति होती है। तीर्थसेवनसे सुख मिलता है और सुभाषण करता हुआ जो मरता है, वह विद्वान् धर्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ है। दान न देनेपर प्राणी दरिद्र होता है, दरिद्र होनेपर पाप करता है, पापके प्रभावसे नरकमें जाता है, तदनन्तर बार-बार वह दरिद्र एवं पापी बनता जाता है। (अध्याय २४)


बालकोंकी अन्त्येष्टिक्रियाका स्वरूप, सत्पुत्रकी महिमा तथा औरस और क्षेत्रज आदि पुत्रोंद्वारा अन्त्येष्टि करनेका फल

श्रीविष्णुने कहा—हे गरुड! इसके बाद अब मैं पुरुष-स्त्रीका निर्णय कहूँगा। बालक जीवित हो अथवा मृत्युको प्राप्त हो गया हो, पाँच वर्षसे अधिक अवस्था हो जानेपर उसमें पुरुषत्व प्रतिष्ठित हो जाता है। वह अपनी समस्त इन्द्रियोंको जान लेता है और रूप तथा कुरूपके विपर्ययको जाननेकी क्षमता भी उसमें आ जाती है। पूर्वजन्मार्जित कर्मफलसे प्राणियोंका वध और बन्धन होता है। पाप ही सभी लोगोंको नष्ट करता है।

हे पक्षिराज! गर्भके नष्ट होनेपर कोई और्ध्वदैहिक क्रिया नहीं है। शिशुकी मृत्यु होनेपर दुग्धका दान देना चाहिये, शैशवके बादकी अवस्थामें बालककी मृत्यु होनेपर पायस तथा खीरका दान देना चाहिये। कुमारकी अवस्थामें मृत्यु होनेपर एकादशाह, द्वादशाह, वृषोत्सर्ग तथा महादानको छोड़कर अन्य सभी और्ध्वदैहिक कृत्य करनेका आदेश किया गया है। मरे हुए कुमार और बालकोंके निमित्त भोजन-वस्त्र तथा वेष्टन देना चाहिये। बाल, वृद्ध अथवा तरुणके मरनेपर घट-बन्धन करना चाहिये।

हे खगश्रेष्ठ! दो माह कम दो वर्षतकके बालककी मृत्यु होनेपर उसको पृथ्वीमें गड्ढा खोदकर गाड़ देना चाहिये, इससे अधिक आयुवाले मृत बालकके लिये दाह-संस्कारका ही विधान उत्तम है। सभी शास्त्रोंमें जन्मसे लेकर दाँत निकलनेतककी अवस्थावाले बच्चेको शिशु, चूड़ाकरण-संस्कारतककी अवस्थावालेको बालक और उपनयन-संस्कारतककी आयुवालेको कुमार कहा गया है।

हे गरुड! उपनयन-संस्कारका विधान न होनेके कारण शूद्रादिका अन्तिम संस्कार कैसे होना चाहिये? यह संशय है। गर्भाधानसे नौ मासतकके कालको छोड़कर सोलह मासतकके

५३८संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड—

बच्चेको शिशु, सत्ताईस मासतकके अवस्थाप्राप्त बच्चेको बालक, पाँच वर्षकी आयुवालेको कुमार, नौ वर्षवालेको पौगण्ड, सोलह वर्षवालेको किशोर और उसके बादका यौवन-काल है। पाँच वर्षकी अल्पायुमें मृत कुमार चाहे उसका व्रतबन्ध हुआ हो अथवा न हुआ हो, वह पूर्वकथित विधानके अनुसार दशपिण्ड-कृत्यकी कामना करता है। स्वल्प कर्म, स्वल्प प्रसंग, स्वल्प विषयबन्धन, स्वल्प शरीर तथा स्वल्प वस्त्रके कारण प्राणी स्वल्प क्रियाकी इच्छा करता है।<sup></sup> जीव जबतक वृद्धिकी ओर बढ़ रहा हो, जबतक वह सांसारिक विषय-वासनाओंसे घिरा हो, तबतक उसे अपने उस मृत परिजनको वे सभी भोज्य पदार्थ और आवश्यक वस्तुएँ देनी चाहिये, जो उसके लिये उपजीव्य<sup></sup> और इच्छित थीं।

