भारतकोश
गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Gautama Dharmasutra Hindi

महर्षि गौतम द्वारा

स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished360 पृष्ठ

पृष्ठ 121, कुल 360 में से

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५६ गौतमधर्मसूत्राणि

ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्ण के अतिथियों से क्रमशः कुशल, अनामय और आरोग्य का प्रश्न करे (अर्थात् ब्राह्मण से 'कुशलमायुष्मन्', क्षत्रिय से 'अपि अनामय तत्रभवतः' तथा वैश्य से 'अप्यरोगो भवान्' पूछे) ॥ ३७ ॥

अन्त्यं शूद्रस्य ॥ ३८ ॥

कुशलादिषु यदन्त्यं तच्छूद्रस्य प्रयोक्तव्यमप्यरोगोऽसीति ॥ ३८ ॥
उपर्युक्त प्रश्नों में अन्तिम (आरोग्य का) कुशल प्रश्न शूद्र से भी पूछे (जैसे—'अप्यरोगोऽसि' ।) ॥ ३८ ॥

ब्राह्मणस्यानतिथिर्ब्राह्मणः ॥ ३९ ॥

अब्राह्मणः क्षत्रियादिर्ब्राह्मणस्यातिथिर्न भवति । पूर्वोक्ता अतिथिधर्मास्तत्र न प्र योज्याः । केवलमुदकान्नदानादिनाऽङ्गीकार्यः ॥ ३९ ॥
अब्राह्मण (क्षत्रिय आदि) ब्राह्मण के अतिथि नहीं होते हैं । (अर्थात् ब्राह्मण अब्राह्मण के आने पर उनके लिये पूर्वोक्त अतिथिपूजा न करके उन्हें केवल जल और भोजन दे) ॥ ३९ ॥

यज्ञे संवृतश्चेत् ॥ ४० ॥

यज्ञकाल आहु(हू)तश्चेदतिथिवत्पूज्यः ॥ ४० ॥
अब्राह्मण (क्षत्रिय आदि) यज्ञ के समय बुलाये गये हों तो उनकी पूजा अतिथि के समान करनी चाहिए ॥ ४० ॥

तत्रापि—

भोजनं तु क्षत्रियस्योर्ध्वं ब्राह्मणेभ्यः ॥ ४१ ॥

तस्यातिथिपक्षेऽपि ब्राह्मणेपु भुक्तवत्सु पश्चाद्भोजनं देयम् ॥ ४१ ॥
ब्राह्मणों को भोजन कराने के उपरान्त ही क्षत्रिय अतिथि को भोजन देना चाहिए ॥ ४१ ॥

अन्यान्भृत्यैः सहाऽऽनृशंस्यार्थमानृशंस्यार्थम् ॥ ४२ ॥

अन्यान्शूद्रादीनातिथ्यकाल आगतान्भृत्यैः कर्मकरादिभिः सह सति विभवे भोजयेत् । यद्यपि तेषामतिथित्वं न भवति तथाऽप्यानृशंस्यार्थम् । नृशंसता प्रत्यक्षक्रौर्यं तद्राहित्याय । आनृशंस्यं परो धर्म इत्यानृशंस्यमपि परो धर्म एवेति [ अभ्यासोऽध्यायसमाप्त्यर्थः ] ॥ ४२ ॥
इति श्रीगौतमीयवृत्तौ हरदत्तविरचितायां मिताक्षरायां प्रथमप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
आतिथ्य के समय आये हुए अन्य शूद्रों आदि को सेवकों के साथ दया के कारण भोजन कराना चाहिए ॥ ४२ ॥

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