गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७६ श्रीगीतगोविन्दम् अनुवाद—हे माधव ! कैसे आश्चर्यकी बात है कि मदन-ज्वरके प्रबल सन्तापसे समाकुला क्षीणाङ्गी श्रीराधा चन्दन, चन्द्रमा और नलिनी आदि शीतोपचारके साधनका विचार करते ही सन्तप्त होने लगती हैं। अहो, क्लान्तिके कारण वह दुर्बला शीतल तनु आपका ही एकान्तमें ध्यान करती हुई किसी प्रकार कुछ क्षणोंके लिए जी रही है। पद्यानुवाद— चन्दन, चन्द, कमल—शीतल द्रव उसे जलाते रहते। किन्तु तुम्हारे शीतल तनका चिन्तन करते करते— विगत-ताप वह हो जाती है और विहँस है जाती। जादूगर! है क्या रहस्य यह, मैं न समझ हूँ पाती? बालबोधिनी—हे माधव ! इस सन्निपातकी अवस्थाको प्राप्त हुई वह आपके सङ्गमकी आकांक्षासे ही जी रही हैं, ज्वरको दूर करनेवाले सारे उपाय व्यर्थ हो गये हैं। न चन्दनका लेप काम करता है, न चन्द्रमाकी शीतल चाँदनी और न ही कमलिनी ही। स्थिति तो ऐसी चरम सीमा पर पहुँच गयी है कि इन साधनोंको सोचते हुए वह और अधिक जलने लगती हैं। ज्वर कभी-कभी चढ़ते-चढ़ते इतना थका देता है कि शरीर एकदम स्वेदके प्रभावके कारण शीतल हो जाता है। वह विरहिणी अपने अशान्त मनमें केवल तुम्हारा ही ध्यान करती हैं और विरहमें क्षीण होकर वह कातर विजातीय यन्त्रणामें भी उस ध्यानके क्षणको उत्सव मानकर प्राण प्राप्त करती हैं। यदि आप सोचें कि वह इस समय कैसे जी रही है, कैसे साँस ले रही हैं, तो उत्तर यही है कि आप ही उसके एकमात्र प्रियतम हैं, आपका शीतल वपु उसे स्पर्श करनेके लिए प्राप्त हो जाय। इस प्राप्त्याशामें कुछ क्षणों तक जी रही हैं। यदि आप अविलम्ब नहीं मिले तो हो सकता है वह पुनः जीवित न मिलें।