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गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

१७२ श्रीगीतगोविन्दम् करती हैं, क्रीड़ास्थलोंमें भ्रमण करती हैं, विषम विभ्रमके कारण विह्वल हो नेत्रोंको निमीलित कर लेती हैं, कभी वसुधा पर गिर पड़ती हैं, पुनः उठकर चलनेकी तैयारीमें फिर मूर्च्छित हो गिर जाती हैं, उन्हें सन्निपात ज्वर हो गया है। यदि आप प्रसन्न होकर इस घोरतर मदन-विकारमें उसे औषधिरूप रसामृत प्रदान करें, तो उन्हें प्राण-दान मिलेगा। अन्यथा अब तो उनकी हाथोंकी चेष्टाएँ भी समाप्त हो जायेंगी-मर जायेंगी वह। पद्यानुवाद- कभी पुलकती, कभी विलपती और विसुध है होती 'सी सी' करके कभी सिहरती कभी बिहँसती, रोती। गिरती उठती, चलती, फिरती, जगती-सी सो जाती तीव्र ज्वराकुल-सी लगती है, पीड़ामें खो जाती॥ बालबोधिनी-श्रीराधाको महाज्वरकी पीड़ा है-कामज्वर अब सन्निपात अवस्थामें पहुँच गया है। वह श्रीराधा न केवल बाह्यवृत्तिसे आपमें अनुरक्त हैं, अपितु सात्त्विक भावसे भी वह आपमें ही जी रही हैं। सात्त्विक भावसे प्रख्यात वह अनेकों चेष्टाएँ कर रही हैं, जिनके नाम हैं- स्तम्भः स्वेदोऽथ रोमाञ्चः स्वरभङ्गोऽथ वेपथुः। वैवर्ण्यमश्रुप्रलयावित्यष्टौ सात्त्विका मताः॥ रोमाञ्चति-इस पदके द्वारा श्रीराधाके रोमाञ्च नामके सात्त्विक भावका वर्णन किया है। 'रोमाञ्च विद्यते यस्य स रोमाञ्चः। रोमाञ्चित इत्यर्थः। तद्वदाचरति रोमाञ्चति।' जिसको रोमाञ्च हो गया है, उसको रोमाञ्चित कहते हैं और रोमाञ्चितके समान आचरण करनेकी क्रियाको 'रोमाञ्चति' कहा जाता है। वैवर्ण्य-आपकी चिन्ता और स्मृति बनी रहनेसे वह सीत्कार करती हैं। अश्रु एवं वेपथु-आपके (श्रीकृष्णके) गुणोंका स्मरण

चतुर्थः सर्गः—स्निग्धमधुसूदनः १७३ करके वह रोने लगती है, श्रीकृष्णके वियोगजन्य दुःखको कैसे सहन कर पाऊँगी, यह सोचकर काँपने लगती हैं। स्वेद—ग्लानियुक्त होकर पसीने-पसीने हो जाती हैं। स्तम्भ—नित्य निरन्तर आपका ध्यान करती हैं। आँखें मूँद लेती हैं, मानो सारे इन्द्रिय व्यापार स्थगित हो गये हों। वेपथुका द्वितीय उदाहरण 'उद्भ्रमति' क्रीड़ादि स्थलोंमें आपको प्राप्त करनेकी इच्छासे भ्रमण करती हैं। स्वरभङ्ग—'प्रमीलति' का अर्थ है आपके आलिङ्गन आदिका ध्यान करके अपनी आँखोंको बन्द कर लेती हैं। वह कुछ बोल नहीं पातीं। स्तम्भका द्वितीय उदाहरण 'पतति' पदका अभिप्राय यह है कि वह, चलती हुईं अत्यन्त क्षीण तथा दुर्बल शरीरके कारण गिर पड़ती हैं। प्रलय—'उद्यति' पदके द्वारा बतलाया है कि वह गिरकर पुनः उठ खड़ी होती हैं और 'मूर्च्छति' पदके द्वारा प्रलय नामक सात्त्विक भावको सखी निर्दिष्ट करती है। इस प्रकार श्रीराधाकी प्रिय सखीने श्रीकृष्णसे कहा है, अश्विनीकुमारकी भाँति स्ववैद्य सुचिकित्सक यदि आप श्रीराधा पर प्रसन्न हो जाएँ तो क्या यह उनकी कन्दर्प-विकार जनित बीमारी दूर नहीं होगी? यद्यपि बुखारकी इस अवस्थामें रसायन निषिद्ध हैं तथापि उनके शरीरमें नलिनी (कमल) दलका स्थापन, तालके पंखा आदिसे वीजन—कुछ भी उस विरह-व्याधिको उपशमित नहीं करता है, अपितु क्रमशः वर्द्धित होता जाता है। वह इतनी दुर्बल हो गयी हैं कि बस हाथोंको ही हिला पाती हैं—यदि वह यह जान ले कि आप उन्हें नहीं मिलेंगे तो उनका मरण सुनिश्चित ही है। आपमें ही दत्तचित्तवाली उसे आप दर्शन देकर जीवित नहीं करते हैं, तो फिर आपको आश्रितोंके परित्यागका पाप भी लगेगा।

