गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७८ श्रीगीतगोविन्दम् तो उस समय भी उनको बड़ा कष्ट होता था—सोचती थी ब्रह्माने यह पलक गिरनेकी प्रक्रिया क्यों बनायी है। आपके मुखावलोकनमें जरा-सी बाधा पड़ने पर भी जिनको अपार दुःख होता था, वह अब चिरकालसे इस विरहको रसालकी पुष्पिताग्रा शाखाओंको देखकर भी कैसे सह पा रही हैं? कैसे उसकी साँसें चलती हैं? हर डालके सिरे पर बौरे आ गये हैं, मञ्जरियाँ निकल आयी हैं। रसाल अर्थात् रसका समूह उसकी डालियाँ पुष्पिताग्रा हो गयी हैं। यह वसन्त ऋतुकी बेला है। वसन्त कालमें तो विरहियोंको वैसे ही मृत्युके तुल्य कष्ट होता है। अतएव हे श्रीकृष्ण! श्रीराधासे अविलम्ब मिलें। श्रीराधा यह भी अपने मनमें सोचकर जी रही हैं कि पुष्पिताग्रा रसाल शाखाको देखकर जिस प्रकारसे मैं कामार्त हूँ, उसी प्रकारसे श्रीकृष्ण भी मेरे लिए कामार्त होंगे। अतः वे अवश्य ही मुझसे मिलने आयेंगे। प्रस्तुत श्लोकमें पुष्पिताग्रा छन्द है। वृष्टि-व्याकुलगोकुलावन-रसादुद्धृत्य गोवर्धनं बिभ्रद्वल्लव-वल्लभीरधिकानन्दाच्चिरं चुम्बितः दर्पेणेव तदर्पिताधर-तटी-सिन्दूर-मुद्राङ्कितो बाहुर्गोपतनोस्तनोतु भवतां श्रेयांसि कंसद्विषः ॥५॥ इति गीतगोविन्दे नवम सन्दर्भः इति श्रीगीतगोविन्दे महाकाव्ये स्निग्ध-मधुसूदनो नाम चतुर्थः सर्गः। अन्वय—[इदानीमाशिषा सर्गं समापयति महाकविः]—गोपतनोः (गोपाल-रूपस्य) कंसद्विषः (कृष्णस्य) वृष्टिव्याकुलगोकुलावन- रसात् (वृष्टिभिः व्याकुलं यत् गोकुलं तस्य अवनं रक्षणं तस्य रसः अनुरागः तस्मात्) गोवर्द्धनम् (तन्नामानं गिरिम्) उद्धृत्य (उत्तोल्य) बिभ्रत् (दधानः) अधिकानन्दात् (वैदग्ध्य- सौन्दर्यादिकमुद्वीक्ष्य हर्षातिशयेनेत्यर्थः) वल्लव-वल्लभाभिः (गोपसुन्दरीभिः) चिरं चुम्बितः (दत्तचुम्बनः) [तथा] दर्पेण