गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Gautama Dharmasutra Hindi
महर्षि गौतम द्वारा
स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 120, कुल 360 में से
संदर्भ में पढ़ेंसानुवाद-मिताक्षरावृत्तिसहितानि ५५
इसके विपरीत प्रकार के (विद्या से युक्त होते हुए भी दुराचारी) अतिथि को तृण, जल, स्थान देकर स्वागत के वचनों से उसका सत्कार करे; संभाषण से पूजा करे और मध्यम कोटि का भोजन करावे ॥ ३३ ॥
शय्यासनावसथानुव्रज्योपासनानि सदृक्श्रेयसोः समानानि ॥ ३४ ॥
योऽतिथिर्विद्यावृत्तादिनाऽऽत्मना सदृशो यश्च श्रेयांस्तयोर्द्वयोरप्यात्मना तुल्यानि शय्यासनादीनि देयानि । आवसथो गृहे स्थानविशेषः । अनुव्रज्योपासनयोरात्मन्यसंभवात्तुल्यत्वं न सम्भवति ते अपि कार्ये इत्यर्थः ॥ ३४ ॥
जो अतिथि विद्या, वृत्ति आदि में अपने समान हो और जो अपने से श्रेष्ठ हो उन दोनों प्रकार के अतिथियों को अपने समान शय्या, आसन और घर में निवास स्थान दे; उसके पीछे-पीछे चले और समीप में उपस्थित रहे ॥ ३४ ॥
अल्पशोऽपि हीने ॥ ३५ ॥
आत्मना किंचिदूनेऽप्यतिथावागते समान्येव शय्यादीनि देयानीत्येके । वयं तु ब्रूमः । हीनेऽतिथावागतेऽल्पशोऽपि शय्यादीनि देयानि न तु हीन इति कृत्वाऽत्यन्तलोपः कर्तव्यः ॥ ३५ ॥
अपने से कुछ ही हीन अतिथि के आने पर भी समान ही शय्या आदि दे ॥ ३५ ॥
अतिथिलक्षणमाह —
असमानग्रामोऽतिथिरेकरात्रिकोऽधिवृक्षसूर्योपस्थायी ॥३६॥
असमानग्रामोऽन्यग्रामवासी । एकरात्रिक एकां रात्रिं वसतीत्येकरात्रिकः । वृक्षाणामुपरि यदा सूर्यः सोऽधिवृक्षसूर्यः कालः मध्याह्नः । अथ वा वृक्षाणामुपरि सूर्यरश्मयो यदा भवन्ति स कालः सायं वा । तस्मिन्काले उपस्थितोऽतिथिः सर्वथा मान्यतमः ॥ ३६ ॥
दूसरे ग्राम में रहनेवाले, केवल एक रात्रि निवास करनेवाले और वृक्षों के ऊपर सूर्य के अधिष्ठित रहने के समय (मध्याह्न या सायंकाल के समय) आने वाले को अतिथि कहते हैं ॥ ३६ ॥
कुशलानामयारोग्याणामनुप्रश्नः ॥ ३७ ॥
ब्राह्मणादिषु त्रिषु वर्णेषु पथ्यादिसङ्गतेषु कुशलादीनामानुपूर्व्येण प्रश्नः कर्तव्यः । अपि कुशलमायुष्मन्निति ब्राह्मणः प्रष्टव्यः । अप्यनामयं तत्रभवत इति क्षत्रियः । अप्यरोगो भवानिति वैश्यः ॥ ३७ ॥