१७४ श्रीगीतगोविन्दम् प्रस्तुत श्लोकमें शार्दूलविक्रीड़ित नामक छन्द है। दीपक अलङ्कार है। विप्रलम्भ शृङ्गार-रस है। नायक अनुकूल अथवा दक्षिण है। नायिका उत्कण्ठिता है। सखी कहती है जो नायिकाकी सहायिका है। स्मरातुरां दैवत-वैद्य-हृद्य! त्वदङ्गसङ्गामृतमात्रसाध्यम्। निवृत्तबाधां कुरुषे न राधामुपेन्द्र! वज्रादपि दारुणोऽसि ॥२॥ अन्वय—हे दैवतवैद्यहृद्य, (देववैद्यादपि हृदयङ्गम! वैद्याभ्यास- कृत्यनिपुण इति वा) त्वदङ्गसङ्गामृतमात्रसाध्यां (तव अङ्गसङ्ग एव अमृतं तन्मात्रेण साध्यां प्रतिकार्यां) स्मरातुरां (कामार्त्तां) राधां [यदि] विमुक्त-बाधां (रोगमुक्तां) न कुरुषे (तर्हि) हे उपेन्द्र, त्वं वज्रादपि दारुणः (कठोरः) असि (भवसि) [यद्वा त्वम् उपेन्द्रवज्रादपि इन्द्रवज्रात् उप अधिकम् उपेन्द्रवज्रं तदपि चेद्भवोत् तस्मादपि, दारुणः असि]। [अङ्गसङ्ग-मात्र-साध्य- कर्माकरणेन काठिन्यमेव ते पर्यवसितमित्यर्थः] ॥२॥ अनुवाद—देववैद्य अश्विनीकुमारसे भी सुनिपुण सुचिकित्सक श्रीकृष्ण! हे उपेन्द्र! अनङ्गतापसे पीड़िता श्रीराधा एकमात्र आपके अङ्ग-संयोग रूप औषधामृतसे ही जीवन धारण कर सकती हैं। उस दुःसाध्य रोगवाली कामातुर श्रीराधाको इस मुमुर्षु दशामें यदि आप बाधा-रहित नहीं बनाते हैं तो निश्चय ही आप वज्रसे भी कठोर समझे जायेंगे। पद्यानुवाद— वैद्य! रसौषधि दे उसको अब फिरसे चेतन कर दो इङ्गित-भाषिणिकी जिह्वामें फिरसे वाणी भर दो॥ स्पृशामृतसे 'स्मर'-बाधाको हे हरि! सत्वर हर लो। काँप रही हूँ—कहीं न उरको, निठुर वज्र सा कर लो॥ बालबोधिनी—सखीने श्रीकृष्णको दो विशेषणोंसे विभूषित किया— (१) दैवतवैद्यहृद्य—श्रीकृष्णकी अभिरामता एवं मनोरमता स्वर्गलोकके वैद्य अश्विनीकुमारोंसे भी बढ़कर है।

चतुर्थः सर्गः—स्निग्धमधुसूदनः १७५ (२) उपेन्द्र—दुःखी देवताओंका कल्याण करनेके लिए श्रीकृष्णने माता अदितिके गर्भसे वामन भगवान्‌के रूपमें भी अवतार लिया था। इन्द्रके छोटे भाई होनेके कारण वे उपेन्द्र कहलाये। इस विशेषणसे श्रीकृष्णका आश्रितजनतासंरक्षणैकव्रतित्व का निदर्शन हुआ है। श्रीराधा काम-व्याधिसे आतुर बनी हुई हैं। उनके इस असाध्य रोगकी एकमात्र औषधि आपका संयोग है। आपके अङ्गोंका स्पर्श उनके लिए अमृतवत् है। कोई प्रयास भी तो नहीं करना है आपको। यदि आप अपने अङ्ग-सङ्गसे उनको संजीवित नहीं करते तो आप निश्चय ही वज्रसे भी अधिक कठोर माने जायेंगे। इस श्लोकका उपेन्द्रवज्रा वृत्त है। कन्दर्प-ज्वर-सञ्ज्वरातुर- तनोराश्चर्यमस्याश्चिरं चेतश्चन्दनचन्द्रमः-कमलिनी-चिन्तासु सन्ताम्यति किन्तु क्लान्तिवशेन शीतलतनुं त्वामेकमेव प्रियं ध्यायन्तीं रहसि स्थिता कथमपि क्षीणां क्षणं प्राणिति ॥३॥ अन्वय—कन्दर्पज्वरसंज्वरातुरतनोः (कन्दर्पज्वरेण यः संज्वरः सन्तापः तेन आतुरा कातरा तनुर्यस्य तस्याः) अस्याः (राधायाः) चेतः (चित्तं) चन्दन-चन्द्रमः-कमलिनी-चिन्तासु (चन्दनस्य चन्द्रसमः कमलिन्याः पद्मिन्याश्च स्पर्शनादिकन्तु दूरे आस्तां तेषां चिन्तासु) चिरं सन्ताम्यति (ग्लानिमुच्छति) [तर्हि कथं सा जीवतीत्याह]—किन्तु [असौ] क्षान्तिरसेन (त्वदागमन-प्रतीक्षा क्षान्तिः, तत्र यो रसोऽनुरागः तेन (शीतलतरं; चन्दनादयः शीतलाः त्वं शीतलतरः; यतः तदीयदोषेऽपि क्षमाशीलः; क्षमावतां देहे उष्णता न जायते इति भावः) एकम् (अद्वितीयम्; एतेन अनन्यगतित्वं सूचितं) प्रियं [त्वां] रहसि (एकान्ते) स्थिता ध्यायन्ती [सती] क्षीणापि (नितरां कृशापि) कथं (कथमपि) क्षणं प्राणिति (जीवति) [तत्तद्वस्तुस्मरणे ताम्यति भवद्ध्यानेतु जीवतीति] आश्चर्यमेतत् ॥३॥

