गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Gautama Dharmasutra Hindi
महर्षि गौतम द्वारा
स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 107, कुल 360 में से
संदर्भ में पढ़ें४२ | गौतमधर्मसूत्राणि
प्रातिलोम्येन जातानाह—
प्रतिलोमास्तु सूतमागधायोगवकृतवैदेहकचण्डालाः ॥ १५ ॥
अनन्तरैकान्तरद्वयन्तरासु जाता इत्यनुवर्तते । क्षत्रियस्यारनन्तरा ब्राह्मणी तस्यां तस्मात्सूतः । वैश्यस्यानन्तरा क्षत्रिया तस्यां तस्मान्मागधः । शूद्रस्यानन्तरा वैश्या तस्यां तस्मादायोगवः । वैश्यस्यैकान्तरा ब्राह्मणी तस्यां तस्मात्कृतः । शूद्रस्यैकान्तरा क्षत्रिया तस्यां तस्माद्वैदेहकः । शूद्रस्य द्वयन्तरा ब्राह्मणी तस्यां तस्माच्चण्डाल इति ॥ १५ ॥
इसी प्रकार प्रतिलोम (पुरुष का अपने से उच्चवर्ण की स्त्री से) विवाह में अनन्तर (क्षत्रिय और ब्राह्मणी, वैश्य और क्षत्रिया, शूद्र और वैश्या के विवाहों द्वारा), एकान्तर (वैश्य और ब्राह्मणी, शूद्र और क्षत्रिया के विवाहों द्वारा) तथा द्वयन्तर (शूद्र और ब्राह्मणी के) विवाहों द्वारा उत्पन्न पुत्र क्रमशः सूत, मागध, आयोगव, कृत, वैदेहक और चण्डाल कहलाते हैं ॥ १५ ॥
अन्येषां मतेन तेषामेव प्रतिवर्णं संगृह्य संज्ञाभेदानाह—
ब्राह्मण्यजीजनत्पुत्रान्वर्णेभ्य आनुपूर्व्याद् ब्राह्मणसूतमागधचण्डालान् ॥ १६ ॥
स्पष्टोऽर्थः । अत्राऽऽनुपूर्व्यग्रहणं वर्णक्रमविवक्षापरम् । नत्वनुलोमपरम् ॥ १६ ॥
ब्राह्मणी ने वर्णक्रमानुसार पुरुषों द्वारा (अर्थात् क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रवर्ण के पुरुष से) क्रमशः ब्राह्मण, सूत, मागध और चण्डाल पुत्र उत्पन्न किये ॥ १६ ॥
तेभ्य एव क्षत्रिया मूर्धावसिक्तक्षत्रियधीवरपुल्कसांस्तेभ्य एव वैश्या भूर्जकण्ठमाहिष्यवैश्यवैदेहान्पारशवयवनकरणशूद्रान्छूद्रेत्येके ॥ १७ ॥
एके स्मर्तार इत्युक्तक्रमेण ब्राह्मण्यजीजनदित्यारभ्य ब्राह्मणीक्षत्रियावैश्याशूद्रासु ब्राह्मणादिवर्णेभ्यः क्रमेण जातानां संज्ञाभेदान्मन्यन्ते ॥ १७ ॥
कुछ स्मृतिकारों के मतानुसार उन्हीं (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र पुरुषों) द्वारा क्षत्रिय वर्ण की स्त्री क्रमशः मूर्धावसिक्त, क्षत्रिय, धीवर, पुल्कस कहे जाने वाले पुत्रों को और उन्हीं (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र पुरुषों) से वैश्य वर्ण की स्त्री क्रमशः भूर्जकण्ठ, माहिष्य, वैश्य और वैदेहक कहलानेवाले पुत्रों को तथा शूद्र वर्ण की स्त्री क्रमशः पारशव, यवन, करण और शूद्र पुत्रों को उत्पन्न करती है ॥ १७ ॥