भारतकोश
गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Gautama Dharmasutra Hindi

महर्षि गौतम द्वारा

स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished360 पृष्ठ

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सानुवाद-मिताक्षरावृत्तिसहितानि ६५

सभी का ( अयोग्य व्यक्ति का भी ) यज्ञ करा सकता है, सबको पढ़ा सकता है और सबका दान ले सकता है ॥ ४ ॥

पूर्वः पूर्वो गुरुः ॥ ५ ॥

एतेषां याजनादीनां यो यः पूर्वनिर्दिष्टः स स उत्तरस्माद्गुरुर्ज्ञेयः । आपदि प्रतिग्रहेण जीवेत्तदसंभवेऽध्यापनेन तदसंभवे याजनेनेति ॥ ५ ॥

इन ( याजन, अध्यापन और प्रतिग्रह कर्मों ) में क्रमशः पहले निर्दिष्ट कर्म अपने उत्तरवर्ती कर्म की अपेक्षा बड़ा होता है । ( आपत्ति काल में पहले दान लेकर जीविका चलानी चाहिए, उससे जीविका न चले तो अध्यापन करे और उससे भी जीविका न चले तो याजन द्वारा जीविका निर्वाह करे ॥ ५ ॥

तदलाभे क्षत्रवृत्तिः ॥ ६ ॥

इदं ब्राह्मणविषयम् । गर्हितयाजनादेरप्यलाभे क्षत्रवृत्तिः स्यात् । ब्राह्मणः सेवादिना जीवेत् । आपदि निवृत्तायां नारदः—

आपदं ब्राह्मणस्तीर्त्वा क्षत्रवृत्त्या भृते जने । उत्सृजेत्क्षात्रवृत्तिं तां कृत्वा पावनमात्मनः ॥ इति ॥ ६ ॥

उपर्युक्त निन्दित याजन आदि कर्म से भी जीविका न चल सके तो ब्राह्मण क्षत्रिय का कर्म करके जीवन निर्वाह करे ॥ ६ ॥

तदलाभे वैश्यवृत्तिः ॥ ७ ॥

क्षत्रवृत्तेरप्यलाभे वैश्यवृत्त्याऽपि जीवेद्ब्राह्मणः । अलाभग्रहणं वृत्तिसंकरो मा भूदिति । क्षत्रियस्य वैश्यवृत्त्युपजीवनं दण्डापूपन्यायेन सिद्धम् ॥ ७ ॥

क्षत्रिय के कर्मों द्वारा भी कोई लाभ न हो तो वैश्य की वृत्ति अपनाकर जीवन निर्वाह करे ॥ ७ ॥

तस्यापण्यम् ॥ ८ ॥

तस्य वैश्यवृत्तेर्ब्राह्मणस्यापण्येन विक्रेयं वक्ष्यते । तस्येति वचनात्क्षत्रियस्य वैश्यवृत्त्युपजीविनो वक्ष्यमाणमपण्यं न भवति ॥ ८ ॥

आपत्काल में वैश्य वृत्ति से जीवन निर्वाह करने वाले ब्राह्मण को आगे निर्दिष्ट वस्तुएँ नहीं बेचनी चाहिए ॥ ८ ॥

गन्धरसकृतान्नतिलशाणक्षौमाजिनानि ॥ ९ ॥

गन्धश्चन्दनादिः । रसस्तैलघृतलवणगुडादिः । कृतान्नं मोदकापूपादि । तिलाः प्रसिद्धाः । शाणं शणविकारो गोण्यादिः । क्षौमं क्षुमोद्-

५ गौ० ध०