गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Gautama Dharmasutra Hindi
महर्षि गौतम द्वारा
स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 230, कुल 360 में से
संदर्भ में पढ़ेंसानुवाद-मिताक्षरावृत्तिसहितानि १६५
इतरासु भार्यासु कल्प्यमत आह—
तस्मात्तदहर्ब्रह्मचारी च स्यात् ॥ २४ ॥
मानवे दातुरपि नियम उक्तः—
निमन्त्रितो द्विजः पित्र्ये नियतात्मा भवेत्सदा ।
न च च्छन्दांस्यधीयीत यस्य श्राद्धं च तद्भवत् ॥ इति ॥ २४॥
इसलिए उस रात्रि ब्रह्मचारी रहना चाहिए ॥ २४ ॥
श्वचाण्डालपतितावेक्षणे दुष्टम् ॥ २५ ॥
श्वादिभिरवेक्षितमन्नं दुष्टमभोज्यं भवति । श्राद्धं चावेक्षितं दुष्टमकृतं भवति ॥ २५ ॥
जिस अन्न पर कुत्ता, चाण्डाल और ब्रह्महत्यादि पाप से युक्त व्यक्ति की दृष्टि पड़ी हो वह भोजन करने योग्य नहीं होता ( और इसी प्रकार जिस श्राद्ध पर उनकी दृष्टि पड़े वह व्यर्थ हो जाता है ) ॥ २५ ॥
यस्मादेवम्—
तस्मात्परिश्रिते दद्यात् ॥ २६ ॥
परिश्रयणं तिरस्करिण्यादिना व्यवधानम् ॥ २६ ॥
अतएव श्राद्धभोजन घिरे हुए स्थान पर कराना चाहिए ॥ २६ ॥
तदशक्तौ—
तिलैर्वा विकिरेत् ॥ २७ ॥
अत्र भृगुः—पानीयमपि यद्दत्तं तिलैर्मिश्रं द्विजस्य तु ।
पितृभ्यः कामधुक्त्तत्स्यात्पितृगुह्यमिदं ततः ॥ इति ॥२७॥
अथवा ( यदि घिरे हुए स्थान पर भोजन न करा सके तो ) उस स्थान पर तिल बिखेर दे ॥ २७ ॥
पङ्क्तिपावनो वा शमयेत् ॥ २८ ॥
पङ्क्तिर्येन पाव्यते स पङ्क्तिपावनः। श्वाद्यवेक्षणे यो दोषस्तं शमयेत् ॥ २८ ॥
अथवा पंक्ति को पवित्र करने वाला व्यक्ति उपर्युक्त अपवित्रताओं को दूर करता है ॥ २८ ॥