भारतकोश
गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Gautama Dharmasutra Hindi

महर्षि गौतम द्वारा

स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished360 पृष्ठ

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पृष्ठ 86

सानुवाद-मिताक्षरावृत्तिसहितानि २१

(ब्रह्मचारी को) मधु, (मृग आदि का) मांस, (चन्दन आदि) गन्ध, पुष्प, दिन में शयन, आंखों में अञ्जन लगाना, शरीर के अंगों में तेल या सुगन्धित लेप लगाना, रथ या गाड़ी की सवारी, जूता, छाता, काम, क्रोध, लोभ (द्रव्य आदि की इच्छा), मोह (विवेकशून्यता), अधिक भाषण, वीणा आदि का वादन, आनन्द के लिये स्नान, दन्तधावन, हर्ष प्रकट करना, नृत्य, गीत, परनिन्दा और भय के कर्म (जैसे घोर वन में प्रवेश)—इन सबका परित्याग करना चाहिए ॥ १९ ॥

गुरुदर्शने कण्ठप्रावृतावसक्थिकापाश्रयणपादप्रसारणानि ॥

गुरवः पित्राचार्यादयः । तेषां दर्शनयोग्ये देशे कण्ठप्रावृतादीनि वर्जयेत् । कण्ठप्रावृतं कण्ठप्रावरणं वस्त्रादिना । अवसक्थिका, गु(ऊ)रौ पादमारोप्यावस्थानम् । अपाश्रयणं कुड्यस्तम्भाद्याश्रित्यऽऽसनम् । पादप्रसारणं प्रसिद्धम् । गुरुजनसकाशे विनयसंकोचेन तिष्ठेदित्यर्थः ॥ २० ॥

गुरु (पिता, आचार्य आदि श्रेष्ठ जनों) के सम्मुख कण्ठ ढकना, गुरु की ओर पैर करके बैठना (या जाँघ पर पैर रखकर बैठना), दीवाल या खम्भे आदि का सहारा लेकर बैठना तथा पैर फैलाना (वर्जित है) ॥ २० ॥

निष्ठीवितहसितविष्क(जृ)म्भितावस्फोटनानि ॥ २१ ॥

वर्जयेदिति । निष्ठीवितं कण्ठाच्छ्लेष्मणः सशब्दं बहिर्निर्सनम् । हसितं हासः । विजृम्भितं जृम्भिका । अवस्फोटनमङ्गुलीनां सशब्दमुपमर्दनम् ॥ २१ ॥

खखारना, हँसना, जम्हाई लेना और अंगुलियों को चटकाना ये कार्य भी गुरु के समक्ष न करे ॥ २१ ॥

स्त्रीप्रेक्षणालम्भने मैथुनशङ्कायाम् ॥ २२ ॥

स्त्रीणां प्रेक्षणमवयवशो निरूपणं न यादृच्छिकं दर्शनम् । आलम्भनं स्पर्शनं ते अपि वर्जयेत् । मैथुनशङ्कायामिति वचनाद्बालवृद्धातुरासु स्वयं च तथाविधस्य न दोषः ॥ २२ ॥

मैथुन की शंका हो तो स्त्री (के अङ्गों) की ओर (कामुकतापूर्वक) दृष्टिपात और उनका स्पर्श न करे अर्थात् सहसा दृष्टि पड़ जाने और मैथुन की शंका न होने पर छोटी बच्ची, वृद्धा या रोगिणी को देखने एवं स्पर्श करने में दोष नहीं है ॥ २२ ॥