भारतकोश
गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Gautama Dharmasutra Hindi

महर्षि गौतम द्वारा

स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished360 पृष्ठ

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पृष्ठ 96

सानुवाद-मिताक्षरावृत्तिसहितानि ३१

चण्डालाः प्रत्यवसिताः परिव्राजकतापसाः ।
तेषां जातान्यपत्यानि चण्डालैः सह वासयेत् ॥ इति ॥ ३ ॥
इन आश्रमों में ( स्थित पुरुषों का ) गृहस्थाश्रम ही उत्पत्तिस्थान है; क्योंकि गृहस्थाश्रम के अतिरिक्त अन्य आश्रमों में सन्तान-उत्पत्ति की व्यवस्था नहीं है ॥ ३ ॥

इदानीमाश्रमधर्मान्वक्ष्यन्प्रथमनिर्दिष्टस्य ब्रह्मचारिण आह—
तत्रोक्तं ब्रह्मचारिणः ॥ ४ ॥
तत्र तेषां मध्ये ब्रह्मचारिणो नैष्ठिकस्य यदुपकुर्वाणस्योपनयनादिर्नियम इत्यारभ्योक्तं तदेवास्यापीत्युक्तं भवति ॥ ४ ॥
इन आश्रमों में ब्रह्मचारी के नियम पहले बता दिये गये हैं ( अर्थात् नैष्ठिक ब्रह्मचारी को उन्हीं नियमों का पालन करना चाहिए ) ॥ ४ ॥

तत्र विशेषः—
आचार्याधीनत्वमान्तम् ॥ ५ ॥
आन्तमादेहपातम् । आचार्यकुल एव तच्छुश्रूषया वर्तेत ॥ ५ ॥
नैष्ठिक ब्रह्मचारी जीवनपर्यन्त आचार्य के अधीन ( गुरुकुल में निवास करते हुए एवं आचार्य की सेवा करते हुए ) रहे ॥ ५ ॥

गुरोः कर्मशेषेण जपेत् ॥ ६ ॥
आचार्ये प्रकृते गुरुशब्दः पित्रोरपि ग्रहणार्थः । ततश्चाऽऽचार्यं पितरौ च शुश्रूषमाणस्तद्व्यतिरिक्ते काले जपेद्वेदमधीयीत । न तु स्वाधीनो भवेत् ॥ ६ ॥
आचार्य ( और माता-पिता ) की सेवा के उपरान्त शेष समय में जप करे ॥ ६ ॥

गुर्वभावे तदपत्यवृत्तिस्तदभावे वृद्धे सब्रह्मचारिण्यग्नौ वा ॥ ७ ॥
आचार्ये या वृत्तिरभिहिता सा तदभावे तत्पुत्रे, तत्पुत्राभावे वृद्धे विद्यया वयसा वाऽधिके, वृद्धाभावे तथाभूते सब्रह्मचारिणि, सब्रह्मचार्याभावेऽग्नौ वा कर्तव्या । समिदाधानादिभिरग्नौ वृत्तिः ॥ ७ ॥
गुरु के न होने पर उनके प्रति बताई गई वृत्ति का आचरण उनके पुत्र के प्रति करे; उनके पुत्र के अभाव में ( विद्या में या आयु में ) श्रेष्ठ व्यक्ति के प्रति और उसके अभाव में अपने सहाध्यायी ब्रह्मचारी के प्रति उस वृत्ति का