हे खगेश! चाहे बालक हों या वृद्ध हों अथवा युवा हों सभी प्राणी घटकी इच्छा करते हैं। सर्वत्रगामी देही जीवात्मा सदैव सुख-दुःखका अनुभव करता है। जिस प्रकार साँप अपनी पुरानी केंचुलका परित्याग कर देता है, उसी प्रकार जीव अपने पुराने शरीरका परित्याग कर अंगुष्ठमात्र परिमाणवाला होकर तथा वायुभूत हो भूखसे पीड़ित हो जाता है। अतः बालककी भी मृत्यु होनेपर निश्चित ही दान देना चाहिये। जन्मसे लेकर पाँच वर्षतककी अवधिमें मरा हुआ प्राणी दानमें दिये गये असंस्कृत<sup></sup> भोजनका उपभोग करता है। यदि पाँच वर्षसे अधिक आयुवाले बालककी मृत्यु हो जाती है तो वृषोत्सर्ग और सपिण्डीकरणको छोड़कर द्वादशाहके आनेपर षोडश श्राद्ध करने चाहिये। उस दिन यथाक्रम पायस (खीर)-से बने पिण्डका दान देना चाहिये। यह पिण्डदान गुड़से भी किया जा सकता है। उसी दिन सान्नोदक कुम्भ और पददान देना चाहिये। ब्राह्मणको भोजन कराना चाहिये और यथाशक्ति महादानादि भी करने चाहिये। पक्षिश्रेष्ठ! दीप-दानादि जो कुछ शेष कर्म हैं उन्हें पाँच वर्षसे अधिक आयुवाले कुमारकी मृत्यु होनेपर करना चाहिये।

हे पक्षिराज! व्रतबन्ध (यज्ञोपवीत) होनेसे पहले जिसका मरण हुआ है उसकी संतृप्तिके लिये पूर्वोक्त कर्म करना चाहिये। यदि मनुष्यके द्वारा सारी क्रिया नहीं की जाती है तो वह जीव पिशाच हो जाता है। व्रतबन्धके पूर्व मृत बालकके लिये पूर्वोक्त सब कर्म करना चाहिये। उसके बाद 'स्वाहा' शब्दसे समन्वित मन्त्रके द्वारा षोडश एकोद्दिष्ट श्राद्ध करे। ऋजु<sup></sup> कुशसे श्वेत तिलके द्वारा अपसव्य होकर समस्त क्रिया करनेसे पितृगण परम गतिको प्राप्त करते हैं और दीर्घायु होकर पुनः अपने ही कुलमें जन्म लेते हैं।

सभी प्रकारके सुखोंको प्रदान करनेवाला पुत्र माता-पिताके प्रेमका अभिवर्धक होता है। जैसे एक आकाश, एक चन्द्र और एक आदित्य आश्रय-भेदसे पृथक्-पृथक् घटादिमें दिखायी देते हैं, वैसे ही पिताका आत्मा सभी पुत्रोंमें सदैव विचरण करता रहता है। जिसकी जो प्रकृति शुक्र-शोणित-संगमके पूर्व होती है, वही पुत्रोंमें आकर संनिहित हो जाती है। वैसे ही वे अपने जीवनमें कर्म करते हैं। किसीका पुत्र पिताका रूप लेकर उत्पन्न होता है, पिताकी अपेक्षा कोई अत्यधिक


१-जिस व्यक्तिका मरण हुआ है वह अपनी अवस्थाके अनुसार एवं अपने कर्मोंके अनुसार जिस मात्रामें, जिस रूपमें अन्न, वस्त्र आदिसे तुष्ट होता रहा है उसी मात्रामें, उसी रूपमें उसकी और्ध्वदैहिक क्रियामें अन्न, वस्त्र आदि देना चाहिये।
२-पुष्टि एवं तृप्तिके लिये उपयोगी।
३-मन्त्र आदिके बिना दिया हुआ अन्न।
४-पवित्रक या मोटक आदिके बिना बनाये ही कुशका उपयोग ऋजु कुश है।

२४२- प्रेतत्वमुक्तिके उपाय

प्रेतकल्प ] बालकोंकी अन्त्येष्टिक्रियाका स्वरूप ५३१


रूपवान्, गुणवान् तथा दानपरायण होता है। इस संसारमें कोई भी प्राणी एक-समान न हुआ है और न होगा। अन्धेसे अन्धा, गूँगेसे गूँगा, बहिरेसे बहिरा तथा विद्वान्‌से विद्वान् जन्म नहीं लेता है। इस सृष्टिमें कहीं भी अनुरूपता दिखायी नहीं देती।

