गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
३४२ * गीता-संग्रह *
सम्भाषमाणमेकान्ते समासीनं च तैः सह।
यदृच्छया च गच्छन्तमसक्तं पवनं यथा॥ २४॥
वे मुक्तकी भाँति विचरनेवाले, सिद्ध, शान्तचित्त, जितेन्द्रिय, ब्रह्मतेजसे देदीप्यमान, सर्वत्र घूमनेवाले और अन्तर्धान विद्याके ज्ञाता थे। अदृश्य रहनेवाले चक्रधारी सिद्धोंके साथ वे विचरते, बातचीत करते और उन्हींके साथ एकान्तमें बैठते थे। जैसे वायु कहीं आसक्त न होकर सर्वत्र प्रवाहित होती है, उसी तरह वे सर्वत्र अनासक्त भावसे स्वच्छन्दतापूर्वक विचरा करते थे। महर्षि काश्यप उनकी उपर्युक्त महिमा सुनकर ही उनके पास गये थे॥ २२—२४॥
तं समासाद्य मेधावी स तदा द्विजसत्तमः।
चरणौ धर्मकामोऽस्य तपस्वी सुसमाहितः।
प्रतिपेदे यथान्यायं दृष्ट्वा तन्महदद्भुतम्॥ २५॥
विस्मितश्चाद्भुतं दृष्ट्वा काश्यपस्तद् द्विजोत्तमम्।
परिचारेण महता गुरुं तं पर्यतोषयत्॥ २६॥
उपपन्नं च तत्सर्वे श्रुतचारित्रसंयुतम्।
भावेनातोषयच्चैनं गुरुवृत्त्या परन्तपः॥ २७॥
निकट जाकर उन मेधावी, तपस्वी, धर्माभिलाषी और एकाग्रचित्त महर्षिने न्यायानुसार उन सिद्ध महात्माके चरणोंमें प्रणाम किया। वे ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ और बड़े अद्भुत सन्त थे। उनमें सब प्रकारकी योग्यता थी। वे शास्त्रके ज्ञाता और सच्चरित्र थे। उनका दर्शन करके काश्यपको बड़ा विस्मय हुआ। वे उन्हें गुरु मानकर उनकी सेवामें लग गये और अपनी शुश्रूषा, गुरुभक्ति तथा श्रद्धाभावके द्वारा उन्होंने उन सिद्ध महात्माको सन्तुष्ट कर लिया॥ २५—२७॥
तस्मै तुष्टः स शिष्याय प्रसन्नो वाक्यमब्रवीत्।
सिद्धिं परामभिप्रेक्ष्य शृणु मत्तो जनार्दन॥ २८॥
जनार्दन! अपने शिष्य काश्यपके ऊपर प्रसन्न होकर उन सिद्ध
- उत्तरगीता * ३४३
महर्षिने परासिद्धिके सम्बन्धमें विचार करके जो उपदेश किया, उसे बताता हूँ, सुनो॥ २८॥
सिद्ध उवाच
विविधैः कर्मभिस्तात पुण्ययोगैश्च केवलैः। गच्छन्तीह गतिं मर्त्या देवलोके च संस्थितिम्॥ २९॥
**सिद्धने कहा—**तात काश्यप! मनुष्य नाना प्रकारके शुभ कर्मोंका अनुष्ठान करके केवल पुण्यके संयोगसे इस लोकमें उत्तम फल और देवलोकमें स्थान प्राप्त करते हैं॥ २९॥
न क्वचित् सुखमत्यन्तं न क्वचिच्छाश्वती स्थितिः। स्थानाच्च महतो भ्रंशो दुःखलब्धात् पुनः पुनः॥ ३०॥
जीवको कहीं भी अत्यन्त सुख नहीं मिलता। किसी भी लोकमें वह सदा नहीं रहने पाता। तपस्या आदिके द्वारा कितने ही कष्ट सहकर बड़े-से-बड़े स्थानको क्यों न प्राप्त किया जाय, वहाँसे भी बार-बार नीचे आना ही पड़ता है॥ ३०॥
अशुभा गतयः प्राप्ताः कष्टा मे पापसेवनात्। काममन्युपरीतेन तृष्णया मोहितेन च॥ ३१॥
मैंने काम-क्रोधसे युक्त और तृष्णासे मोहित होकर अनेकों बार पाप किये हैं और उनके सेवनके फलस्वरूप घोर कष्ट देनेवाली अशुभ गतियोंको भोगा है॥ ३१॥
पुनः पुनश्च मरणं जन्म चैव पुनः पुनः। आहारा विविधा भुक्ताः पीता नानाविधाः स्तनाः॥ ३२॥
बार-बार जन्म और बार-बार मृत्युका क्लेश उठाया है। तरह-तरहके आहार ग्रहण किये और अनेक स्तनोंका दूध पीया है॥ ३२॥
