गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Gautama Dharmasutra Hindi
महर्षि गौतम द्वारा
स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 104, कुल 360 में से
संदर्भ में पढ़ेंसानुवाद-मिताक्षरावृत्तिसहितानि ३९
ऊपर की तथा माता से आरम्भ कर उसके बन्धुवर्ग में पांच पीढ़ी से उपर की कन्या से विवाह कर सकता है ॥ ३ ॥
अथ विवाहभेदाः—
ब्राह्मो विद्याचारित्रबन्धुशीलसंपन्नाय दद्यादाच्छाद्यालं-
कृताम् ॥ ४ ॥
विद्या वेदविद्या। चारित्रं चोदितकर्मानुष्ठानम् बन्धवो ज्ञातयो मातुलादयश्च। शीलं विहितेषु श्रद्धा। एतैर्गुणैः संपन्नाय वस्त्रयुगलेनाऽच्छाद्य यथाविभवमलंकृतां कन्यां दद्यात्। एवंविधस्य विवाहस्य ब्राह्मसंज्ञा ॥४॥
वेद के विद्वान्, उत्तम आचरण वाले, अपने तथा मातृपक्ष के बान्धवों से सम्पन्न एवं शीलवान् वर को दो वस्त्रों से सजाई गयी तथा आभूषण से अलंकृत कन्या प्रदान करने पर ब्राह्म विवाह कहलाता है ॥ ४ ॥
संयोगमन्त्रः प्राजापत्ये सह धर्मश्चर्यतामिति ॥ ५ ॥
प्राजापत्यसंज्ञके विवाहे सह धर्मश्चर्यतामिति प्रदानमन्त्रः यद्यपि ब्राह्मादिष्वपि सह धर्मचर्या भवति तथाऽप्याऽन्तादनया सह धर्मश्चरितव्यः नाऽऽश्रमान्तरं प्रवेष्टव्यं नापि स्त्र्यन्तरमुपयन्तव्यमिति मन्त्रेण समयः क्रियते। एष ब्राह्मादेः प्राजापत्यस्य विशेषः। आच्छाद्यालंकृतामिति समानम् ॥ ५ ॥
प्राजापत्य विवाह में 'सहधर्मश्चर्यताम्' (तुम दोनों एक साथ रहकर गृहस्थाश्रम के धर्म का पालन करो) मन्त्र के साथ कन्या प्रदान की जाती है। (ब्राह्मविवाह से प्राजापत्य में यह विशेषता है कि उपर्युक्त मन्त्र वर और कन्या को केवल गृहस्थाश्रम धर्म का पालन करने एवं वर को दूसरा विवाह न करने का आदेश देता है) ॥ ५ ॥
आर्षे गोमिथुनं कन्यावते दद्यात् ॥ ६ ॥
आर्षसंज्ञके विवाहे गोमिथुनं स्त्रीपुंरूपं कन्यावते दद्याद्वरस्तद्वन्धुर्वा कश्चित्। आच्छाद्यालंकृतामिति समानम् ॥ ६ ॥
आर्ष विवाह में (वर अथवा वर के बन्धुजन) कन्या के अभिभावक को दो गायें देते हैं ॥ ६ ॥
अन्तर्वेद्यृत्विजे दानं दैवोऽलंकृत्य ॥ ७ ॥
अन्तर्वेदि, वेद्यां दक्षिणाकाल ऋत्विजे कर्म कुर्वते यद्लंकृत्य कन्याया