१७६ श्रीगीतगोविन्दम् अनुवाद—हे माधव ! कैसे आश्चर्यकी बात है कि मदन-ज्वरके प्रबल सन्तापसे समाकुला क्षीणाङ्गी श्रीराधा चन्दन, चन्द्रमा और नलिनी आदि शीतोपचारके साधनका विचार करते ही सन्तप्त होने लगती हैं। अहो, क्लान्तिके कारण वह दुर्बला शीतल तनु आपका ही एकान्तमें ध्यान करती हुई किसी प्रकार कुछ क्षणोंके लिए जी रही है। पद्यानुवाद— चन्दन, चन्द, कमल—शीतल द्रव उसे जलाते रहते। किन्तु तुम्हारे शीतल तनका चिन्तन करते करते— विगत-ताप वह हो जाती है और विहँस है जाती। जादूगर! है क्या रहस्य यह, मैं न समझ हूँ पाती? बालबोधिनी—हे माधव ! इस सन्निपातकी अवस्थाको प्राप्त हुई वह आपके सङ्गमकी आकांक्षासे ही जी रही हैं, ज्वरको दूर करनेवाले सारे उपाय व्यर्थ हो गये हैं। न चन्दनका लेप काम करता है, न चन्द्रमाकी शीतल चाँदनी और न ही कमलिनी ही। स्थिति तो ऐसी चरम सीमा पर पहुँच गयी है कि इन साधनोंको सोचते हुए वह और अधिक जलने लगती हैं। ज्वर कभी-कभी चढ़ते-चढ़ते इतना थका देता है कि शरीर एकदम स्वेदके प्रभावके कारण शीतल हो जाता है। वह विरहिणी अपने अशान्त मनमें केवल तुम्हारा ही ध्यान करती हैं और विरहमें क्षीण होकर वह कातर विजातीय यन्त्रणामें भी उस ध्यानके क्षणको उत्सव मानकर प्राण प्राप्त करती हैं। यदि आप सोचें कि वह इस समय कैसे जी रही है, कैसे साँस ले रही हैं, तो उत्तर यही है कि आप ही उसके एकमात्र प्रियतम हैं, आपका शीतल वपु उसे स्पर्श करनेके लिए प्राप्त हो जाय। इस प्राप्त्याशामें कुछ क्षणों तक जी रही हैं। यदि आप अविलम्ब नहीं मिले तो हो सकता है वह पुनः जीवित न मिलें।

चतुर्थः सर्गः—स्निग्धमधुसूदनः १७७ प्रस्तुत श्लोकमें विरोधालङ्कार है, अद्भुत रस है तथा शार्दूलविक्रीड़ित छन्द है। क्षणमपि विरहः पुरा न सेहे नयन-निमीलन-खिन्नया यया ते। श्वसिति कथमसौ रसालशाखां चिरविरहेण विलोक्य पुष्पिताग्राम् ॥४॥ अन्वय—[हे कृष्ण] नयन-निमीलन-खिन्नया ("हा कथं नयने निमेषो मिलितः येन क्षणं कान्तदर्शनं विहन्यते इति" नयनयोः निमीलनेऽपि खिन्नया) यया पुरा ते (तव) क्षणमपि विरहो न सेहे, असौ पुष्पिताग्रां (सञ्जात-कुसुमाग्रां) रसालशाखां विलोक्य चिर-विरहेण कथं श्वसिति (प्राणिति); [निमेषविरहासहन- शीलायाः चिरविरह-सहनमतीवाश्चर्यम्] ॥४॥ अनुवाद—जो एक क्षणके लिए भी आपके दर्शनमें अन्तराल डालने वाले निमेष-निमीलनको सह नहीं पाती थीं, वही श्रीराधा तुम्हारे इस दारुण विरहमें सुललित सुपुष्पित आम्रवृक्ष (जिसके ऊपरकी शाखाओंमें नवीन पुष्प मञ्जरी संलग्न हैं) के समक्ष ही इस दीर्घकालिक विरहमें अवलोकन करते हुए कैसे जीवन अतिवाहित कर रही हैं—यह मैं नहीं समझ पा रही? पद्यानुवाद— जो राधा पल भर भी पहले, विरह न थी सह सकती, “पलकें क्यों बरबस लगती हैं”—विधिको कोसा करती। वही आज पुष्पित मधुरृतुमें, निरख तरुण आमोंको, क्या जाने कैसे रख पाती है, पापी प्राणोंको? बालबोधिनी—हे कृष्ण ! इससे पूर्व श्रीराधाने क्षणभरके लिए भी आपका वियोग नहीं सहा है। वह तो सदा-सर्वदा आपके पास रहती थीं। जब उनके नेत्रोंके पलक गिरते थे

१७८ श्रीगीतगोविन्दम् तो उस समय भी उनको बड़ा कष्ट होता था—सोचती थी ब्रह्माने यह पलक गिरनेकी प्रक्रिया क्यों बनायी है। आपके मुखावलोकनमें जरा-सी बाधा पड़ने पर भी जिनको अपार दुःख होता था, वह अब चिरकालसे इस विरहको रसालकी पुष्पिताग्रा शाखाओंको देखकर भी कैसे सह पा रही हैं? कैसे उसकी साँसें चलती हैं? हर डालके सिरे पर बौरे आ गये हैं, मञ्जरियाँ निकल आयी हैं। रसाल अर्थात् रसका समूह उसकी डालियाँ पुष्पिताग्रा हो गयी हैं। यह वसन्त ऋतुकी बेला है। वसन्त कालमें तो विरहियोंको वैसे ही मृत्युके तुल्य कष्ट होता है। अतएव हे श्रीकृष्ण! श्रीराधासे अविलम्ब मिलें। श्रीराधा यह भी अपने मनमें सोचकर जी रही हैं कि पुष्पिताग्रा रसाल शाखाको देखकर जिस प्रकारसे मैं कामार्त हूँ, उसी प्रकारसे श्रीकृष्ण भी मेरे लिए कामार्त होंगे। अतः वे अवश्य ही मुझसे मिलने आयेंगे। प्रस्तुत श्लोकमें पुष्पिताग्रा छन्द है। वृष्टि-व्याकुलगोकुलावन-रसादुद्धृत्य गोवर्धनं बिभ्रद्वल्लव-वल्लभीरधिकानन्दाच्चिरं चुम्बितः दर्पेणेव तदर्पिताधर-तटी-सिन्दूर-मुद्राङ्कितो बाहुर्गोपतनोस्तनोतु भवतां श्रेयांसि कंसद्विषः ॥५॥ इति गीतगोविन्दे नवम सन्दर्भः इति श्रीगीतगोविन्दे महाकाव्ये स्निग्ध-मधुसूदनो नाम चतुर्थः सर्गः। अन्वय—[इदानीमाशिषा सर्गं समापयति महाकविः]—गोपतनोः (गोपाल-रूपस्य) कंसद्विषः (कृष्णस्य) वृष्टिव्याकुलगोकुलावन- रसात् (वृष्टिभिः व्याकुलं यत् गोकुलं तस्य अवनं रक्षणं तस्य रसः अनुरागः तस्मात्) गोवर्द्धनम् (तन्नामानं गिरिम्) उद्धृत्य (उत्तोल्य) बिभ्रत् (दधानः) अधिकानन्दात् (वैदग्ध्य- सौन्दर्यादिकमुद्वीक्ष्य हर्षातिशयेनेत्यर्थः) वल्लव-वल्लभाभिः (गोपसुन्दरीभिः) चिरं चुम्बितः (दत्तचुम्बनः) [तथा] दर्पेण