३४४ * गीता-संग्रह *
मातरो विविधा दृष्टाः पितरश्च पृथग्विधाः। सुखानि च विचित्राणि दुःखानि च मयानघ॥ ३३॥
अनघ! बहुत-से पिता और भाँति-भाँतिकी माताएँ देखी हैं। विचित्र-विचित्र सुख-दुःखोंका अनुभव किया है॥ ३३॥
प्रियैर्विवासो बहुशः संवासश्चाप्रियैः सह। धननाशश्च सम्प्राप्तो लब्ध्वा दुःखेन तद् धनम्॥ ३४॥
कितनी ही बार मुझसे प्रियजनोंका वियोग और अप्रियजनोंका संयोग हुआ है। जिस धनको मैंने बहुत कष्ट सहकर कमाया था, वह मेरे देखते-देखते नष्ट हो गया॥ ३४॥
अवमानाः सुकष्टाश्च राजतः स्वजनात् तथा। शारीरा मानसा वापि वेदना भृशदारुणाः॥ ३५॥
राजा और स्वजनोंकी ओरसे मुझे कई बार बड़े-बड़े कष्ट और अपमान उठाने पड़े हैं। तन और मनकी अत्यन्त भयंकर वेदनाएँ सहनी पड़ी हैं॥ ३५॥
प्राप्ता विमाननाश्चोग्रा वधबन्धाश्च दारुणाः। पतनं निरये चैव यातनाश्च यमक्षये॥ ३६॥
मैंने अनेक बार घोर अपमान, प्राणदण्ड और कड़ी कैदकी सजाएँ भोगी हैं। मुझे नरकमें गिरना और यमलोकमें मिलनेवाली यातनाओंको सहना पड़ा है॥ ३६॥
जरा रोगाश्च सततं व्यसनानि च भूरिशः। लोकेऽस्मिन्ननुभूतानि द्वन्द्वजानि भृशं मया॥ ३७॥
इस लोकमें जन्म लेकर मैंने बारम्बार बुढ़ापा, रोग, व्यसन और राग-द्वेषादि द्वन्द्वोंके प्रचुर दुःख सदा ही भोगे हैं॥ ३७॥
- उत्तरगीता * ३४५
ततः कदाचिन्निर्वेदान्निराकाराश्रितेन च।
लोकतन्त्रं परित्यक्तं दुःखार्तेन भृशं मया॥ ३८॥
इस प्रकार बारम्बार क्लेश उठानेसे एक दिन मेरे मनमें बड़ा खेद हुआ और मैंने दुःखोंसे घबराकर निराकार परमात्माकी शरण ली तथा समस्त लोकव्यवहारका परित्याग कर दिया॥ ३८॥
लोकेऽस्मिन्ननुभूयाहमिमं मार्गमनुष्ठितः।
ततः सिद्धिरियं प्राप्ता प्रसादादात्मनो मया॥ ३९॥
इस लोकमें अनुभवके पश्चात् मैंने इस मार्गका अवलम्बन किया है और अब परमात्माकी कृपासे मुझे यह उत्तम सिद्धि प्राप्त हुई है॥ ३९॥
नाहं पुनरिहागन्ता लोकानालोकयाम्यहम्।
आसिद्धेराप्रजासर्गादात्मनोऽपि गताः शुभाः॥ ४०॥
अब मैं पुनः इस संसारमें नहीं आऊँगा। जबतक यह सृष्टि कायम रहेगी और जबतक मेरी मुक्ति नहीं हो जायगी, तबतक मैं अपनी और दूसरे प्राणियोंकी शुभगतिका अवलोकन करूँगा॥ ४०॥
उपलब्धा द्विजश्रेष्ठ तथैयं सिद्धिरुत्तमा।
इतः परं गमिष्यामि ततः परतरं पुनः॥ ४१॥
ब्रह्मणः पदमव्यक्तं मा तेऽभूदत्र संशयः।
नाहं पुनरिहागन्ता मर्त्यलोकं परन्तप॥ ४२॥
द्विजश्रेष्ठ! इस प्रकार मुझे यह उत्तम सिद्धि मिली है। इसके बाद मैं उत्तम लोकमें जाऊँगा। फिर उससे भी परम उत्कृष्ट सत्यलोकमें जा पहुँचूँगा और क्रमशः अव्यक्त ब्रह्मपद (मोक्ष)-को प्राप्त कर लूँगा। इसमें तुम्हें संशय नहीं करना चाहिये। काम-क्रोध आदि शत्रुओंको सन्ताप देनेवाले काश्यप! अब मैं पुनः इस मर्त्यलोकमें नहीं आऊँगा॥ ४१-४२॥
३४६ * गीता-संग्रह *
प्रीतोऽस्मि ते महाप्राज्ञ ब्रूहि किं करवाणि ते।
यदीप्सुरुपपन्नस्त्वं तस्य कालोऽयमागतः॥ ४३॥
महाप्राज्ञ! मैं तुम्हारे ऊपर बहुत प्रसन्न हूँ। बोलो, तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य करूँ? तुम जिस वस्तुको पानेकी इच्छासे मेरे पास आये हो, उसके प्राप्त होनेका यह समय आ गया है॥ ४३॥
