भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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१७२ श्रीगीतगोविन्दम् करती हैं, क्रीड़ास्थलोंमें भ्रमण करती हैं, विषम विभ्रमके कारण विह्वल हो नेत्रोंको निमीलित कर लेती हैं, कभी वसुधा पर गिर पड़ती हैं, पुनः उठकर चलनेकी तैयारीमें फिर मूर्च्छित हो गिर जाती हैं, उन्हें सन्निपात ज्वर हो गया है। यदि आप प्रसन्न होकर इस घोरतर मदन-विकारमें उसे औषधिरूप रसामृत प्रदान करें, तो उन्हें प्राण-दान मिलेगा। अन्यथा अब तो उनकी हाथोंकी चेष्टाएँ भी समाप्त हो जायेंगी-मर जायेंगी वह। पद्यानुवाद- कभी पुलकती, कभी विलपती और विसुध है होती 'सी सी' करके कभी सिहरती कभी बिहँसती, रोती। गिरती उठती, चलती, फिरती, जगती-सी सो जाती तीव्र ज्वराकुल-सी लगती है, पीड़ामें खो जाती॥ बालबोधिनी-श्रीराधाको महाज्वरकी पीड़ा है-कामज्वर अब सन्निपात अवस्थामें पहुँच गया है। वह श्रीराधा न केवल बाह्यवृत्तिसे आपमें अनुरक्त हैं, अपितु सात्त्विक भावसे भी वह आपमें ही जी रही हैं। सात्त्विक भावसे प्रख्यात वह अनेकों चेष्टाएँ कर रही हैं, जिनके नाम हैं- स्तम्भः स्वेदोऽथ रोमाञ्चः स्वरभङ्गोऽथ वेपथुः। वैवर्ण्यमश्रुप्रलयावित्यष्टौ सात्त्विका मताः॥ रोमाञ्चति-इस पदके द्वारा श्रीराधाके रोमाञ्च नामके सात्त्विक भावका वर्णन किया है। 'रोमाञ्च विद्यते यस्य स रोमाञ्चः। रोमाञ्चित इत्यर्थः। तद्वदाचरति रोमाञ्चति।' जिसको रोमाञ्च हो गया है, उसको रोमाञ्चित कहते हैं और रोमाञ्चितके समान आचरण करनेकी क्रियाको 'रोमाञ्चति' कहा जाता है। वैवर्ण्य-आपकी चिन्ता और स्मृति बनी रहनेसे वह सीत्कार करती हैं। अश्रु एवं वेपथु-आपके (श्रीकृष्णके) गुणोंका स्मरण