चतुर्थः सर्गः—स्निग्धमधुसूदनः १७९ (अहङ्कारेणैव इन्द्रस्य विजिगीषया) तदर्पिताधरतटीसिन्दुर-मुद्राङ्कितः (ताभिर्गोपाङ्गनाभिः) अर्पिता दत्ता या अधरतट्यः अधरप्रदेशाः तासां सिन्दूर-मुद्रया सिन्दूर-चिह्नेन अङ्कितः युक्तः) बाहुः श्रेयांसि (मङ्गलानि) तनोतु (विस्तारयतु) [अतएव श्रीराधावैकल्य- श्रवणेन स्निग्धश्चेष्टारहितो मधुसूदनो यत्र स-इत्ययं सर्गश्चतुर्थः] ॥५॥ अनुवाद—जिन्होंने वारि-वर्षणसे व्याकुल गोकुलवासियोंकी रक्षाके लिए इन्द्रसे प्रतिस्पर्द्धा करते हुए गिरि गोवर्धनको ऊपर उठाकर धारण किया था, जो गोप युवतियोंके द्वारा दीर्घकाल पर्यन्त अतिशय रूपसे चुम्बित हुए थे, जिन पर गोपवधुओंके अधर-स्थित कुङ्कुम तथा ललाट स्थित सिन्दूर अङ्कित हुआ था, वे कंस विध्वंसकारी, गोपतनुधारी श्रीकृष्णकी भुजाएँ सबका मङ्गल विधान करें। बालबोधिनी—'मङ्गलान्तानि च शास्त्राणि प्रथन्ते' अर्थात् जिस शास्त्रके आदि, मध्य तथा अन्तमें मङ्गल होता है, उस शास्त्रका प्रचुर प्रचार होता है। इस नियमके अनुसार कवि जयदेवने ग्रन्थके चतुर्थ सर्गकी समाप्ति पर आशीर्वादात्मक मङ्गलाचरण प्रस्तुत किया है कि श्रीकृष्णकी वे भुजाएँ पाठकों एवं श्रोताओंका मङ्गल विधान करें। उन भुजाओंकी विशेषताएँ हैं— वृष्टि-व्याकुल-गोकुला वनरसादुद्धृत्य गोवर्धनं बिभ्रत्। अर्थात् क्रुद्ध होकर जब इन्द्रने गोकुलवनको विनष्ट करने हेतु पुष्कर एवं आवर्तक मेघोंसे भयङ्कर वर्षा करना प्रारम्भ किया था, उस समय समस्त गोपमण्डली व्याकुल हो गयी थी। यह देखकर गोकुलकी रक्षाके लिए श्रीकृष्णने गोवर्धनाद्रिको उखाड़कर अपने हाथपर उठा लिया था। तब शृङ्गार-उद्दीपक वीर रसका प्रकाश उनकी भुजाओंमें हुआ था। जब श्रीकृष्ण गोवर्धन पर्वत धारण किये हुए थे, तब गोपियाँ अतिशय आनन्दमग्न होकर श्रीकृष्णकी भुजाओंका चुम्बन करने लगी थीं।

१८० श्रीगीतगोविन्दम् श्रीकृष्णके वैदग्ध्य, माधुर्य एवं सौन्दर्य आदिका अवलोकन करके चुम्बन करनेवाली इन गोपियोंका ललाट-स्थित सिन्दूर और लाल-लाल ओंठोंकी लालिमा भी उन भुजाओंमें चिह्नित हो गई थी। इस प्रकार अपने इस सौभाग्यमदसे अङ्कित श्रीकृष्णकी भुजाएँ सबका कल्याण करें। स्निग्ध मधुसूदन—इस प्रकार श्रीराधाकी विकलताका श्रवणकर श्रीकृष्ण स्निग्ध-चेष्टाशून्य हो गये। श्रीगीतगाविन्द महाकाव्यमें स्निग्ध-मधुसूदन नामक चतुर्थ सर्गकी बालबोधिनी व्याख्या समाप्त।

पञ्चम सर्गः आकाङ्क्ष-पुण्डरीकाक्षः अहमिह निवसामि याहि राधा- मनुनय मद्वचनेन चानयेथाः। इति मधु-रिपुणा सखी नियुक्ता स्वयमिदमेत्य पुनर्जगाद राधाम् ॥१॥ अन्वय—अथ तदार्त्तिश्रवण-व्याकुलोऽपि स्वापराधचिन्तया निरतिशय-भीतः तत्कोपशिथिलीकरणाय श्रीहरिः सखीमेव प्रेषितवानित्याह—अहम् इह (अस्मिन् निर्जन प्रदेशे) निवसामि (तिष्ठामि); त्वं याहि (गच्छ); मम वचनेन राधाम् अनुनय (सान्त्वय) [यदि त्वया तन्मानोऽपनेतुं शक्यते तर्हि] इह आनयेथाश्च [सहसा मम गमनेन मानोऽतिगाढो भवेदित्यभिप्रायः] इति (इत्थं) मधुरिपुणा (कृष्णेण) नियुक्ता सखी स्वयम् एत्य (आगत्य) पुनः राधां जगाद ॥१॥ अनुवाद—राधा-सखीकी बात सुनकर श्रीकृष्ण बोले—मैं यहीं रहता हूँ, तुम श्रीराधाके पास जाओ और मेरे वचनोंके द्वारा उनको अनुनय-विनयके साथ मनाकर यहाँ ले आओ। इस प्रकार मधुरिपु कृष्णके द्वारा नियुक्त होकर वह सखी स्वयं श्रीराधाके पास आकर इस प्रकारसे कहने लगी। पद्यानुवाद— मैं बैठा हूँ यहीं और सखि! राधासे जा कहना— कब तक निठुर! और उत्पीड़न मुझको है यह सहना? बालबोधिनी—चतुर्थ-सर्गके प्रबन्धोंमें श्रीराधाकी विषम विरह-वेदनाका वर्णन हुआ है। सखीसे श्रीराधाकी विषम