अभिजाने च तदहं यदर्थं मामुपागतः।
अचिरात् तु गमिष्यामि तेनाहं त्वामचूचुदम्॥ ४४॥
तुम्हारे आनेका उद्देश्य क्या है, इसे मैं जानता हूँ और शीघ्र ही यहाँसे चला जाऊँगा। इसीलिये मैंने स्वयं तुम्हें प्रश्न करनेके लिये प्रेरित किया है॥ ४४॥
भृशं प्रीतोऽस्मि भवतश्चारित्रेण विचक्षण।
परिपृच्छस्व कुशलं भाषेयं यत् तवेप्सितम्॥ ४५॥
विद्वन्! तुम्हारे उत्तम आचरणसे मुझे बड़ा सन्तोष है। तुम अपने कल्याणकी बात पूछो। मैं तुम्हारे अभीष्ट प्रश्नका उत्तर दूँगा॥ ४५॥
बहु मन्ये च ते बुद्धिं भृशं सम्पूजयामि च।
येनाहं भवता बुद्धो मेधावी ह्यसि काश्यप॥ ४६॥
काश्यप! मैं तुम्हारी बुद्धिकी सराहना करता हूँ और उसे बहुत आदर देता हूँ। तुमने मुझे पहचान लिया है, इसीसे कहता हूँ कि बड़े बुद्धिमान् हो॥ ४६॥
॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि उत्तरगीतायां प्रथमोऽध्यायः॥ १॥
* उत्तरगीता * ३४७
दूसरा अध्याय
काश्यपके प्रश्नोंके उत्तरमें सिद्ध महात्माद्वारा जीवकी विविध गतियोंका वर्णन
वासुदेव उवाच
ततस्तस्योपसङ्गृह्य पादौ प्रश्नान् सुदुर्वचान्।
पप्रच्छ तांश्च धर्मान् स प्राह धर्मभृतां वरः॥ १॥
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—तदनन्तर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ काश्यपने उन सिद्ध महात्माके दोनों पैर पकड़कर जिनका उत्तर कठिनाईसे दिया जा सके, ऐसे बहुत-से धर्मयुक्त प्रश्न पूछे॥ १॥
काश्यप उवाच
कथं शरीरं च्यवते कथं चैवोपपद्यते।
कथं कष्टाच्च संसारात् संसरन् परिमुच्यते॥ २॥
काश्यपने पूछा—महात्मन्! यह शरीर किस प्रकार गिर जाता है? फिर दूसरा शरीर कैसे प्राप्त होता है? संसारी जीव किस तरह इस दुःखमय संसारसे मुक्त होता है?॥ २॥
आत्मा च प्रकृतिं मुक्त्वा तच्छरीरं विमुञ्चति।
शरीरतश्च निर्मुक्तः कथमन्यत् प्रपद्यते॥ ३॥
जीवात्मा प्रकृति (मूल विद्या) और उससे उत्पन्न होनेवाले शरीरका कैसे त्याग करता है? और शरीरसे छूटकर दूसरेमें वह किस प्रकार प्रवेश करता है?॥ ३॥
कथं शुभाशुभे चायं कर्मणी स्वकृते नरः।
उपभुङ्क्ते क्व वा कर्म विदेहस्यावतिष्ठते॥ ४॥
मनुष्य अपने किये हुए शुभाशुभ कर्मोंका फल कैसे भोगता है और शरीर न रहनेपर उसके कर्म कहाँ रहते हैं?॥ ४॥
३४८ * गीता-संग्रह *
ब्राह्मण उवाच
एवं सञ्चोदितः सिद्धः प्रश्नांस्तान् प्रत्यभाषत।
आनुपूर्व्येण वार्ष्णेय तन्मे निगदतः शृणु॥ ५॥
**ब्राह्मण कहते हैं—**वृष्णिनन्दन श्रीकृष्ण! काश्यपके इस प्रकार पूछनेपर सिद्ध महात्माने उनके प्रश्नोंका क्रमशः उत्तर देना आरम्भ किया। वह मैं बता रहा हूँ, सुनिये॥ ५॥
सिद्ध उवाच
आयुःकीर्तिकराणीह यानि कृत्यानि सेवते।
शरीरग्रहणे यस्मिंस्तेषु क्षीणेषु सर्वशः॥ ६॥
आयुःक्षयपरीतात्मा विपरीतानि सेवते।
बुद्धिर्व्यावर्तते चास्य विनाशे प्रत्युपस्थिते॥ ७॥
