गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Gautama Dharmasutra Hindi
महर्षि गौतम द्वारा
स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१४ | गौतमधर्मसूत्राणि
आचार्य की आज्ञा पाकर (ब्रह्मचारी) उनकी दाहिनी ओर पूर्व की ओर मुख करके अथवा उत्तर की ओर मुख करके बैठे ॥ ५५ ॥
सावित्री चानुवचनम् ॥ ५६ ॥
तत्संवितुर्वरेण्यमित्येषा नत्वन्या सवितृदेवत्या । सा वाऽनुवचनं प्रत्यध्ययनं पठनीयेति ॥ ५६ ॥
प्रतिदिन के अध्ययन के समय सावित्री मन्त्र का (‘ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्’ सवितृ देवता के इसी मन्त्र का किसी दूसरे मन्त्र का नहीं) उच्चारण करे ॥ ५६ ॥
आदितो ब्रह्मण आदाने ॥ ५७ ॥
पाणिना सव्यमुपसंगृह्येत्यादि सावित्र्यनुवचनान्तं यदुक्तं तदिदं ब्रह्मणो वेदस्य गुरोः सकाशादादित आदानकाले कर्तव्यम् । उपनयनादनन्तरं सावित्र्युपदेशकाले च, प्रत्यहं तु तत्र चक्षुर्मनस्त्वम् । प्रातरध्ययनाद्यन्तयोश्च गुरोः पादोपसंग्रहणमनुज्ञातोपवेशनं च कर्तव्यम् ॥ ५७ ॥
गुरु से वेद का ज्ञान ग्रहण करते समय (गुरु के बायें पैर को दाहिने हाथ से छूने से लेकर सावित्री मन्त्र के उच्चारण तक के पूर्वोक्त कार्य) आरम्भ से करना चाहिए ॥ ५७ ॥
ॐ कारोऽन्यत्रापि ॥ ५८ ॥
सावित्र्यनुवचनादन्यत्राप्योंकारो वक्तव्यः । प्रत्यहमध्ययनकाल इत्यर्थः ॥ ५८ ॥
(सावित्री मन्त्र के उच्चारण के साथ ॐ का उच्चारण करने के अतिरिक्त) अन्यत्र (प्रतिदिन अध्ययन के समय) ॐ का उच्चारण करना चाहिए ॥ ५८ ॥
अन्तरागमने पुनरुपसदनम् ॥ ५९ ॥
गुरोः शिष्यस्य च मध्ये गमनमन्तरागमनम् । यस्य कस्याप्यन्तरागमने पुनरुपसदनं कर्तव्यम् । पाणिना सव्यमित्याद्योंकारेऽन्यत्रापीत्यन्तमुपसदनम् ॥ ५९ ॥
(गुरु और शिष्य के) बीच में किसी भी प्राणी के आ जाने पर पुनः गुरु के चरण स्पर्श (आदि पूर्वोक्त कर्म) करने होते हैं ॥ ५९ ॥
श्बनकुलसर्पमण्डूकमाजराणां त्र्यहमुपवासो विप्रवासश्च ॥ ६० ॥
श्वादीनामन्तरागमने त्र्यहमुपवासो विप्रवासश्च कर्तव्यः । विप्रवास आचार्यकुलादन्यत्र वासः । मनुस्तु—