“तव विरहे वनमाली, पल पल आकुल आली।”

पञ्चमः सर्गः—आकाङ्क्ष-पुण्डरीकाक्षः १८३ आर्त्ति सुनकर अपनी आपराधिक भावनासे बड़े लज्जित और भयभीत हुए तथा अपनी नित्य-प्रेयसी श्रीराधासे मिलनेके लिए अत्यन्त उत्कण्ठित हुए, किन्तु स्वयं वहाँ नहीं गये, सखीसे अपना दुःख व्यक्तकर अनुनय-विनय आदिके द्वारा श्रीराधाके कोपको दूर करनेके लिए उसे भेजा। सखीसे कहा कि तुम मेरी ओरसे श्रीराधाजीसे प्रार्थना करना और उसे जैसे-तैसे प्रसन्न करके यहाँ ले आना। जब तक वे नहीं आती हैं, तब तक मैं यहीं प्रतीक्षा करूँगा—इसी यमुना तटपर रहता हूँ। इस आदेशको प्राप्तकर सखी श्रीराधासे कहने लगी— कृष्णके मनमें अपनी नित्य प्रेयसी श्रीराधाजीसे मिलनेकी आकांक्षा उत्पन्न हुई है, अतः इस सर्गको सकांक्ष-पुण्डरीकाक्ष कहा गया है। पुण्डरीकाक्ष—यह पद श्रीकृष्णके मनोज्ञतम नेत्रोंकी ओर भी पाठकोंका ध्यान आकृष्ट करता है। 'तस्य यथा पुण्डरीकमेवमेवाक्षिणी'—उपनिषदोंमें श्रीकृष्णके नेत्रोंको लाल कमलके समान माना है। प्रस्तुत श्लोकमें पुष्पिताग्रा वृत्त है। अथ दशमः सन्दर्भः गीतम् ॥१०॥ देशीवराडीरागेण रूपकतालेन गीयते ॥प्रबन्धः ॥ अनुवाद—यह प्रबन्ध देशीवराड़ी रागसे तथा रूपक तालसे गाया जाता है। बालबोधिनी—सुकेशी नायिका जब हाथोंमें कङ्कण, कानोंमें देवपुष्प लगाये हुए हाथमें चँवर लिये वीजन करती हुई निज दयितके साथ विनोदन करती है, तब देशीवराड़ी राग प्रस्तुत होता है।

१८४ श्रीगीतगोविन्दम् वहति मलय-समीरे मदनमुपनिधाय, स्फुटति कुसुमनिकरे विरहि-हृदय-दलनाय सखि ! सीदति तव विरहे वनमाली ॥१॥ध्रुवम् अन्वय—सखि, तव विरहे वनमाली [त्वत्-कर-कल्पित- वनमालाव build-up notes...]वनमालाव Multiplier...? No: वनमालाव rumble/lambanene: वनमालाव rumble? Let's check closely: वनमालाव rumble-> वनमालाव rumble... wait: वनमालाव rumble? No: वनमालाव rumble? No, it's वनमालाव rumble? No, let's read carefully: वनमालाव rumble? No: वनमालाव rumble? Let's read: वनमालाव rumble? No, "वनमालाव rumble"? No, "वनमालाव rumble" -> "वनमालाव rumble"? No, "वनमालाव लम्बनने" -> "वनमालाव rumble"? No, "वनमालाव rumble"? No, "वनमालाव rumble"? No, "वनमालाव लम्बनने" -> "वनमालाव लम्बनने" -> "वनमालाव rumble"? No, "वनमालाव rumble"? No, let's zoom in on line 7: वनमालाव rumble? "वनमालाव rumble" -> "वनमालाव rumble"? No, "वनमालाव rumble"? "वनमालाव लम्बनने" -> "वनमालाव लम्बनने" ? No, "वनमालाव rumble"? No: "वनमालाव लम्बनने" -> "वनमालाव लम्बनने" -> "वनमालाव लम्बनने" -> "वनमालाव लम्बनने": "वनमालाव rumble"? It says "वनमालाव लम्बनने" -> "वनमालाव लम्बनने" -> "वनमालाव लम्बनने" -> look: "वनमालाव लम्बनेन जीवतीति वनमालि-शब्दोपन्यासः]". Let's check line 6-7: अन्वय—सखि, तव विरहे वनमाली [त्वत्-कर-कल्पित- वनमालाव लम्बनेन जीवतीति वनमालि-शब्दोपन्यासः] मदनम् उपनिधाय (उप समीपे-संस्थाप्य) मलय-समीरे बहति [सति], [तथा] कुसुमनिकरे कुसुम-समूहे) विरहि-हृदय-दलनाय (विरहिणां मर्मपीड़नाय) स्फुटति (विकसति) [सति] सीदति (अवसादं गच्छति; सन्तप्यते इत्यर्थः) ॥१॥ अनुवाद—सखि ! राधे ! राधे ! देखो, मदन-रसमें सिक्त करने हेतु मलयानल प्रवाहित हो रहा है, विरही जनोंके हृदयको विदीर्ण करने वाला विविध कुसुमसमूह प्रस्फुटित हो रहा है। ऐसे उस वसन्त समयमें श्रीकृष्ण सकाम होकर तुम्हारे विरहसे दुःखी हो रहे हैं। पद्यानुवाद— विवश बनाती मदन-लहरियाँ, मिलकर मलय समीरे चलदल-सा चल जाता जी जब, हँसती कलियाँ धीरे॥ तव विरहे वनमाली! पल पल आकुल आली। बालबोधिनी—सखी श्रीराधासे कह रही है—हे सखि ! यह वसन्तकी बेला है, इसमें विरहीजनोंको मार्मिक पीड़ा पहुँचाने वाला मलय समीरण बह रहा है, कामके उद्दीपनके रूपमें हृदयविदारक कुसुम-समुदाय विकसित हो रहा है। तुम्हारे विरहमें कृष्ण अतिशय विषण्ण हैं, तुम चलो और उनसे मिल लो। वनमाली—तुम्हारे हाथकी बनी हुई वनमाला धारण कर किसी प्रकारसे जीवन धारण कर रहे हैं। इसी अभिप्रायसे श्रीकृष्णको वनमाली कहा गया है।