गरुडने कहा—औरस और क्षेत्रज आदि दस प्रकारके पुत्र माने गये हैं। जो संगृहीत (कहींसे प्राप्त) तथा दासीसे उत्पन्न हुआ है, उससे मनुष्यको क्या लाभ प्राप्त हो सकता है? मृत्युके वशमें गये हुए प्राणीको उस पुत्रसे कौन-सी गति प्राप्त होती है? जिस व्यक्तिके न पुत्री है और न पुत्र है, न दौहित्र (लड़कीका पुत्र-नाती) है, उसका श्राद्ध किसके द्वारा किस विधिसे होना चाहिये?

श्रीभगवान्‌ने कहा—हे गरुड! पुत्रके मुखको देख करके मनुष्य पितृऋणसे मुक्त होता है। पौत्रको देखनेसे मनुष्यको तीनों ऋणसे मुक्ति मिल जाती है। पुत्र-पौत्र तथा प्रपौत्रोंके होनेसे व्यक्तिको आनन्त्य लोक और स्वर्गकी प्राप्ति होती है।<sup></sup> जो क्षेत्रज पुत्र हैं, वे पिताको मात्र लौकिक सुख प्रदान करनेमें समर्थ होते हैं। औरस पुत्रको विधिवत् पार्वण श्राद्ध करना चाहिये। अन्य पुत्र एकोद्दिष्ट श्राद्ध करते हैं, पार्वण नहीं। ब्राह्म-विवाहके नियमोंसे विवाहिता स्त्रीके गर्भसे उत्पन्न हुआ पुत्र पिताको स्वर्ग ले जाता है। संगृहीत पुत्र प्राणीको अधोगतिमें ले जाता है। यदि वह सांवत्सरिक श्राद्ध करता है तो उससे पिताको नरककी प्राप्ति होती है। अन्नदानके अतिरिक्त वह सब प्रकारका दान अपने पालक पिताके लिये कर सकता है। संगृहीत पुत्रको एकोद्दिष्ट श्राद्ध ही करना चाहिये, पार्वण नहीं। माता-पिताके लिये वार्षिक श्राद्ध करके वह पापसे लिप्त नहीं होता। यदि वह एकोद्दिष्ट श्राद्धका परित्याग करके पार्वण श्राद्ध करता है तो अपनेको और पितरोंको यमलोक पहुँचाता है। जो संगृहीत पुत्र और दासीसे उत्पन्न हुए पुत्रादि हैं, उन्हें तीर्थमें जाकर पितृश्राद्ध करना चाहिये तथा ब्राह्मणोंको दान देना चाहिये।

यदि संगृहीत पुत्र पाक-श्राद्ध<sup></sup> करता है तो उसके श्राद्धको वैसे ही वृथा समझना चाहिये, जैसे शूद्रान्नसे द्विजत्व नष्ट हो जाता है। वह श्राद्ध परलोकमें गये हुए पिता-पितामहादि पितरोंको प्रसन्न नहीं कर पाता। हे पक्षिश्रेष्ठ! ऐसा जानकर व्यक्तिको हीन जातिमें उत्पन्न हुए पुत्रोंका परित्याग<sup></sup> कर देना चाहिये। [यदि अपरिणीता] ब्राह्मणीके गर्भसे ब्राह्मणके द्वारा पुत्र उत्पन्न किया जाता है तो वह चाण्डालसे भी नीच होता है। जो पुत्र संन्यासीसे जन्म लेता है या शूद्रसे ब्राह्मणीके गर्भमें उत्पन्न होता है तो ऐसे पुत्रोंको तुम चाण्डाल ही समझो। जो सगोत्रा कन्यासे जन्म ग्रहण करता है, वह भी चाण्डाल ही होता है। हे खगेश्वर! यथाविधान विवाहिता स्त्रीसे पुत्र पैदा करके व्यक्ति स्वर्ग जाता है। ऐसे सदाचारी पुत्रोंके आचरणसे मनुष्यको सुखकी प्राप्ति निश्चित है। जो दुराचारी पुत्र है वह अपने कुत्सित आचरणसे पिताको नरकमें ले जाता है। हीन जातिसे उत्पन्न हुआ सदाचारी पुत्र अपने माता-पिताको सुख प्रदान करता है।<sup></sup> जो मनुष्य कलिकालके पापसे निर्मुक्त है, सिद्ध जनोंसे पूजित है, देवलोककी अप्सराओंके द्वारा सम्मानमें डुलाये जा रहे चँवर और पहनायी गयी मालासे सुशोभित है, वह अकेले ही सौ पितरों तथा नरकमें गये हुए बन्धु-बान्धवों, पुत्र-पौत्रों और प्रपौत्रोंका उद्धार कर देता है। (अध्याय २५)


