गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थः सर्गः—स्निग्धमधुसूदनः १७७ प्रस्तुत श्लोकमें विरोधालङ्कार है, अद्भुत रस है तथा शार्दूलविक्रीड़ित छन्द है। क्षणमपि विरहः पुरा न सेहे नयन-निमीलन-खिन्नया यया ते। श्वसिति कथमसौ रसालशाखां चिरविरहेण विलोक्य पुष्पिताग्राम् ॥४॥ अन्वय—[हे कृष्ण] नयन-निमीलन-खिन्नया ("हा कथं नयने निमेषो मिलितः येन क्षणं कान्तदर्शनं विहन्यते इति" नयनयोः निमीलनेऽपि खिन्नया) यया पुरा ते (तव) क्षणमपि विरहो न सेहे, असौ पुष्पिताग्रां (सञ्जात-कुसुमाग्रां) रसालशाखां विलोक्य चिर-विरहेण कथं श्वसिति (प्राणिति); [निमेषविरहासहन- शीलायाः चिरविरह-सहनमतीवाश्चर्यम्] ॥४॥ अनुवाद—जो एक क्षणके लिए भी आपके दर्शनमें अन्तराल डालने वाले निमेष-निमीलनको सह नहीं पाती थीं, वही श्रीराधा तुम्हारे इस दारुण विरहमें सुललित सुपुष्पित आम्रवृक्ष (जिसके ऊपरकी शाखाओंमें नवीन पुष्प मञ्जरी संलग्न हैं) के समक्ष ही इस दीर्घकालिक विरहमें अवलोकन करते हुए कैसे जीवन अतिवाहित कर रही हैं—यह मैं नहीं समझ पा रही? पद्यानुवाद— जो राधा पल भर भी पहले, विरह न थी सह सकती, “पलकें क्यों बरबस लगती हैं”—विधिको कोसा करती। वही आज पुष्पित मधुरृतुमें, निरख तरुण आमोंको, क्या जाने कैसे रख पाती है, पापी प्राणोंको? बालबोधिनी—हे कृष्ण ! इससे पूर्व श्रीराधाने क्षणभरके लिए भी आपका वियोग नहीं सहा है। वह तो सदा-सर्वदा आपके पास रहती थीं। जब उनके नेत्रोंके पलक गिरते थे