पञ्चमः सर्गः—आकाङ्क्ष-पुण्डरीकाक्षः १८५ दहति शिशिरमयूखे मरणमनुकरोति। पतति मदन-विशिखे विलपति विकलतरोऽति— सखि! सीदति तव विरहे... ॥२॥ अन्वय—शिशिरमयूखे (शीतरश्मौ चन्द्रे) दहति (दहनवत् किरणं वितरति सति) मरणम् अनुकरोति (मृतवन्निश्चेष्टो भवति; मूर्च्छतीति भावः) [तथा] मदनविशिखे (कामबाणे) पतति [सति] अतिविकलतरः [सन्] विलपति [कुसुमपतने हृदि विध्यत्कामबाणभ्रमात् आक्रोशतीत्यर्थः] ॥२॥ अनुवाद—वे चन्द्र-किरणोंसे संदग्ध होकर मुमूर्षु प्रायः हो रहे हैं। वृक्षोंसे मदन-शरके सदृश पुष्पोंके गिरनेसे उनका हृदय विद्ध हो गया है। ऐसी स्थितिमें वे अति विकल होकर विलाप कर रहे हैं। पद्यानुवाद— प्राण जलाने आती हैं नभसे चन्दाकी किरनें। मदन-शरोंसे व्याकुल होकर लगते उठने-गिरने॥ तव विरहे वनमाली पल-पल आकुल आली! बालबोधिनी—तुम्हारे विरहसे सन्तप्त वनमालीको चन्द्रमा शीतल नहीं करता, अपितु उन्हें प्रदाहका अनुभव होता है। इस चन्द्रसे ज्वाला निकल रही है, जो उन्हें जलाये जा रही है, मानो मृत्यु ही साक्षात् उपस्थित हुई है। मृतप्राय व्यक्ति जैसी चेष्टा करता है, उसी प्रकार वे भी चेष्टा करते हैं। वृक्षोंके पत्ते तथा फूलोंके गिरनेसे उनको ऐसा लगता है कि मानो कामदेव उनके हृदय पर बाण मार रहा हो। वे कुसुम-शय्या पर ऐसे पड़ जाते हैं, मानो बाणोंकी शय्या हो और अधिक विकल होकर बिलखने लगते हैं। ध्वनति मधुप-समूहे श्रवणमपिदधाति। मनसि कलित-विरहे निशि निशि रुजमुपयाति— सखि! सीदति तव विरहे... ॥२॥

१८६ श्रीगीतगोविन्दम् अन्वय—मधुपसमूहे (भ्रमरचये) ध्वनति (गुञ्जति सति) श्रवणम् (कर्णम्) अपिदधाति (आच्छादयति; उद्दीपनत्वेन असह्यत्वादिति भावः); [तथा] निशि निशि (प्रतिरात्रं) वलितविरहे (अत्युद्रिक्त-विरहे) मनसि रुजम् (पीड़ाम्) उपयाति (अधिकमाप्नोति)। [निशायाः तत्प्राप्तिकालत्वात् त्वदप्राप्त्या अलिध्वनिश्रवणात् पीड़ामनुभवतीत्यर्थः] ॥३॥ अनुवाद—मधुकरोंकी गुञ्जारको सुनकर वे अपने कानोंको हाथोंसे ढक लेते हैं। प्रत्येक रात्रिमें तुमको पावेंगे सोचते हैं, किन्तु पाते नहीं; अतएव दिन-प्रतिदिन विरह-व्यथामें विजातीय यन्त्रणाको सहन करते हुए अधिकाधिक रुग्ण होते जा रहे हैं। पद्यानुवाद— मधुपोंकी 'गुनगुन' से मूँदे हैं कानोंको रहते। रात रात भर सुधि-पीड़ामें हैं आँखोंसे बहते ॥ तव विरहे वनमाली ! पल-पल आकुल आली ॥ बालबोधिनी—यद्यपि चहुँदिशि भौरोंकी झौर-की-झौर गुनगुना रही है, परन्तु अलियोंका गुञ्जन श्रीकृष्णको प्रसन्न नहीं कर रहा, अपितु कर्णकटु हो रहा है। अतएव हाथोंसे अपने कानोंको बन्द कर देते हैं। प्रत्येक रात्रिमें ऐसा मानते हैं कि आप उनके पास हैं, परन्तु आपको न पानेसे उनकी विरह-वेदना और बढ़ गयी है। हृदय विरहसे सराबोर हो गया है, इसलिए वे करवटें बदलते रहते हैं, छटपटाते रहते हैं। प्रस्तुत पद्यमें सखीके द्वारा विप्रलम्भके उद्दीपन विभावोंका वर्णन हुआ है। वसति विपिन-विताने त्यजति ललित-धाम। लुठति धरणि-शयने बहु विलपति तव नाम— सखि! सीदति तव विरहे... ॥४॥

