भारतकोश
गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Gautama Dharmasutra Hindi

महर्षि गौतम द्वारा

स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished360 पृष्ठ

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पृष्ठ 108

सानुवाद-मिताक्षरावृत्तिसहितानि ४३

वर्णान्तरगमनमुत्कर्षापकर्षाभ्यां सप्तमे पञ्चमे वाऽऽचार्याः ॥ १८ ॥

मन्यन्त इति वाक्यशेषः । तेषामेव सवर्णादीनामनुलोमजातानामुत्कर्षेण पितृद्वारा सप्तमपुरुषादुत्कृष्टवर्णान्तरप्राप्तिर्भवति । अपकर्षेण मातृद्वारा पञ्चमपुरुषादपकृष्टवर्णान्तरप्राप्तिर्भवति । तद्यथा—ब्राह्मणेनोढायां क्षत्रियायामुत्पादिता सवर्णा साऽपि ब्राह्मणेनोढा तस्यामुत्पादिता चेत्येवमा सप्तम्याः सप्तमी तु ब्राह्मणेनोढा यदपत्यं सूते तद्ब्राह्मणजातीयमेव भवति । एवं ब्राह्मणेन क्षत्रियायामुत्पादितः पुत्रः सवर्णः सोऽपि क्षत्रियामुद्वाह्य पुत्रमुत्पादयति सोऽपि क्षत्रियामित्येवमापञ्चमात्पञ्चमस्तु क्षत्रियायां यदपत्यमुत्पादयति तत्क्षत्रियजातीयमेव भवति । विकल्पस्यैवं चार्थः । तत्रापि वर्णान्तरगमने वृत्तस्वाध्यायबाहुल्ये सति पञ्चमेनोत्कृष्टं भवति । हीनवृत्त्या पञ्चमेनापकृष्टं च भवतीति । एवं क्षत्रियस्य वैश्यायां वैश्यस्य शूद्रायामपि द्रष्टव्यम् ॥ १८ ॥

आचार्यों का मत है कि सवर्ण आदि अनुलोम विवाह (उच्चवर्ण के पुरुष एवं निम्न वर्ण की स्त्री के विवाह) से उत्पन्न वर्णसंकरों का पिता की सातवीं पीढ़ी में वर्ण का उत्कर्ष और (हीन वर्ण की) माता की पाँचवी पीढ़ी में वर्ण का अपकर्ष हो जाता है ।

(अर्थात् ब्राह्मण और क्षत्रिया के विवाह से उत्पन्न कन्या सवर्णा कहलाती है; उस सवर्णा कन्या का विवाह ब्राह्मण से हो, उनसे भी उत्पन्न कन्या का विवाह ब्राह्मण से हो; इसी प्रकार सातवीं पीढ़ी में जो सन्तान उत्पन्न होगी वह ब्राह्मण वर्ण की होगी; इस प्रकार वर्ण का उत्कर्ष होता है । इसके विपरीत ब्राह्मण और क्षत्रिया के विवाह से उत्पन्न पुत्र सवर्ण होता है; वह यदि क्षत्रिया से विवाह करके पुत्र उत्पन्न करे और वह पुत्र भी क्षत्रिया से विवाह करे, इस प्रकार पाँचवीं पीढ़ी में जो सन्तान उत्पन्न होगी वह क्षत्रिय वर्ण की होगी और इस प्रकार वर्ण का अपकर्ष हो जायगा । इसी प्रकार क्षत्रिय और वैश्या आदि के विवाहों से उत्पन्न सन्तान के विषय में भी समझना चाहिए ॥ १८ ॥

सृष्ट्यन्तरजातानां च ॥ १९ ॥

चातुर्वर्ण्यमनन्तरेण चानुलोमजातानां सवर्णाम्बष्ठादीनामप्युत्कर्षोपकर्षाभ्यामन्योन्यवर्णान्तरगमनं भवति । तद्यथा—सवर्णेनोढायामम्बष्ठायामुत्पादिता दुहिता पुनः सवर्णेनोह्यते । तस्यामप्युत्पादिता सवर्णेनेत्यासप्तमात्सप्तमी तु सवर्णेनोढा यदपत्यं स एव भवति । एवं सैवाम्बष्ठेनोढायां दुहितरं सूते साऽप्यम्बष्ठेनेति सप्तमी त्वम्बष्ठेनोढा यदपत्य-