भारतकोश
गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Gautama Dharmasutra Hindi

महर्षि गौतम द्वारा

स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished360 पृष्ठ

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सानुवाद-मिताक्षरावृत्तिसहितानि १०५

अपनी ही पत्नियों से सम्बन्ध रखे ॥ ५६ ॥

परिचर्या चोत्तरेषाम् ॥ ५७ ॥

उत्तरेषां त्रयाणां वर्णानां परिचर्या शुश्रूषा च ॥ ५७ ॥
अपने से उच्च वर्णों की सेवा करे ॥ ५७ ॥
सैषा वृत्त्यर्थेत्याह—

तेभ्यो वृत्तिं लिप्सेत ॥ ५८ ॥

तेभ्यः परिचरितेभ्यो जीवनं लिप्सेत ॥ ५८ ॥
(उच्चवर्णों की सेवा करके) उन्हीं से जीविका निर्वाह की इच्छा रखे ॥ ५८ ॥

तत्र पूर्वं पूर्वं परिचरेत् ॥ ५९ ॥

तथा चाऽऽपस्तम्बः—पूर्वस्मिन्पूर्वस्मिन्वर्णै निःश्रेयसं भूय इति। तदेवं यथा याजनाध्यापनप्रतिग्रहेषु ब्राह्मणस्य प्रतिग्रहो मुख्या वृत्तिस्तथा शूद्रस्य परिचर्या। तत्रापि पूर्वस्मिन्पूर्वस्मिन्वर्ण इति ॥ ५९ ॥
उन वर्णों में भी यथासंभव पहले वाले वर्ण की सेवा करे। (अर्थात् ब्राह्मण की सेवा करे; ऐसा संभव न होने पर क्षत्रिय की सेवा करे, अन्यथा वैश्य की सेवा करे) ॥ ५९ ॥

जीर्णान्युपानच्छत्रवासःकूर्चादीनि ॥ ६० ॥

कूर्चं तृणादि। शेषं प्रसिद्धम्। जीर्णान्युपभुक्तान्युपानदादीनि परिचरते शूद्राय देयानि। अयं तु शुश्रूषावृत्तेः शूद्रस्य नियमो न गृहस्थवृत्तेः। तस्य तु वृत्त्यनपेक्षं सामान्याकारेण विशेषत्वम् ॥ ६० ॥
(द्विजों द्वारा दिये गये) पुराने जूते, छाते, वस्त्र और चटाई आदि का उपयोग करे ॥ ६० ॥
पुनः प्रकृतमनुसरति—

उच्छिष्टाशनम् ॥ ६१ ॥

भोजनपात्रे यद्भुक्तावशिष्टं तदस्याशनम्। नाब्राह्मणायोच्छिष्टं प्रयच्छेदित्येतत्तु दासविषयम्। गृहस्थशूद्रविषयमन्ये। तथा च व्याघ्रः—
उच्छिष्टमन्नं दातव्यं शूद्रायागृहमेधिने।
गृहस्थाय तु दातव्यमनुच्छिष्टं दिने दिने ॥ इति ॥ ६१ ॥
द्विजातियों का जूठा (पात्र में छोड़ा हुआ) भोजन खाये ॥ ६१ ॥