भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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चतुर्थः सर्गः—स्निग्धमधुसूदनः १७९ (अहङ्कारेणैव इन्द्रस्य विजिगीषया) तदर्पिताधरतटीसिन्दुर-मुद्राङ्कितः (ताभिर्गोपाङ्गनाभिः) अर्पिता दत्ता या अधरतट्यः अधरप्रदेशाः तासां सिन्दूर-मुद्रया सिन्दूर-चिह्नेन अङ्कितः युक्तः) बाहुः श्रेयांसि (मङ्गलानि) तनोतु (विस्तारयतु) [अतएव श्रीराधावैकल्य- श्रवणेन स्निग्धश्चेष्टारहितो मधुसूदनो यत्र स-इत्ययं सर्गश्चतुर्थः] ॥५॥ अनुवाद—जिन्होंने वारि-वर्षणसे व्याकुल गोकुलवासियोंकी रक्षाके लिए इन्द्रसे प्रतिस्पर्द्धा करते हुए गिरि गोवर्धनको ऊपर उठाकर धारण किया था, जो गोप युवतियोंके द्वारा दीर्घकाल पर्यन्त अतिशय रूपसे चुम्बित हुए थे, जिन पर गोपवधुओंके अधर-स्थित कुङ्कुम तथा ललाट स्थित सिन्दूर अङ्कित हुआ था, वे कंस विध्वंसकारी, गोपतनुधारी श्रीकृष्णकी भुजाएँ सबका मङ्गल विधान करें। बालबोधिनी—'मङ्गलान्तानि च शास्त्राणि प्रथन्ते' अर्थात् जिस शास्त्रके आदि, मध्य तथा अन्तमें मङ्गल होता है, उस शास्त्रका प्रचुर प्रचार होता है। इस नियमके अनुसार कवि जयदेवने ग्रन्थके चतुर्थ सर्गकी समाप्ति पर आशीर्वादात्मक मङ्गलाचरण प्रस्तुत किया है कि श्रीकृष्णकी वे भुजाएँ पाठकों एवं श्रोताओंका मङ्गल विधान करें। उन भुजाओंकी विशेषताएँ हैं— वृष्टि-व्याकुल-गोकुला वनरसादुद्धृत्य गोवर्धनं बिभ्रत्। अर्थात् क्रुद्ध होकर जब इन्द्रने गोकुलवनको विनष्ट करने हेतु पुष्कर एवं आवर्तक मेघोंसे भयङ्कर वर्षा करना प्रारम्भ किया था, उस समय समस्त गोपमण्डली व्याकुल हो गयी थी। यह देखकर गोकुलकी रक्षाके लिए श्रीकृष्णने गोवर्धनाद्रिको उखाड़कर अपने हाथपर उठा लिया था। तब शृङ्गार-उद्दीपक वीर रसका प्रकाश उनकी भुजाओंमें हुआ था। जब श्रीकृष्ण गोवर्धन पर्वत धारण किये हुए थे, तब गोपियाँ अतिशय आनन्दमग्न होकर श्रीकृष्णकी भुजाओंका चुम्बन करने लगी थीं।