भारतकोश
गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Gautama Dharmasutra Hindi

महर्षि गौतम द्वारा

स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished360 पृष्ठ

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५२ गौतमधर्मसूत्राणि

अददत्प्रत्यवेयादिति । बहिर्वेदिग्रहणेन सदीक्षितविषयमिदमन्तर्वेद्यन्ये- भ्योऽपि देयम् ॥ १९ ॥

( वेद के अध्ययन के उपरान्त ) गुरु के लिए, विवाह के लिए, रोगी की औषध के लिए, हीन वृत्ति वाले के लिए, यज्ञ करने वाले के लिए, अध्ययन करने वाले के लिए, मार्ग में चलने वाले के लिए, और विश्वजित् यज्ञ करने वाले के लिए इनके माँगने पर अवश्य ही बहिर्वेदि ( यज्ञ की दक्षिणा के समय दिये जाने वाले दान से भिन्न प्रकार का ) दान देना चाहिए ॥ १६ ॥

भिक्षमाणेषु कृतान्नमितरेषु ॥ २० ॥

इतरेषूक्तव्यतिरिक्तेषु भिक्षमाणेषु कृतान्नं पक्वान्नमवश्यं देयम् । द्रव्यादेरदाने न दोषः । कृतान्नविषयेऽपि वसिष्ठः— अव्रता ह्यनधीयाना यत्र भैक्षचरा द्विजाः । तं ग्रामं दण्डयेद्राजा चोरदण्डव्रतो हि सः ॥ इति ॥ २० ॥ उपर्युक्त व्यक्तियों के अतिरिक्त भी माँगने वाले व्यक्तियों को पकाया हुआ अन्न देना चाहिए ॥ २० ॥

अथ दानापवादः— प्रतिश्रुत्याप्यधर्मसंयुक्ताय न दद्यात् ॥ २१ ॥

दास्यामीति प्रतिश्रुत्याप्यधर्मसंयुक्तविषये न दद्यात् । यदि तेन द्रव्येणाधर्मसंयुक्तं वेश्यागमनाद्यसौ करिष्यतीति विजानीयात् । अधर्म- संयुक्त इति वचनादन्यत्र प्रतिश्रुतमददत्प्रत्यवेयादिति दर्शयति ॥ २१ ॥

पहले देने का वचन देकर भी अधार्मिक कार्य के लिए दान नहीं देना चाहिए ॥ २१ ॥

प्रतिश्रवणविषये विशेषमाह— क्रुद्धहृष्टभीतातंलुब्धबालस्थविरमूढमत्तोन्मत्तवाक्यान्यनृता- न्यपातकानि ॥ २२ ॥

क्रुद्धादिवाक्यान्यनृतान्ययथार्थान्यप्यपातकानि न पापं जनयन्ति । क्रुद्धः क्रोधाविष्टः । हृष्टो हर्षाविष्टः । भीतो भयाविष्टः । एतेषां गुणान्तरै- राविष्टत्वाद्वाक्यमप्रमाणम् । तस्मात्प्रतिश्रुत्यादानेऽपि तेषामदोषः ॥ २२ ॥

क्रोधी, अत्यन्त प्रसन्न, भयाकुल, रोगी, लोभी, बालक, अत्यन्त वृद्ध, मूढ, मत्त और उन्मत्त व्यक्ति के बचन झूठे होने पर भी पाप नहीं उत्पन्न करते । ( अतः उनके वचन देने के बाद दान न देने पर भी वे पापी नहीं होते हैं । )