**सिद्धने कहा—**काश्यप! मनुष्य इस लोकमें आयु और कीर्तिको बढ़ानेवाले जिन कर्मोंका सेवन करता है, वे शरीर-प्राप्तिमें कारण होते हैं। शरीर-ग्रहणके अनन्तर जब वे सभी कर्म अपना फल देकर क्षीण हो जाते हैं, उस समय जीवकी आयुका भी क्षय हो जाता है। उस अवस्थामें वह विपरीत कर्मोंका सेवन करने लगता है और विनाशकाल निकट आनेपर उसकी बुद्धि उलटी हो जाती है॥ ६-७॥
सत्त्वं बलं च कालं च विदित्वा चात्मनस्तथा।
अतिवेलमुपाश्नाति स्वविरुद्धान्यनात्मवान्॥ ८॥
वह अपने सत्त्व (धैर्य), बल और अनुकूल समयको जानकर भी मनपर अधिकार न होनेके कारण असमयमें तथा अपनी प्रकृतिके विरुद्ध भोजन करता है॥ ८॥
यदायमतिकष्टानि सर्वाण्युपनिषेवते।
अत्यर्थमपि वा भुङ्क्ते न वा भुङ्क्ते कदाचन॥ ९॥
अत्यन्त हानि पहुँचानेवाली जितनी वस्तुएँ हैं, उन सबका वह सेवन करता है। कभी तो बहुत-अधिक खा लेता है, कभी बिल्कुल
- उत्तरगीता * ३४९
ही भोजन नहीं करता है ॥ ९ ॥
दुष्टान्नामिषपानं च यदन्योन्यविरोधि च।
गुरु चाप्यमितं भुङ्क्ते नातिजीर्णेऽपि वा पुनः॥ १०॥
कभी दूषित खाद्य अन्न-पानको भी ग्रहण कर लेता है, कभी एक-दूसरेसे विरुद्ध गुणवाले पदार्थोंको एक साथ खा लेता है। किसी दिन गरिष्ठ अन्न और वह भी बहुत-अधिक मात्रामें खा जाता है। कभी-कभी एक बारका खाया हुआ अन्न पचने भी नहीं पाता कि दुबारा भोजन कर लेता है ॥ १० ॥
व्यायाममतिमात्रं च व्यवायं चोपसेवते।
सततं कर्मलाभाद् वा प्राप्तं वेगं विधारयेत् ॥ ११ ॥
अधिक मात्रामें व्यायाम और स्त्री-सम्भोग करता है। सदा काम करनेके लोभसे मल-मूत्रके वेगको रोके रहता है ॥ ११ ॥
रसाभियुक्तमन्नं वा दिवा स्वप्नं च सेवते।
अपक्वानागते काले स्वयं दोषान् प्रकोपयेत् ॥ १२ ॥
रसीला अन्न खाता और दिनमें सोता है तथा कभी-कभी खाये हुए अन्नके पचनेके पहले असमयमें भोजन करके स्वयं ही अपने शरीरमें स्थित वात-पित्त आदि दोषोंको कुपित कर देता है ॥ १२ ॥
स्वदोषकोपनाद् रोगं लभते मरणान्तिकम्।
अपि वोद्बन्धनादीनि परीतानि व्यवस्यति ॥ १३ ॥
उन दोषोंके कुपित होनेसे वह अपने लिये प्राणनाशक रोगोंको बुला लेता है अथवा फाँसी लगाने या जलमें डूबने आदि शास्त्रविरुद्ध उपायोंका आश्रय लेता है ॥ १३ ॥
तस्य तैः कारणैर्जन्तोः शरीरं च्यवते तदा।
जीवितं प्रोच्यमानं तद् यथावदुपधारय ॥ १४ ॥
इन्हीं सब कारणोंसे जीवका शरीर नष्ट हो जाता है। इस प्रकार
३५० * गीता-संग्रह *
जो जीवका जीवन बताया जाता है, उसे अच्छी तरह समझ लो ॥ १४ ॥
ऊष्मा प्रकुपितः काये तीव्रवायुसमीरितः।
शरीरमनुपर्येत्य सर्वान् प्राणान् रुणद्धि वै॥ १५॥
शरीरमें तीव्र वायुसे प्रेरित हो पित्तका प्रकोप बढ़ जाता है और वह शरीरमें फैलकर समस्त प्राणोंकी गतिको रोक देता है॥ १५॥
अत्यर्थं बलवानूष्मा शरीरे परिकोपितः।
भिन्नत्ति जीवस्थानानि मर्माणि विद्धि तत्त्वतः॥ १६॥
इस शरीरमें कुपित होकर अत्यन्त प्रबल हुआ पित्त जीवके मर्मस्थानोंको विदीर्ण कर देता है। इस बातको ठीक समझो॥ १६॥
ततः सवेदनः सद्यो जीवः प्रच्यवते क्षरात्।
शरीरं त्यजते जन्तुश्छिद्यमानेषु मर्मसु॥ १७॥
जब मर्मस्थान छिन्न-भिन्न होने लगते हैं, तब वेदनासे व्यथित हुआ जीव तत्काल इस जड शरीरसे निकल जाता है। उस शरीरको सदाके लिये त्याग देता है॥ १७॥
वेदनाभिः परीतात्मा तद् विद्धि द्विजसत्तम।
जातीमरणसंविग्नाः सततं सर्वजन्तवः॥ १८॥