१-मुखं दृष्ट्वा तु पुत्रस्य मुच्यते पैतृकादृणात्॥
$\quad$पौत्रस्य दर्शनाज्जन्तुर्मुच्यते च ऋणत्रयात्। लोकानन्त्यं दिवः प्राप्तिः पुत्रपौत्रप्रपौत्रकैः॥ (२५।३३-३४)
२-अन्न पकाकर उसके द्वारा किया गया श्राद्ध पाक-श्राद्ध है।
३-ऐसे पुत्रोंसे यथासम्भव अपना धार्मिक कृत्य नहीं करवाना चाहिये।
४-इसका तात्पर्य सदाचारकी महिमासे है।

५४०संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड—

सपिण्डीकरण श्राद्धका महत्त्व, प्रतिवर्ष विहित मासिक श्राद्ध आदिकी अनिवार्यता, पति-पत्नीके सह-मरण आदिकी विशेष परिस्थितिमें पाक एवं पिण्डदान आदिकी विभिन्न व्यवस्थाका निरूपण तथा बभ्रुवाहनकी कथा

गरुडने कहा— हे देवश्रेष्ठ ! हे प्रभो ! आप मेरे ऊपर कृपा करके यह बतायें कि मरे हुए प्राणियोंका सपिण्डीकर्म किस समय करना चाहिये ? सपिण्डीकर्म होनेपर प्रेत कैसी गति प्राप्त करता है और जिस प्रेतका सपिण्डीकर्म नहीं होता, उसकी कैसी गति होती है ? स्त्री और पुरुषका किसके साथ सपिण्डीकर्म होना चाहिये। हे सुरेश्वर ! स्त्री और पुरुष एक साथ सपिण्डीकर्मके भागीदार बनकर कैसे उत्तम गति प्राप्त कर सकते हैं ? पतिके जीवित रहते हुए स्त्रियोंका सपिण्डीकरण कैसे हो सकता है ? वे किस प्रकार पतिलोक या स्वर्गको जाती हैं ? अन्वारोहण हो जानेपर स्त्रियोंका श्राद्ध कैसे होता है ? उनका वृषोत्सर्ग किस प्रकारसे किया जाय ? हे स्वामिन् ! सपिण्डीकरण हो जानेपर मृतकके लिये घट-दान कैसे हो ? हे हरे ! आप संसारके कल्याणार्थ इसे बतानेकी कृपा करें।

श्रीभगवान्ने कहा— हे पक्षिन् ! जिस प्रकार सपिण्डीकरण होता है, वैसा ही मैं तुम्हें सुनाऊँगा। हे खगराज ! जब मनुष्य मरनेके बाद एक वर्षकी महापथ-यात्रा करता है तो पुत्र-पौत्रादिके द्वारा सपिण्डीकरण हो जानेपर वह पितृलोकमें चला जाता है। इसलिये पुत्रको पिताका सपिण्डीकरण करना चाहिये। वर्षके पूर्ण हो जानेपर पिण्डप्रवेशन अर्थात् सपिण्डीकरण करना चाहिये। हे पक्षियोंके सिंह ! वर्षके अन्तमें निश्चित रूपसे प्रेत-पिण्डका मेलन होता है। पितृपिण्डोंके साथ प्रेत-पिण्डका सम्मिलन हो जानेपर वह प्रेत परम गतिको प्राप्त करता है। तत्पश्चात् वह प्रेत नामका परित्याग करके पितृगण हो जाता है। अपने गोत्र या सापिण्ड्यमें जितने लोगोंको अशौच शास्त्रानुसार होता है उनके यहाँ यदि विवाह या कोई शुभ कार्य होना है तो तीसरे पक्ष या छः मासमें भी सपिण्डीकरण किया जा सकता है।

