गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Gautama Dharmasutra Hindi
महर्षि गौतम द्वारा
स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 118, कुल 360 में से
संदर्भ में पढ़ेंसानुवाद-मिताक्षरावृत्तिसहितानि ५३
अथ गृहस्थपूर्वभोज्यानाह—
भोजयेत्पूर्वमतिथिकुमारव्याधितगर्भिणीस्ववासिनीस्थविरा-
ञ्जघन्यांश्च ॥ २३ ॥
अतिथिर्वक्ष्यमाणः। कुमारा बालाः । व्याधितः संजातव्याधिः । गर्भिण्यः प्रसिद्धाः । स्ववासिन्यो दुहितरो भगिन्यश्च । स्थविरा वृद्धाः । जघन्याः परिचारकादयः । एतानात्मनः पूर्वं भोजयेत्पश्चात्स्वयं भुञ्जीत । जघन्यानां पृथक्पदत्वं तेषामानन्तर्यसूचनार्थम् ॥ २३ ॥
अतिथि, बालक, रोगी, गर्भवती स्त्री, घर में रहने वाली पुत्रियों और बहनों, वृद्धों और सेवकों को गृहस्थ अपने से पहले भोजन करावे ॥ २३ ॥
आचार्यपितृसखीनां च निवेद्य वचनक्रिया ॥ २४ ॥
यदि भोजनकाल आचार्यादय आगच्छेयुस्तदा सिद्धमन्नं तेभ्यो निवेद्य तदन्नक्रिया तदिच्छात्तः कर्तव्या । न तेषु संनिहितेषु स्वतन्त्रो भवेदित्यर्थः ॥ २४ ॥
( भोजन के समय ) आचार्य, पिता और मित्र के आ जाने पर उन्हें पका हुआ अन्न निवेदित करके उनके आदेश के अनुसार कार्य करे ॥ २४ ॥
ऋत्विगाचार्यश्वशुरपितृव्यमातुलानामुपस्थाने मधुपर्कः ॥२५॥
ऋत्विगादिषु गृहमागतेषु मधुपर्को देयः ॥ २५ ॥
ऋत्विज, आचार्य, श्वशुर, चाचा और मामा के आने पर उनको मधुपर्क देना चाहिए ॥ २५ ॥
संवत्सरे पुनः ॥ २६ ॥
पूजितास्ते यदि संवत्सरात्पुनरागच्छेयुः पुनरपि मधुपर्को देयो नार्वागिति ॥ २६ ॥
यदि वे एक वर्ष के बाद पुनः आवें तो उनको पुनः मधुपर्क देना चाहिए । ( वर्ष के भीतर आने पर नहीं ) ॥ २६ ॥
यज्ञविवाहयोरर्वाक् ॥ २७ ॥
संवत्सरादर्वागपि यज्ञविवाहयोरागतेभ्यस्तेभ्यो मधुपर्को देयः । मधुपर्कविधिर्गृह्योक्तो द्रष्टव्यः ॥ २७ ॥
यज्ञ और विवाह के समय वर्ष के भीतर आने पर भी उन्हें मधुपर्क देना चाहिए ॥ २७ ॥