पञ्चमः सर्गः—आकाङ्क्ष-पुण्डरीकाक्षः १८७ अन्वय—विपिनविताने (वनगहने) वसति; ललितधाम (रुचिरमपि गृहं) त्यजति [विरहवैकल्यात् एकत्र स्थित्यभावाद् वितान- शब्दोपादानम्]; धरनिशयने (भूशय्यायां) लुठति; तव नाम बहु (बारं बारं) विलपति (जपति; तव नामधेयादन्यत् तस्यमुखात् न निःसरतीत्यर्थः) ॥४॥ अनुवाद—वे अपने मनोहर शयन-मन्दिरका परित्याग करके अरण्यमें निवास करते हैं और भूमि-शय्या पर लुण्ठित होते हुए बार-बार राधे! राधे! तुम्हारे ही नामका उच्चारण करते हैं। पद्यानुवाद— कलित धाम परित्याग बसे हैं, वनमें तप-सा साधे दर्दसे धरती पर लेटे रटते राधे! राधे! तव विरहे वनमाली, पल पल आकुल आली। बालबोधिनी—सखी कह रही है—राधे! तुम्हारे वियोगमें श्रीकृष्णने अपने मनोहर धाममें रहना छोड़ दिया है। उन्हें जङ्गलोंके वितानमें रहना ही अच्छा लगने लगा है। शय्या पर न सोकर वे तुम्हारे विरहकी पीड़ासे भूमि पर ही सोते हुए लोट-लोट कर निशा-कालको व्यतीत करते हैं, बस तुम्हारा ही नाम करते हैं—राधे, हा राधे! भणति कवि-जयदेव इति विरह-विलसितेन। मनसि रभस-विभवे हरिरुदयतु सुकृतेन— सखि! सीदति तव विरहे... ॥५॥ अन्वय—कवि जयदेवे इति (एवं) भणति (गदति सति) विरहविलसितेन (विच्छेदविलासेन हेतुना) सुकृतेन (पुण्येन हरिः रभसविभवे (रभसस्य प्रेमोत्साहस्य विभवो यत्र तस्मिन्) [गायतां शृण्वताञ्च भक्तानां] मनसि (चित्ते) उदयतु [हरिविरहविलसितेन हेतुना यदुत्पन्नं सुकृतं तेन गायतां शृण्वताञ्च मनसि हरिरुदितो भवतु इति भावः] ॥५॥

१८८ श्रीगीतगोविन्दम् अनुवाद—श्रीजयदेव कवि द्वारा वर्णित श्रीकृष्णकी विरह-व्यथासे पूर्ण इस गानसे जो सुकृति सञ्चित होती है, उस सुकृतिके फलस्वरूप जिन पाठकोंका मन विरहके विलासमें निरतिशय रूपसे निमग्न हो गया है, उनके हृदयमें श्रीकृष्ण सम्यक् रूपसे उदित हों। पद्यानुवाद— कवि जयदेव लीन हैं अतिशय हरिके विरह-विलासे। भाता है यह रस जिसको अति उसमें ज्ञान प्रकाशे॥ बालबोधिनी—कवि जयदेव कह रहे हैं कि उनके इस 'गरुडपदनाम' के दशम प्रबन्धके पाठकों एवं श्रोताओंको बहुत-सी सुकृति प्राप्त होगी, उन सुकृतियोंका मन श्रीहरिके विरहविलास जन्य उत्साहसे सम्पन्न होगा। रसोत्कण्ठित उन हृदयोंमें श्रीभगवान्का आविर्भाव हो। इस प्रबन्धको केदार रागमें गाया जाता है। श्रीराधाने जैसे ही निज प्राणकोटि निर्मञ्छनीय-चरण प्राणनाथ श्रीकृष्णके विरह-विलापका श्रवण किया, वैसे ही मूर्च्छित होकर गिर पड़ी, तब सखीने बोलना बन्द कर दिया, आगे कुछ कह ही न सकी। इसीलिए यह गीति मात्र पाँच पदोंमें ही वर्णित है। पूर्वं यत्र समं त्वया रतिपतेरासादिताः सिद्धय- स्तस्मिन्नेव निकुञ्ज-मन्मथ-महातीर्थे पुनर्माधवः। ध्यायंस्त्वामनिशं जपन्नपि तवैवालाप-मन्त्रावलीं भूयस्त्वत्कुचकुम्भ-निर्भरपरीरम्भामृतं वाञ्छति ॥१॥ इति दशमः सन्दर्भः। अन्वय—पूर्वं यत्र त्वया समं (सह) रतिपतेः (मदनस्य) सिद्धयः (त्वया सह आश्लेषादिकाः) आसादिताः (प्राप्ताः) [माधवेनेति शेषः] तस्मिन्नेव निकुञ्ज-मन्मथ-महातीर्थे (निकुञ्जरूपे मन्मथ-केलिसिद्धिक्षेत्रे) [त्वमेव तस्यैष्टदेवतेति त्वत्साक्षात्कार-

पञ्चमः सर्गः—साकाङ्क्ष-पुण्डरीकाक्षः १८९ लाभाय] माधवः पुनः त्वाम् [प्राप्तुकाम एव] अनिशं (निरन्तरं) ध्यायन् [तथा] [मन्त्रजपस्तरेण इष्टदेवता नाचिरात् प्रत्यक्षभूता भवतीति] तवैव आलापमन्त्रावलीं (आलापरूपां मन्त्रसमूहम्) जपन् भूयः (प्रचुरं यथा तथा) त्वत्कुचकुम्भ निर्भरपरीरम्भामृतं (तव कुचकुम्भयोः निर्भरारा‌लिङ्गनरूपममृतं) वाञ्छति ॥ १ ॥ अनुवाद—राधे ! माधवने पहले निकुञ्ज रूपी महातीर्थमें तुम्हारे आलिङ्गन आदि मनोरथोंकी सिद्धिके लिए मन्मथकी सिद्धियाँ प्राप्त की थीं। उसी महातीर्थमें कामदेवकी सिद्धियोंके लिए सदैव तुम्हारा ध्यान करते हैं। तुम्हारे साथ किये गये वार्तालापवली-मन्त्रको जपते हुए तुम्हारे कुचकुम्भोंके गाढालिङ्गनरूपी अमृतमोक्षकी पुनः-पुनः अभिलाषा कर रहे हैं। बालबोधिनी—अतःपर सखी श्रीराधाकी मूर्च्छाका निवारण करनेके लिए कृष्ण-चरित्रका पुनः सिञ्चन करती हुई श्रीराधाका अभिसारिका नायिकाके रूपमें वर्णन करने लगी। वह श्रीराधाको यह कहकर प्रसन्न करना चाहती है कि माधवका मन उसमें ही अवस्थित है। राधे ! माधवने जिस निकुञ्ज रूपी मन्मथ-महातीर्थमें तुम्हारे साथ रहकर चुम्बन, आलिङ्गन आदि कामकी महासिद्धियोंको प्राप्त किया था, वे फिर आज उसी परिरम्भ-अमृतकी अभिलाषा कर रहे हैं। तुम्हारे कुचकुम्भका गाढालिङ्गन ही अमृत है, उस महातीर्थका जल-अमृत है। वे उसी कामदेवके महातीर्थमें रहकर तुम्हारे स्वरूपका ध्यान करते हुए तुम्हारे साथ हुए वार्तालापोंका मन्त्रावलीके रूपमें अहर्निश जप कर रहे हैं। देवताके सामने एकान्त ध्यान-जपके द्वारा ही सिद्धि प्राप्त होती है। अतः कृष्ण निकुञ्जरूपी कामतीर्थमें रतिपति अर्थात् आपके सम्मुख आपको ही उपलक्षित करके आपकी प्रसन्नता रूपी कामसिद्धिको प्राप्त करना चाहते हैं। इन्हीं निकुञ्जोंमें ही उन्हें कामकी सिद्धि प्राप्त हुई थी। कामकी सिद्धिके लिए

