भारतकोश
गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Gautama Dharmasutra Hindi

महर्षि गौतम द्वारा

स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished360 पृष्ठ

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सानुवाद-मिताक्षरावृत्तिसहितानि ५५

इसके विपरीत प्रकार के (विद्या से युक्त होते हुए भी दुराचारी) अतिथि को तृण, जल, स्थान देकर स्वागत के वचनों से उसका सत्कार करे; संभाषण से पूजा करे और मध्यम कोटि का भोजन करावे ॥ ३३ ॥

शय्यासनावसथानुव्रज्योपासनानि सदृक्श्रेयसोः समानानि ॥ ३४ ॥

योऽतिथिर्विद्यावृत्तादिनाऽऽत्मना सदृशो यश्च श्रेयांस्तयोर्द्वयोरप्यात्मना तुल्यानि शय्यासनादीनि देयानि । आवसथो गृहे स्थानविशेषः । अनुव्रज्योपासनयोरात्मन्यसंभवात्तुल्यत्वं न सम्भवति ते अपि कार्ये इत्यर्थः ॥ ३४ ॥

जो अतिथि विद्या, वृत्ति आदि में अपने समान हो और जो अपने से श्रेष्ठ हो उन दोनों प्रकार के अतिथियों को अपने समान शय्या, आसन और घर में निवास स्थान दे; उसके पीछे-पीछे चले और समीप में उपस्थित रहे ॥ ३४ ॥

अल्पशोऽपि हीने ॥ ३५ ॥

आत्मना किंचिदूनेऽप्यतिथावागते समान्येव शय्यादीनि देयानीत्येके । वयं तु ब्रूमः । हीनेऽतिथावागतेऽल्पशोऽपि शय्यादीनि देयानि न तु हीन इति कृत्वाऽत्यन्तलोपः कर्तव्यः ॥ ३५ ॥

अपने से कुछ ही हीन अतिथि के आने पर भी समान ही शय्या आदि दे ॥ ३५ ॥

अतिथिलक्षणमाह —

असमानग्रामोऽतिथिरेकरात्रिकोऽधिवृक्षसूर्योपस्थायी ॥३६॥

असमानग्रामोऽन्यग्रामवासी । एकरात्रिक एकां रात्रिं वसतीत्येकरात्रिकः । वृक्षाणामुपरि यदा सूर्यः सोऽधिवृक्षसूर्यः कालः मध्याह्नः । अथ वा वृक्षाणामुपरि सूर्यरश्मयो यदा भवन्ति स कालः सायं वा । तस्मिन्काले उपस्थितोऽतिथिः सर्वथा मान्यतमः ॥ ३६ ॥

दूसरे ग्राम में रहनेवाले, केवल एक रात्रि निवास करनेवाले और वृक्षों के ऊपर सूर्य के अधिष्ठित रहने के समय (मध्याह्न या सायंकाल के समय) आने वाले को अतिथि कहते हैं ॥ ३६ ॥

कुशलानामयारोग्याणामनुप्रश्नः ॥ ३७ ॥

ब्राह्मणादिषु त्रिषु वर्णेषु पथ्यादिसङ्गतेषु कुशलादीनामानुपूर्व्येण प्रश्नः कर्तव्यः । अपि कुशलमायुष्मन्निति ब्राह्मणः प्रष्टव्यः । अप्यनामयं तत्रभवत इति क्षत्रियः । अप्यरोगो भवानिति वैश्यः ॥ ३७ ॥