भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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१७४ श्रीगीतगोविन्दम् प्रस्तुत श्लोकमें शार्दूलविक्रीड़ित नामक छन्द है। दीपक अलङ्कार है। विप्रलम्भ शृङ्गार-रस है। नायक अनुकूल अथवा दक्षिण है। नायिका उत्कण्ठिता है। सखी कहती है जो नायिकाकी सहायिका है। स्मरातुरां दैवत-वैद्य-हृद्य! त्वदङ्गसङ्गामृतमात्रसाध्यम्। निवृत्तबाधां कुरुषे न राधामुपेन्द्र! वज्रादपि दारुणोऽसि ॥२॥ अन्वय—हे दैवतवैद्यहृद्य, (देववैद्यादपि हृदयङ्गम! वैद्याभ्यास- कृत्यनिपुण इति वा) त्वदङ्गसङ्गामृतमात्रसाध्यां (तव अङ्गसङ्ग एव अमृतं तन्मात्रेण साध्यां प्रतिकार्यां) स्मरातुरां (कामार्त्तां) राधां [यदि] विमुक्त-बाधां (रोगमुक्तां) न कुरुषे (तर्हि) हे उपेन्द्र, त्वं वज्रादपि दारुणः (कठोरः) असि (भवसि) [यद्वा त्वम् उपेन्द्रवज्रादपि इन्द्रवज्रात् उप अधिकम् उपेन्द्रवज्रं तदपि चेद्भवोत् तस्मादपि, दारुणः असि]। [अङ्गसङ्ग-मात्र-साध्य- कर्माकरणेन काठिन्यमेव ते पर्यवसितमित्यर्थः] ॥२॥ अनुवाद—देववैद्य अश्विनीकुमारसे भी सुनिपुण सुचिकित्सक श्रीकृष्ण! हे उपेन्द्र! अनङ्गतापसे पीड़िता श्रीराधा एकमात्र आपके अङ्ग-संयोग रूप औषधामृतसे ही जीवन धारण कर सकती हैं। उस दुःसाध्य रोगवाली कामातुर श्रीराधाको इस मुमुर्षु दशामें यदि आप बाधा-रहित नहीं बनाते हैं तो निश्चय ही आप वज्रसे भी कठोर समझे जायेंगे। पद्यानुवाद— वैद्य! रसौषधि दे उसको अब फिरसे चेतन कर दो इङ्गित-भाषिणिकी जिह्वामें फिरसे वाणी भर दो॥ स्पृशामृतसे 'स्मर'-बाधाको हे हरि! सत्वर हर लो। काँप रही हूँ—कहीं न उरको, निठुर वज्र सा कर लो॥ बालबोधिनी—सखीने श्रीकृष्णको दो विशेषणोंसे विभूषित किया— (१) दैवतवैद्यहृद्य—श्रीकृष्णकी अभिरामता एवं मनोरमता स्वर्गलोकके वैद्य अश्विनीकुमारोंसे भी बढ़कर है।