१९० श्रीगीतगोविन्दम् तुम्हारा वार्तालाप मन्त्र बन गया। तुम ही उस निकुञ्जकी देवता हो। मन्त्रजपके द्वारा तुम्हारे कुम्भके समान उन्नत उरोजोंका गाढ़ालिङ्गन रूपी अमृतको वे प्राप्त करना चाहते हैं। प्रस्तुत श्लोकमें शार्दूलविक्रीड़ित छन्द है, काव्यलिङ्ग अलङ्कार है। एकादश सन्दर्भः गीतम् ॥११॥ गुर्जरीरागेण एकतालीतालेन गीयते॥ अनुवाद—यह ग्यारहवाँ प्रबन्ध गुर्जरी राग तथा एकताली तालसे गया जाता है। रति-सुख-सारे गतमभिसारे मदन-मनोहरवेषम्। न कुरु नितम्बिनि! गमन-विलम्बनमनुसर तं हृदयेशम्॥ धीर समीरे यमुना तीरे वसति वने वनमाली। गोपीपीनपयोधरमर्दनचञ्चलकरयुगशाली ॥१॥ध्रु. अन्वय—[अभिसाराय प्रार्थयते—अभिसारिका-लक्षणं यथा— “अभिसारयते कान्तं या मन्मथवशंवदा। स्वयं वाभिसरत्येषा धीरैरुक्ताऽभिसारिका॥” इति साहित्यदर्पणे।] हे नितम्बिनि (निविड़नितम्बवति) रतिसुख सारे (रतौ यत् सुखं तस्य सारः यत्र तादृशे) अभिसारे (सङ्केतस्थाने) गतं (प्राप्तमभिसृतमित्यर्थः) मदन-मनोहर-वेशं (मदनेन प्रेम्ना मनोहरो वेशो यस्य तादृशं) तं हृदयेशम् (प्राणवल्लभम्) अनुसर। गमनविलम्बनं न कुरु (गुरुनितम्बतया सहजगमन-वैलम्ब्यशङ्क्येदयुक्तम्); [त्वद्विरह- खिन्नस्य अनुसरणे विलम्बो न युक्तः]; वनमाली (श्रीकृष्णः) धीरसमीरे (धीरसमीराख्ये यद्वा धीरः मन्दः समीरः समीरणो यत्र तादृशे; अनेन सुखदत्वं निविड़त्वात् निर्जनत्वञ्चोक्तम्) यमुनातीरे वने वसति॥१॥

पञ्चमः सर्गः—आकाङ्क्ष-पुण्डरीकाक्षः १९१ अनुवाद—सुमन्द मलय मारुत सेवित यमुना तीरवर्ती निकुञ्जवनमें बैठकर वनमालाधारी (श्रीकृष्ण) गोपियोंके पयोधरमण्डलको निपीडित करनेमें चञ्चलशाली कर-युगलसे सुशोभित हो प्रतीक्षा कर रहे हैं। प्रशस्त नितम्बोंवाली श्रीराधे! रतिसुखके सारभूत सङ्केतस्थानमें मदनके समान मनोहरवेशको धारण किये हुए हृदयवल्लभ श्रीकृष्णके पास अभिसरण करो, अब विलम्ब मत करो। पद्यानुवाद— "रति-सुख-सारे गत अभिसारे, मदन मनोहर वेशम्।" न कर नितम्बिनि! गमन विलम्बन, अनुसर निज हृदयेशम् ॥ धीर समीरे यमुना-तीरे, राज रहे वनमाली। गोपी-पीन-पयोधर-मर्दन-चञ्चलकर-युगशाली ॥ बालबोधिनी—अब सखी श्रीकृष्णके पास अभिसरण करानेके लिए श्रीराधाको प्रोत्साहित करती हुई कहती है—हे नितम्बिनि! अर्थात् प्रशस्त नितम्बोंवाली श्रीराधे! चलनेमें तुम अब देर मत करो, कालका अतिक्रमण मत करो, श्रोणीभारसे तुम वैसे ही धीरे-धीरे मन्द-मन्द चलती हो। उनके पीछे-पीछे तुम उस सङ्केतस्थानमें त्वरित पहुँचो। इस सङ्केत-स्थलमें रतिजन्य सुखकी प्रधानता है। वहीं तुम्हारे हृदयेश, वनमाली श्रीकृष्ण मदन मनोहर वेश धारण किये हुए अभिसारगामी हो रहे हैं, उत्सुकतापूर्वक तुम्हारी बाट जोह रहे हैं। सङ्केतस्थलका स्पष्ट निदर्शन हुआ है। यमुनाके तट पर वेतसीका वन है। हवा मन्द-मन्द चलते हुए कुछ-कुछ थिर-सी हो गयी है। यह मन्द समीरण रतिकालमें अति सुखदायी होता है, कानन तो अति निविड़-निर्जन है ही। श्रीकृष्णका वेश मदन-सेवाके अनुकूल है, अभिसारगामी हो रहे हैं। चाँदनी रातमें समयानुरूप वेषभूषा धारणकर अभिसरण करना अभिसार कहा जाता है। उस कुञ्ज-प्रदेशमें वनमालीके पास पहुँचनेमें अब किञ्चित् भी विलम्ब मत करो।