गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Gautama Dharmasutra Hindi
महर्षि गौतम द्वारा
स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 162, कुल 360 में से
संदर्भ में पढ़ेंसानुवाद-मिताक्षरावृत्तिसहितानि ९७
असमर्थ हों ) भय से पीठ दिखाकर भागने वाले, ( भागने में असमर्थ होने से ) अशक्त होकर बैठे हुए, ( छिपने के लिये भय से ) ऊँचे स्थान और वृक्ष पर चढ़े हुए को, दूत को, तथा अपने को गौ या ब्राह्मण बताने वाले को छोड़कर ( अन्य शत्रुपक्षी को हिंसा करने से राजा को कोई दोष नहीं लगता ) ॥ १८ ॥
क्षत्रियश्चेदन्यस्तमुपजीवेत्तद्वृत्त्या ॥ १९ ॥
अन्यश्चेत्क्षत्रियस्तं राजानं देशोपप्लवादिनोपजीवेत्तदा तद्वृत्त्या तस्य राज्ञो या वृत्तिश्चर्या रथधनुर्भ्यामित्यादिका तया युक्तः सञ्जीवेत्। तेन राज्ञैवमसौ संमत इति ॥ १९ ॥
कोई अन्य क्षत्रिय उस राजा के अधीन उसकी वृत्ति से निर्वाह करता हो वह राजा के समान ही ( रथ पर आरूढ़ हो तथा धनुष धारण कर घूमने एवं युद्ध में लड़ने का ) आचरण करे ॥ १९ ॥
जेता लभेत सांग्रामिकं वित्तम् ॥ २० ॥
राज्ञा नियुक्तो राजभृत्यादिः संग्रामे शत्रून्निर्जित्य यद्वित्तं लभते तत्स एव जेता लभेत न राजा ॥ २० ॥
( राजा द्वारा नियुक्त ) जेता योद्धा युद्ध में विजयोपरान्त शत्रुओं से छीनी गई सम्पत्ति का स्वामी होता है ( राजा नहीं ) ॥ २० ॥
वाहनं तु राज्ञः ॥ २१ ॥
वाहनं हस्त्यश्वादिकं निर्जित्य लब्धं राज्ञो भवति न जेतुः ॥ २१ ॥
युद्ध में जीते गये ( छीने गये ) हाथी आदि वाहन राजा को मिलते हैं ( राजा द्वारा नियुक्त विजयी योद्धा को नहीं ) ॥ २१ ॥
उद्धारश्चापृथग्जये ॥ २२ ॥
यदि सर्वे सैनिकाः संभूय जयेयुर्जित्वा च किमपि लभेरंस्तस्मिन्न- पृथग्जये राज्ञ उद्धारो विशेषद्रव्यं स्वयं वृतो देयः ॥ २२ ॥
यदि सभी सैनिक मिलकर विजय प्राप्त करें तो युद्ध में प्राप्त धन में से वे राजा को उसका विशिष्ट धन अर्पित करें ॥ २२ ॥
अन्यत्तु यथार्हं भाजयेद्राजा ॥ २३ ॥
यत्तत्स्वयं वृतं माणिक्यादि ततोऽन्यद्यथार्हं यस्य यावान्व्यापारो यावद्वा शौर्यं तदनुरूपेण भाजयेत् । यथैते तदनुरूपं भजेरंस्तथा कार- येदिति ॥ २३ ॥
७ गौ० ध०