द्विजश्रेष्ठ! मृत्युकालमें जीवका तन-मन वेदनासे व्यथित होता है, इस बातको भलीभाँति जान लो। इस तरह संसारके सभी प्राणी सदा जन्म और मरणसे उद्विग्न रहते हैं॥ १८॥
दृश्यन्ते सन्त्यजन्तश्च शरीराणि द्विजर्षभ।
गर्भसङ्क्रमणे चापि मर्मणामतिसर्पणे॥ १९॥
तादृशीमेव लभते वेदनां मानवः पुनः।
भिन्नसन्धिरथ क्लेदमद्भिः स लभते नरः॥ २०॥
विप्रवर! सभी जीव अपने शरीरका त्याग करते देखे जाते हैं। गर्भमें मनुष्य प्रवेश करते समय तथा गर्भसे नीचे गिरते समय भी वैसी
- उत्तरगीता * | ३५१
ही वेदनाका अनुभव करता है। मृत्युकालमें जीवोंके शरीरकी सन्धियाँ टूटने लगती हैं और जन्मके समय वह गर्भस्थ जलसे भींगकर अत्यन्त व्याकुल हो उठता है॥ १९-२०॥
यथा पञ्चसु भूतेषु सम्भूतत्वं नियच्छति। शैत्यात् प्रकुपितः काये तीव्रवायुसमीरितः॥ २१ ॥ यः स पञ्चसु भूतेषु प्राणापाने व्यवस्थितः। स गच्छत्यूर्ध्वगो वायुः कृच्छ्रान्मुक्त्वा शरीरिणः॥ २२ ॥
अन्य प्रकारकी तीव्र वायुसे प्रेरित हो शरीरमें सर्दीसे कुपित हुई जो वायु पाँचों भूतोंमें प्राण और अपानके स्थानमें स्थित है, वही पंचभूतोंके संघातका नाश करती है तथा वह देहधारियोंको बड़े कष्टसे त्यागकर ऊर्ध्वलोकको चली जाती है॥ २१-२२॥
शरीरं च जहात्येवं निरुच्छ्वासश्च दृश्यते। स निरूष्मा निरुच्छ्वासो निःश्रीको हतचेतनः॥ २३ ॥ ब्रह्मणा सम्परित्यक्तो मृत इत्युच्यते नरैः।
इस प्रकार जब जीव शरीरका त्याग करता है, तब प्राणियोंका शरीर उच्छ्वासहीन दिखायी देता है। उसमें गर्मी, उच्छ्वास, शोभा और चेतना कुछ भी नहीं रह जाती। इस तरह जीवात्मासे परित्यक्त उस शरीरको लोग मृत (मरा हुआ) कहते हैं॥ २३ १/२ ॥
स्रोतोभिर्यैर्विजानाति इन्द्रियार्थाञ्शरीरभृत्॥ २४॥ तैरेव न विजानाति प्राणानाहारसम्भवान्। तत्रैव कुरुते काये यः स जीवः सनातनः॥ २५ ॥
देहधारी जीव जिन इन्द्रियोंके द्वारा रूप, रस आदि विषयोंका अनुभव करता है, उनके द्वारा वह भोजनसे परिपुष्ट होनेवाले प्राणोंको नहीं जान पाता। इस शरीरके भीतर रहकर जो कार्य करता है, वह सनातन जीव है॥ २४-२५॥
३५२ * गीता-संग्रह *
तथा यद्यद् भवेद् युक्तं सन्निपाते क्वचित् क्वचित् । तत्तन्मर्म विजानीहि शास्त्रदृष्टं हि तत् तथा ॥ २६ ॥ कहीं-कहीं सन्धिस्थानोंमें जो-जो अंग संयुक्त होता है, उस-उसको तुम मर्म समझो; क्योंकि शास्त्रमें मर्मस्थानका ऐसा ही लक्षण देखा गया है ॥ २६ ॥
तेषु मर्मसु भिन्नेषु ततः स समुदीरयन् । आविश्य हृदयं जन्तोः सत्त्वं चाशु रुणद्धि वै ॥ २७ ॥ उन मर्मस्थानों (सन्धियों)-के विलग होनेपर वायु ऊपरको उठती हुई प्राणीके हृदयमें प्रविष्ट हो शीघ्र ही उसकी बुद्धिको अवरुद्ध कर लेती है ॥ २७ ॥
ततः सचेतनो जन्तुर्नाभिजानाति किञ्चन । तमसा संवृतज्ञानः संवृतेष्वेव मर्मसु । स जीवो निरधिष्ठानश्चाल्यते मातरिश्वना ॥ २८ ॥ तब अन्तकाल उपस्थित होनेपर प्राणी सचेतन होनेपर भी कुछ समझ नहीं पाता; क्योंकि तम (अविद्या)-के द्वारा उसकी ज्ञानशक्ति आवृत हो जाती है। मर्मस्थान भी अवरुद्ध हो जाते हैं। उस समय जीवके लिये कोई आधार नहीं रह जाता और वायु उसे अपने स्थानसे विचलित कर देती है ॥ २८ ॥