हे खगेश्वर ! गृहस्थके घरमें यदि किसीका मरण हुआ हो तो विवाह आदि शुभ कार्य नहीं करने चाहिये। जबतक सपिण्डीकरण नहीं हो जाता है तबतक भिक्षुक उस घरकी भिक्षाको स्वीकार नहीं करता है। अपने गोत्रमें अशौच तबतक रहता है, जबतक पिण्डका मेलन नहीं हो जाता है। पिण्डमेलन होनेपर 'प्रेत' शब्द निवृत्त हो जाता है। कुल-धर्म अनन्त हैं, पुरुषकी आयु क्षयशील है और शरीर नाशवान् है, इस कारण बारहवाँ दिन ही सपिण्डीकरण-कर्मके लिये प्रशस्त समय होता है। मृत व्यक्ति अग्निहोत्री रहा हो अथवा न रहा हो, उसका सपिण्डीकरण द्वादशाहको ही कर देना चाहिये। तत्त्वद्रष्टा ऋषियोंने बारहवें दिन, तीसरे पक्षमें, छठे मासमें अथवा वर्ष पूर्ण होनेपर सपिण्डीकरणका विधान किया है।

पुत्रवान्का सपिण्डीकरणके बाद कभी भी एकोद्दिष्ट नहीं करना चाहिये। सपिण्डीकरणके पश्चात् जहाँ-जहाँ श्राद्ध किया जाय, पुत्रवान्का एकोद्दिष्ट कभी न किया जाय। वहाँ-वहाँ तीन-

प्रेतकल्प ] सपिण्डीकरण श्राद्धका महत्त्व ५४१


तीन श्राद्ध (पार्वण श्राद्ध) करने आवश्यक हैं, अन्यथा कर्ता पितृघातक कहलाता है। अशक्त होनेपर भी पार्वण श्राद्ध करना चाहिये।<sup></sup> ऐसा मुनियोंने कहा है। यदि दिन और मास न ज्ञात हो तो उनका पार्वण श्राद्ध ही करना उचित है। पितरोंके साथ वह पिता इस लोकमें पुत्रके द्वारा दिये गये दानका फल तबतक नहीं प्राप्त करता, जबतक उसके शरीरकी उत्पत्ति पुनः [दशगात्रके पिण्डसे] नहीं हो जाती। ऐसी स्थितिमें पुत्रद्वारा किये गये इन्हीं सोलह श्राद्धोंसे प्रेत यमपाशके बन्धनसे मुक्त होता है। पुत्ररहित पुरुषका सपिण्डीकरण नहीं करना चाहिये।<sup></sup> पतिके जीवित रहनेपर स्त्रीका भी सपिण्डन नहीं होना चाहिये।

जिस कन्याका विवाह ब्राह्मादि-विवाह-विधिसे हुआ है, उसकी पिण्डोदक-क्रियाएँ पतिके गोत्रसे करनी चाहिये। आसुरादि-विधिसे जिसका विवाह हुआ है, उसकी पिण्डोदक-क्रिया पिताके गोत्रसे करनी चाहिये। पिताका सपिण्डीकरण सदैव पुत्र करे। यदि पुत्र नहीं है तो स्वयं उसकी पत्नी उस क्रियाका निर्वाह करे। उसके भी न रहनेपर सहोदर भाई, भाईका पुत्र अथवा शिष्य सपिण्डीकरण कर सकता है। सपिण्डीकरण करके वह नान्दीमुख श्राद्ध करे। हे खग! पुत्र न रहनेपर ज्येष्ठ भाईका सपिण्डीकरण कनिष्ठ भाई करे। उसके अभावमें भतीजा या पत्नी उस कर्मको सम्पन्न करे। मनुने कहा है कि—यदि सहोदर भाइयोंमेंसे एक भी भाई पुत्रवान् हो जाय तो उसी पुत्रसे अन्य सभी भाई पुत्रवान् हो जाते हैं।<sup></sup> यदि सभी भाई पुत्रहीन हैं तो उनका सपिण्डीकरण उनकी पत्नीको करना चाहिये अथवा वह पत्नी स्वयं न करके ऋत्विज्‌से या पुरोहितसे कराये।

