भारतकोश
गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Gautama Dharmasutra Hindi

महर्षि गौतम द्वारा

स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished360 पृष्ठ

पृष्ठ 149, कुल 360 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 149

.८४ गौतमधर्मसूत्राणि

मार्ग से प्रवेश करना, पैर से पैर धोना, बैठने के आसन पर रखे हुए अन्न का भोजन (अथवा जिस आसन पर बैठकर भोजन करना चाहिए उस पर भोजन रखकर खाना), बाहुओं से तैरकर नदी (तालाब आदि) पार करना, वृक्ष पर और ऊँची-नीची भूमि पर चढ़ना उतरना, और प्राणसंकट से युक्त कर्म करना—इन सबका त्याग करे ॥ ३२ ॥

न संदिग्धां नावमधिरोहेत् ॥ ३३ ॥

पारगमने संदिग्धामसमर्थां नावं नाधितिष्ठेत् ॥ ३३ ॥
जिस नाव के पार पहुँचने में सन्देह हो उस पर न चढ़े ॥ ३३ ॥

प्रतिपदपाठस्याशक्यत्वात्संक्षिप्याऽऽह—

सर्वत एवाऽऽत्मानं गोपायेत् ॥ ३४ ॥

सर्वेभ्य उपायेभ्य आत्मानं रक्षयेत्। एको न गच्छेदध्वानमित्यादिभ्यः ॥ ३४ ॥
सभी उपायों से अपनी रक्षा करे ॥ ३४ ॥

न प्रावृत्य शिरोऽहनि पर्यटेत् ॥ ३५ ॥

प्रावृत्याऽऽशिरसो दिवा चङ्क्रमणप्रतिषेधः। आसीनस्य यथारुचि। मार्गे वर्षातपादिबाधे प्रावृत्यापि चङ्क्रमणे न दोषः। सर्वत एवाऽऽत्मानं गोपायेत्युक्तत्वाद् ॥ ३५ ॥
दिन में सिर ढककर (सिर तक ढककर) न घूमे ॥ ३५ ॥

प्रावृत्य रात्रौ ॥ ३६ ॥

रात्रौ तु शिरः प्रावृत्यैव पर्यटेत् ॥ ३६ ॥
रात्रि में सिर ढककर ही घूमे ॥ ३६ ॥

मूत्रोच्चारे च ॥ ३७ ॥

मूत्रणं मूत्र उच्चारः पुरीषकर्म तयोः समाहारद्वंद्वः। तत्र च शिरः प्रावृत्य प्रावृतशिराः कर्म कुर्यादिति शेषः ॥ ३७ ॥
मूत्र और मल त्याग के समय सिर ढका रखे ॥ ३७ ॥

न भूमावनन्तर्धाय ॥ ३८ ॥

मूत्रपुरीषकर्मणी भूमौ तृणादिभिरन्तर्धायैव कुर्यात्। अयज्ञियैस्तृणैरिति स्मृत्यन्तरे ॥ ३८ ॥
मूत्र और पुरीष कर्म भूमि (अयज्ञिय) तृणों से छिपाये बिना न करे ॥ ३८ ॥