भारतकोश
गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Gautama Dharmasutra Hindi

महर्षि गौतम द्वारा

स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished360 पृष्ठ

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सानुवाद-मिताक्षरावृत्तिसहितानि ४५

चण्डालमाजगोचालव्यजनान्परिहरेदिति ॥ २३ ॥
शूद्र पुरुष द्वारा असमान वर्ण की स्त्रियों से उत्पन्न पुत्रों में भी अन्तिम अर्थात् ब्राह्मणी से उत्पन्न पुत्र चण्डाल पापी होता है ( और उसका दर्शन, स्पर्श और प्रतिग्रह अत्यन्त वर्जित है ) ॥ २३ ॥

अथ प्रकृतान्विवाहान् स्तौति—
पुनन्ति साधवः पुत्राः ॥ २४ ॥
अच्छा ( अस्मा ) सु जाताः साधवः साधुवृत्तयः पुत्रा जनयितुः कुलं पुनन्ति ॥ २४ ॥
( उत्तम विवाह से उत्पन्न ) सदाचारी पुत्र पिता के कुल को पवित्र करते हैं ॥ २४ ॥

तत्र विशेषः—
त्रिपुरुषमार्षात् ॥ २५ ॥
आर्षविवाहोढायां जातः पुत्रस्त्रीन्पुरुषान्पुनाति नरकादुद्धरति ॥ २५ ॥
आर्ष विवाह की विधि से परिणीता स्त्री से उत्पन्न पुत्र तीन पीढ़ी के पुरुषों को पवित्र करते हैं ( अर्थात् उनका नरक से उद्धार करते हैं ॥ २५ ॥

दश दैवादशैव प्राजापत्यात् ॥ २६ ॥
उपसमस्तमपि पुरुषपदमत्र दशशब्देन संबध्यते । एवकारो निर्धार-णपरः ॥ २६ ॥
दैवविवाह से उत्पन्न पुत्र दस पीढ़ियों को और प्राजापत्य विवाह से उत्पन्न पुत्र भी दस पीढ़ियों को पवित्र करते हैं ॥ २६ ॥

दश पूर्वान्दश परानात्मानं च ब्राह्मीपुत्रो ब्राह्मीपुत्रः ॥ २७ ॥
ब्राह्मविवाहेनोढा ब्राह्मी तस्यां जातः पुत्रः पित्रादीन्दश पूर्वान्दश परान्भविष्यतः पुत्रादींश्च दशाऽऽत्मानं चैकविंशं पुनाति । तस्माद् ब्राह्मो विवाहः प्रशस्ततमः ॥ २७ ॥

इति श्रीगौतमयवृत्तौ हरदत्तविरचितायां मिताक्षरायां प्रथमप्रश्ने चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥

ब्राह्मविवाह से उत्पन्न पुत्र अपने से पहले की दस पीढ़ियों, अपने आगे की दस पीढ़ियों के पुरुषों को तथा स्वयं अपने को ( इस प्रकार इक्कीस पीढ़ियों को ) पवित्र करता है । (इसलिए ब्राह्मविवाह सभी विवाहों में श्रेष्ठ है) ।