चूडाकरण एवं उपनयन-संस्कारसे संस्कृत पुत्र पिताके श्राद्धको करे। जिस पुत्रका उपनयन-संस्कार नहीं हुआ है केवल चूडाकरण-संस्कार हुआ है वह श्राद्धमें स्वधाका उच्चारण तो कर सकता है पर वेदमन्त्रका उच्चारण नहीं कर सकता। स्त्रीका सपिण्डीकरण उसके पति, ससुर तथा परश्वशुरके साथ करना चाहिये। स्त्री-जातिका यह कर्म भतीजा तथा सहोदर छोटा भाई भी कर सकता है। संवत्सरपूर्ण होनेके पहले अथवा वर्षके पूर्ण होनेपर दूसरे वर्षके संधिकालमें जिन प्रेतोंका सपिण्डीकरण होता है, उनकी क्रिया पृथक् नहीं की जाती। हे वत्स! सपिण्डीकरण हो जानेके पश्चात् पृथक् क्रिया करना निन्दनीय माना गया है। जो व्यक्ति अपने पिताको पृथक् पिण्डदान देता है, वह पितृहन्ता होता है। सपिण्डीकरणके बाद पृथक् श्राद्ध उचित नहीं है। यदि कोई पृथक् पिण्डदान करता है तो वह पुनः सपिण्डीकरण करे। जो मनुष्य सपिण्डीकरण करके एकोद्दिष्ट श्राद्ध करता है, वह स्वयंको तथा प्रेतको यमराजके अधीन कर देता है।


१-(क) यहाँपर ऊनमासिक आदि तथा सांवत्सरिक [मृत्यु-तिथि आदि] श्राद्ध एकोद्दिष्ट श्राद्धके स्थानपर पार्वण श्राद्धकी विधि कात्यायनके मतसे लिखी गयी है। जो कुछ प्रदेशोंमें भी प्रचलित है। परंतु सामान्यतया ऊनमासिक सांवत्सरिकादि श्राद्धोंमें शौनकके मतानुसार एकोद्दिष्ट-विधिसे ही श्राद्ध किया जाता है।
(ख) सपिण्डीकरणं कृत्वा गयां गत्वा च धर्मवित्। एकोद्दिष्टं न कुर्वीत साग्निर्वा नाग्निमानपि॥ (दिवोदासप्रकाश)
२-उपर्युक्त श्लोकोंमें 'अपुत्रस्य' यह वाक्य 'पुत्रोत्पादन' की विधिकी प्रशंसामें पर्यवसित है। इसका तात्पर्य अपुत्रवान् पुरुषके सपिण्डन-निषेधमें नहीं है। अन्यथा—
पुत्राभावे स्वयं कुर्युः स्वभर्तॄणाममन्त्रकम्। सपिण्डीकरणं तत्र ततः पार्वणमन्वहम्॥ (श्राद्धकल्पलता पृष्ठ २४३)
'पुत्राभावे तु पत्नी स्यात् पत्यभावे सहोदरः।' (२६।२३)
'सर्वेषां पुत्रहीनानां पत्नी कुर्यात् सपिण्डनम्।' (२६।२७)
—इन वाक्योंका विरोध हो जायगा। अतः यथाविधि योग्य पुत्र उत्पन्न करनेका प्रयत्न अवश्य करना चाहिये।
३-भ्रातॄणामेकजातानामेकश्चेत् पुत्रवान् भवेत्। सर्वे ते तेन पुत्रेण पुत्रिणो मनुरब्रवीत्॥ (२६।२६)

२४४- और्ध्वदेहिक क्रियामें विहित पद आदि विविध दानोंका फल तथा जीवको प्राप्त-देहके स्वरूपका वर्णन

५४२संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड—

हे पक्षिन्! वर्षपर्यन्त प्रेतसे सम्बन्धित जो भी क्रिया की जाय उसके नाम और गोत्रके सहित विद्वान् व्यक्ति करे। सपिण्डीकरण कर देनेपर भोजन और घटादिका दान, पददान तथा अन्य जो दान हैं उन्हें एकको (मृत व्यक्तिको) ही उद्देश्य करके देना चाहिये। वर्षभरके लिये अन्न और जलपूर्ण घटादिकी संख्याका निर्धारण करके ब्राह्मणको प्रदान करे। पिण्डदान देनेके पश्चात् यथाशक्ति वर्षभरके लिये उपयोगी समस्त सामग्री दानमें दे। ऐसा होनेपर मृत व्यक्ति दिव्य देह धारण करके विमानद्वारा सुखपूर्वक यमलोक चला जाता है।<sup></sup>