ततः सतं महोच्छ्वासं भृशमुच्छ्वस्य दारुणम् । निष्क्रामन् कम्पयत्याशु तच्छरीरमचेतनम् ॥ २९ ॥ तब वह जीवात्मा बारम्बार भयंकर एवं लम्बी साँस छोड़कर बाहर निकलने लगता है। उस समय सहसा इस जड शरीरको कम्पित कर देता है ॥ २९ ॥
स जीवः प्रच्युतः कायात् कर्मभिः स्वैः समावृतः । अभितः स्वैः शुभैः पुण्यैः पापैर्वाप्युपपद्यते ॥ ३० ॥ शरीरसे अलग होनेपर वह जीव अपने किये हुए शुभ कार्य पुण्य
* उत्तरगीता * ३५३
अथवा अशुभ कार्य पापकर्मोंद्वारा सब ओरसे घिरा रहता है ॥ ३० ॥
ब्राह्मणा ज्ञानसम्पन्ना यथावच्छ्रुतनिश्चयाः ।
इतरं कृतपुण्यं वा तं विजानन्ति लक्षणैः ॥ ३१ ॥
जिन्होंने वेदशास्त्रोंके सिद्धान्तोंका यथावत् अध्ययन किया है, वे ज्ञानसम्पन्न ब्राह्मण लक्षणोंके द्वारा यह जान लेते हैं कि अमुक जीव पुण्यात्मा रहा है और अमुक जीव पापी ॥ ३१ ॥
यथान्धकारे खद्योतं लीयमानं ततस्ततः।
चक्षुष्मन्तः प्रपश्यन्ति तथा च ज्ञानचक्षुषः ॥ ३२ ॥
पश्यन्त्येवंविधं सिद्धा जीवं दिव्येन चक्षुषा।
च्यवन्तं जायमानं च योनिं चानुपवेशितम् ॥ ३३ ॥
जिस तरह आँखवाले मनुष्य अँधेरेमें इधर-उधर उगते-बुझते हुए खद्योतको देखते हैं, उसी प्रकार ज्ञान-नेत्रवाले सिद्ध पुरुष अपनी दिव्य दृष्टिसे जन्मते, मरते तथा गर्भमें प्रवेश करते हुए जीवको सदा देखते रहते हैं ॥ ३२-३३ ॥
तस्य स्थानानि दृष्टानि त्रिविधानीह शास्त्रतः ।
कर्मभूमिरियं भूमैर्यत्र तिष्ठन्ति जन्तवः ॥ ३४ ॥
शास्त्रके अनुसार जीवके तीन प्रकारके स्थान देखे गये हैं। (मृत्युलोक, स्वर्गलोक और नरक)। यह मर्त्यलोककी भूमि जहाँ बहुत-से प्राणी रहते हैं, कर्मभूमि कहलाती है ॥ ३४ ॥
ततः शुभाशुभं कृत्वा लभन्ते सर्वदेहिनः।
इहैवोच्चावचान् भोगान् प्राप्नुवन्ति स्वकर्मभिः ॥ ३५ ॥
अतः यहाँ शुभ और अशुभ कर्म करके सब मनुष्य उसके फलस्वरूप अपने कर्मोंके अनुसार अच्छे-बुरे भोग प्राप्त करते हैं ॥ ३५ ॥
इहैवाशुभकर्माणः कर्मभिर्निरयं गताः।
अवाग्गतिरियं कष्टा यत्र पच्यन्ति मानवाः।
३५४
- गीता-संग्रह *
तस्मात् सुदुर्लभो मोक्षो रक्ष्यश्चात्मा ततो भृशम्॥ ३६॥ यहीं पाप करनेवाले मानव अपने कर्मोंके अनुसार नरकमें पड़ते हैं। यह जीवकी अधोगति है, जो घोर कष्ट देनेवाली है। इसमें पड़कर पापी मनुष्य नरकाग्निमें पकाये जाते हैं। उससे छुटकारा मिलना बहुत कठिन है। अतः (पापकर्मसे दूर रहकर) अपनेको नरकसे बचाये रखनेका विशेष प्रयत्न करना चाहिये॥ ३६॥ ऊर्ध्वं तु जन्तवो गत्वा येषु स्थानेष्ववस्थिताः। कीर्त्यमानानि तानीह तत्त्वतः सन्निबोध मे॥ ३७॥ स्वर्ग आदिके ऊर्ध्वलोकोंको जाकर प्राणी जिन स्थानोंमें निवास करते हैं, उनका यहाँ वर्णन किया जाता है, इस विषयको यथार्थरूपसे मुझसे सुनो॥ ३७॥ तच्छ्रुत्वा नैष्ठिकीं बुद्धिं बुद्धयेथाः कर्मनिश्चयम्। तारारूपाणि सर्वाणि यत्रैतच्चन्द्रमण्डलम्॥ ३८॥ यत्र विभ्राजते लोके स्वभासा सूर्यमण्डलम्। स्थानान्येतानि जानीहि जनानां पुण्यकर्मणाम्॥ ३९॥ इसको सुननेसे तुम्हें कर्मोंकी गतिका निश्चय हो जायगा और नैष्ठिकी बुद्धि प्राप्त होगी। जहाँ ये समस्त तारे हैं, जहाँ वह चन्द्रमण्डल प्रकाशित होता है और जहाँ सूर्यमण्डल जगत्में अपनी प्रभासे उद्भासित हो रहा है, ये सब-के-सब पुण्यकर्मा पुरुषोंके स्थान हैं, ऐसा जानो [पुण्यात्मा मनुष्य उन्हीं लोकोंमें जाकर अपने पुण्योंका फल भोगते हैं]॥ ३८-३९॥ कर्मक्षयाच्च ते सर्वे च्यवन्ते वै पुनः पुनः। तत्रापि च विशेषोऽस्ति दिवि नीचोच्चमध्यमः॥ ४०॥ जब जीवोंके पुण्यकर्मोंका भोग समाप्त हो जाता है, तब वे वहाँसे नीचे गिरते हैं। इस प्रकार बारम्बार उनका आवागमन होता रहता है। स्वर्गमें भी उत्तम, मध्यम और अधमका भेद रहता है॥ ४०॥
- उत्तरगीता * ३५५
न च तत्रापि सन्तोषो दृष्ट्वा दीप्ततरां श्रियम्।
इत्येता गतयः सर्वाः पृथक्ते समुदीरिताः॥ ४१॥
वहाँ भी दूसरोंका अपनेसे बहुत अधिक दीप्तिमान् तेज एवं ऐश्वर्य देखकर मनमें सन्तोष नहीं होता है। इस प्रकार जीवकी इन सभी गतियोंका मैंने तुम्हारे समक्ष पृथक्-पृथक् वर्णन किया है॥ ४१॥
उपपत्तिं तु वक्ष्यामि गर्भस्याहमतः परम्।
तथा तन्मे निगदतः शृणुष्वावहितो द्विज॥ ४२॥
अब मैं यह बतलाऊँगा कि जीव किस प्रकार गर्भमें आकर जन्म धारण करता है। ब्रह्मन्! तुम एकाग्रचित्त होकर मेरे मुखसे इस विषयका वर्णन सुनो॥ ४२॥
॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि उत्तरगीतायां द्वितीयोऽध्यायः॥ २ ॥
तीसरा अध्याय
जीवके गर्भ-प्रवेश, आचार-धर्म, कर्म-फलकी अनिवार्यता तथा संसारसे तरनेके उपायका वर्णन
ब्राह्मण उवाच
शुभानामशुभानां च नेह नाशोऽस्ति कर्मणाम्।
प्राप्य प्राप्यानुपच्यन्ते क्षेत्रं क्षेत्रं तथा तथा॥ १॥
सिद्ध ब्राह्मण बोले— काश्यप! इस लोकमें किये हुए शुभ और अशुभ कर्मोंका फल भोगे बिना नाश नहीं होता। वे कर्म वैसा-वैसा कर्मानुसार एकके बाद एक शरीर धारण कराकर अपना फल देते रहते हैं॥ १॥
यथा प्रसूयमानस्तु फली दद्यात् फलं बहु।
तथा स्याद् विपुलं पुण्यं शुद्धेन मनसा कृतम्॥ २॥
जैसे फल देनेवाला वृक्ष फलनेका समय आनेपर बहुत-से फल
३५६ * गीता-संग्रह *
प्रदान करता है, उसी प्रकार शुद्ध हृदयसे किये हुए पुण्यका फल अधिक होता है॥२॥
पापं चापि तथैव स्यात् पापेन मनसा कृतम्।
पुरोधाय मनो हीदं कर्मण्यात्मा प्रवर्तते॥ ३॥
इसी तरह कलुषित चित्तसे किये हुए पापके फलमें भी वृद्धि होती है; क्योंकि जीवात्मा मनको आगे करके ही प्रत्येक कार्यमें प्रवृत्त होता है॥ ३॥
यथा कर्मसमाविष्टः काममन्युसमावृतः।
नरो गर्भं प्रविशति तच्चापि शृणु चोत्तरम्॥ ४॥
काम-क्रोधसे घिरा हुआ मनुष्य जिस प्रकार कर्मजालमें आबद्ध होकर गर्भमें प्रवेश करता है, उसका भी उत्तर सुनो॥ ४॥
शुक्रं शोणितसंसृष्टं स्त्रिया गर्भाशयं गतम्।
क्षेत्रं कर्मजमाप्नोति शुभं वा यदि वाशुभम्॥ ५॥
जीव पहले पुरुषके वीर्यमें प्रविष्ट होता है, फिर स्त्रीके गर्भाशयमें जाकर उसके रजमें मिल जाता है। तत्पश्चात् उसे कर्मानुसार शुभ या अशुभ शरीरकी प्राप्ति होती है॥ ५॥
सौक्ष्म्यादव्यक्तभावाच्च न च क्वचन सज्जति।
सम्प्राप्य ब्रह्मणः कामं तस्मात् तद् ब्रह्म शाश्वतम्॥ ६॥
