गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थः सर्गः—स्निग्धमधुसूदनः १७३ करके वह रोने लगती है, श्रीकृष्णके वियोगजन्य दुःखको कैसे सहन कर पाऊँगी, यह सोचकर काँपने लगती हैं। स्वेद—ग्लानियुक्त होकर पसीने-पसीने हो जाती हैं। स्तम्भ—नित्य निरन्तर आपका ध्यान करती हैं। आँखें मूँद लेती हैं, मानो सारे इन्द्रिय व्यापार स्थगित हो गये हों। वेपथुका द्वितीय उदाहरण 'उद्भ्रमति' क्रीड़ादि स्थलोंमें आपको प्राप्त करनेकी इच्छासे भ्रमण करती हैं। स्वरभङ्ग—'प्रमीलति' का अर्थ है आपके आलिङ्गन आदिका ध्यान करके अपनी आँखोंको बन्द कर लेती हैं। वह कुछ बोल नहीं पातीं। स्तम्भका द्वितीय उदाहरण 'पतति' पदका अभिप्राय यह है कि वह, चलती हुईं अत्यन्त क्षीण तथा दुर्बल शरीरके कारण गिर पड़ती हैं। प्रलय—'उद्यति' पदके द्वारा बतलाया है कि वह गिरकर पुनः उठ खड़ी होती हैं और 'मूर्च्छति' पदके द्वारा प्रलय नामक सात्त्विक भावको सखी निर्दिष्ट करती है। इस प्रकार श्रीराधाकी प्रिय सखीने श्रीकृष्णसे कहा है, अश्विनीकुमारकी भाँति स्ववैद्य सुचिकित्सक यदि आप श्रीराधा पर प्रसन्न हो जाएँ तो क्या यह उनकी कन्दर्प-विकार जनित बीमारी दूर नहीं होगी? यद्यपि बुखारकी इस अवस्थामें रसायन निषिद्ध हैं तथापि उनके शरीरमें नलिनी (कमल) दलका स्थापन, तालके पंखा आदिसे वीजन—कुछ भी उस विरह-व्याधिको उपशमित नहीं करता है, अपितु क्रमशः वर्द्धित होता जाता है। वह इतनी दुर्बल हो गयी हैं कि बस हाथोंको ही हिला पाती हैं—यदि वह यह जान ले कि आप उन्हें नहीं मिलेंगे तो उनका मरण सुनिश्चित ही है। आपमें ही दत्तचित्तवाली उसे आप दर्शन देकर जीवित नहीं करते हैं, तो फिर आपको आश्रितोंके परित्यागका पाप भी लगेगा।