पिताके जीवित रहनेके कारण मृत पुत्रका पिताके साथ सपिण्डीकरण नहीं हो सकता अर्थात् उसका सपिण्डीकरण पितामह आदिके साथ होगा ऐसे ही पतिके जीवित होनेपर स्त्रियोंका सपिण्डीकरण उसकी श्वश्रू आदिके साथ होगा।<sup></sup> पतिकी मृत्यु हो जानेके बाद चौथे दिन जो पतिव्रता स्त्री अपने शरीरको अग्निमें समर्पित कर देती है, उसका वृषोत्सर्गादि कर्म पतिकी क्रियाके ही दिन करना चाहिये। पुत्रिका पुत्रोत्पत्तिके पूर्व पतिके गोत्रवाली होती है। पुत्रोत्पत्तिके बाद वह पुनः पिताके गोत्रमें आ जाती है। पुत्रिका उस कन्याको कहते हैं, जिस कन्याका पिता विवाहके समय जामातासे यह तय कर लेता है कि इस कन्यासे जो पुत्र पैदा होगा वह मेरा पुत्र होगा। यदि स्त्री अपने पतिके साथ अग्निमें आरोहण करती है तो उसकी उसके पतिके साथ समस्त और्ध्वदैहिक क्रिया करनी चाहिये, किंतु क्षय-तिथिमें पुत्रको उसका श्राद्ध पृथक्-रूपमें करना चाहिये। यदि पति-पत्नी पुत्ररहित हैं और वे दोनों एक ही दिन मर जाते हैं तथा उनका दाह-संस्कार एक ही चितापर होता है तो उन दोनोंके श्राद्धोंको पृथक्-पृथक् करना चाहिये, किंतु पत्नीका सपिण्डीकरण पतिके साथ ही होगा। यदि पतिके साथ पत्नीका पिण्डदान पृथक्-पृथक् होता है तो उस पिण्डदानसे वह दम्पति पापलिप्त नहीं होता, यह मेरा सत्य वचन है। यदि पति-पत्नी दोनोंका एक ही चितापर दाह संस्कार होता है तो उन दोनोंके लिये पाक एक ही साथ बनाया जाय, किंतु पिण्डदान पृथक्-पृथक् होना चाहिये। एकादशाहको वृषोत्सर्ग, षोडश प्रेतश्राद्ध, घटादि-दान, पददान और जो महादान हैं उन्हें पति-पत्नीका वर्षपर्यन्त पृथक्-पृथक् ही करना चाहिये। ऐसा करनेसे प्रेतको चिरकालीन संतुष्टि प्राप्त होती है।

एक गोत्रसे सम्बन्धित एक साथ मरे हुए स्त्री अथवा पुरुषसे सम्बद्ध-कृत्यमें आहुतिकी वेदी एक ही होनी चाहिये। किंतु होम पृथक्-पृथक् होना चाहिये। पति एवं पत्नीका एक साथ मरण होनेपर उनका एकादशाहका श्राद्ध एवं उनके निमित्त पिण्डदान, भोजन आदि पृथक्-पृथक् होगा, पर पाककी व्यवस्था एक ही होगी—यह विधान केवल पति-पत्नीके एक साथ मरणमें ही है अन्य किसीके मरणमें ऐसा विधान गर्हित है। पुत्र माता-पिताके लिये एक ही पाकसे यथाविधान


१-अन्नं पानीयसहितं संख्यां कृत्वाब्दिकस्य च। दातव्यं ब्राह्मणे पक्षिञ्जलपूर्णघटादिकम्॥
पिण्डान्ते तस्य सकला वर्षवृत्तिः स्वशक्तितः। दिव्यदेहो विमानस्थः सुखं याति यमालयम्॥ (२६। ३५-३६)
२-पिताके जीवित रहनेपर पुत्रके मर जानेसे पुत्रका सपिण्डीकरण पिताके साथ न करके पितामहके साथ करनेका विधान है। इसी प्रकार पतिके जीवित रहनेपर मृत पत्नीका पतिके साथ सपिण्डीकरण न करके उसके श्वश्रू, परश्वश्रू और वृद्ध परश्वश्रू (सास, परसास, वृद्धपरसास)-के साथ सपिण्डीकरण करना चाहिये। इसके समर्थनमें ये वाक्य द्रष्टव्य हैं—
अपुत्रायां मृतायां तु पतिः कुर्यात् सपिण्डनम्। श्वश्वादिभिः सहैवास्याः सपिण्डीकरणं भवेत्॥ (पैठीनसि)
अपुत्रायां मृतायां तु पतिः कुर्यात् सपिण्डनम्। श्वश्रूमात्रादिभिः सार्धमेव धर्मेण युज्यते॥ (व्यास)