गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Gautama Dharmasutra Hindi
महर्षि गौतम द्वारा
स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 275, कुल 360 में से
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ऐसे त्याज्य व्यक्ति के आचार्य, गुरु और उपाध्याय को तथा मामा आदि सभी सम्बन्धियों को बुलाकर ( उस त्याज्य व्यक्ति के लिए ) श्राद्ध के सभी उदकदान आदि कर्म करे ॥ २ ॥
पात्रं चास्य विपर्यस्येयुः ॥ ३ ॥
अस्य त्याज्यस्य पात्रं किंचित्कल्पयित्वा त एव विपर्यस्येयुः । विपर्यासोऽधोमुखीकरणम् । यथा तदनुदकं भवति ॥ ३ ॥
उसके बाद उस ( त्याज्य व्यक्ति ) के नाम पर जल से पूर्ण घड़ा ( इस प्रकार ) उलट दे ॥ ३ ॥
तत्र प्रकारमाह—
दासः कर्मकरो वाऽवकरादमेध्यपात्रमानीय दासीघटात्पूरयित्वा दक्षिणामुखो यदा विपर्यस्येदमुकमनुदकं करोमीति नामग्राहम् ॥ ४ ॥
दासः प्रसिद्धः । कर्मकरो भृतकः । तयोरन्यतरोऽवकरादवस्करात् । वर्चस्केऽवस्करः । अमेध्यात्स्थानादशुचि पात्रं किंचिदुपादाय येन दास्यूदकमाहरति तस्माद् घटाद् गृहीतेनोदकेन पूरयित्वा दक्षिणामुखो भूत्वा यदाऽपसव्येन विपर्यस्येदपसव्यमधोमुखं विक्षिपेत् । तत्र मन्त्रः—अमुकमनुदकं करोमीति । नामग्राहम् । अमुकमिति स्थाने त्याज्यस्य नाम द्वितीयान्तं गृहीत्वा । नाम्न्या दिशिमहोरिति णमुल् । ग्राह इति पाठे रूपसिद्धिश्चिन्त्या ॥ ४ ॥
कोई दास या नौकर किसी ( घूरा आदि ) अशुद्ध स्थान से एक अपवित्र घड़ा लाकर उसे किसी दासी के घड़े के जल से भरे और अपना मुँह दक्षिण की ओर करके उस व्यक्ति का नाम लेकर अमुक को उदक से वञ्चित करता हूँ ऐसा कहते हुए पैर से घड़े को उलट दे ॥ ४ ॥
तं सर्वेऽन्वालभेरन्प्राचीनावीतिनो मुक्तशिखाः ॥ ५ ॥
तं विपर्यस्यन्तं सर्वे ज्ञातयः प्राचीनावीतिनो मुक्तशिखाः सन्तोऽन्वालभेरन्स्पृशेयुः ॥ ५ ॥
सभी बन्धु-बान्धव अपने यज्ञोपवीत को दाहिने कंधे के ऊपर और बाएँ हाथ के नीचे करके अपनी अपनी शिखा को खोलकर उस दास का स्पर्श करें ॥ ५ ॥