जीव अपनी इच्छाके अनुसार उस शरीरमें प्रवेश करके सूक्ष्म और अव्यक्त होनेके कारण कहीं आसक्त नहीं होता है; क्योंकि वास्तवमें वह सनातन परब्रह्मस्वरूप है॥ ६॥
तद् बीजं सर्वभूतानां तेन जीवन्ति जन्तवः।
स जीवः सर्वगात्राणि गर्भस्याविश्य भागशः॥ ७॥
दधाति चेतसा सद्यः प्राणस्थानेष्ववस्थितः।
ततः स्पन्दयतेऽङ्गानि च गर्भश्चेतनान्वितः॥ ८॥
वह जीवात्मा सम्पूर्ण भूतोंकी स्थितिका हेतु है, क्योंकि उसीके
- उत्तरगीता * ३५७
द्वारा सब प्राणी जीवित रहते हैं। वह जीव गर्भके समस्त अंगमें प्रविष्ट हो उसके प्रत्येक अंशमें तत्काल चेतनता ला देता है और वही प्राणोंके स्थान—वक्षःस्थलमें स्थित हो समस्त अंगोंका संचालन करता है। तभी वह गर्भ चेतनासे सम्पन्न होता है॥७-८॥
यथा लोहस्य निःस्यन्दो निषिक्तो बिम्बविग्रहम्।
उपैति तद् विजानीहि गर्भे जीवप्रवेशनम्॥ ९॥
जैसे तपाये हुए लोहेका द्रव्य जिस प्रकारके साँचेमें ढाला जाता है, उसीका रूप धारण कर लेता है, उसी प्रकार गर्भमें जीवका प्रवेश होता है, ऐसा समझो। (अर्थात् जीव जिस प्रकारकी योनिमें प्रविष्ट होता है, उसी रूपमें उसका शरीर बन जाता है)॥९॥
लोहपिण्डं यथा वह्निः प्रविश्य ह्यतितापयेत्।
तथा त्वमपि जानीहि गर्भे जीवोपपादनम्॥१०॥
जैसे आग लोहपिण्डमें प्रविष्ट होकर उसे बहुत तपा देती है, उसी प्रकार गर्भमें जीवका प्रवेश होता है और वह उसमें चेतनता ला देता है। इस बातको तुम अच्छी तरह समझ लो॥१०॥
यथा च दीपः शरणे दीप्यमानः प्रकाशते।
एवमेव शरीराणि प्रकाशयति चेतना॥११॥
जिस प्रकार जलता हुआ दीपक समूचे घरमें प्रकाश फैलाता है, उसी प्रकार जीवकी चैतन्य शक्ति शरीरके सब अवयवोंको प्रकाशित करती है॥११॥
यद् यच्च कुरुते कर्म शुभं वा यदि वाशुभम्।
पूर्वदेहकृतं सर्वमवश्यमुपभुज्यते॥ १२॥
मनुष्य शुभ अथवा अशुभ जो-जो कर्म करता है, पूर्वजन्मके शरीरसे किये गये उन सब कर्मोंका फल उसे अवश्य भोगना पड़ता है॥१२॥
३५८ * गीता-संग्रह *
ततस्तु क्षीयते चैव पुनश्चान्यत् प्रचीयते।
यावत् तन्मोक्षयोगस्थं धर्मं नैवावबुध्यते॥ १३॥
उपभोगसे प्राचीन कर्मका तो क्षय होता है और फिर दूसरे नये-नये कर्मोंका संचय बढ़ जाता है। जबतक मोक्षकी प्राप्तिमें सहायक धर्मका उसे ज्ञान नहीं होता, तबतक यह कर्मोंकी परम्परा नहीं टूटती है॥ १३॥
तत्र कर्म प्रवक्ष्यामि सुखी भवति येन वै।
आवर्तमानो जातीषु यथान्योन्यासु सत्तम॥ १४॥
साधुशिरोमणे! इस प्रकार भिन्न-भिन्न योनियोंमें भ्रमण करनेवाला जीव जिनके अनुष्ठानसे सुखी होता है, उन कर्मोंका वर्णन सुनो॥ १४॥
दानं व्रतं ब्रह्मचर्यं यथोक्तं ब्रह्मधारणम्।
दमः प्रशान्तता चैव भूतानां चानुकम्पनम्॥ १५॥
संयमाश्चानृशंस्यं च परस्वादानवर्जनम्।
व्यलीकानामकरणं भूतानां मनसा भुवि॥ १६॥
मातापित्रोश्च शुश्रूषा देवतातिथिपूजनम्।
गुरूपूजा घृणा शौचं नित्यमिन्द्रियसंयमः॥ १७॥
प्रवर्तनं शुभानां च तत् सतां वृत्तमुच्यते।
ततो धर्मः प्रभवति यः प्रजाः पाति शाश्वतीः॥ १८॥
दान, व्रत, ब्रह्मचर्य, शास्त्रोक्त रीतिसे वेदाध्ययन, इन्द्रिय-निग्रह, शान्ति, समस्त प्राणियोंपर दया, चित्तका संयम, कोमलता, दूसरोंके धन लेनेकी इच्छाका त्याग, संसारके प्राणियोंका मनसे भी अहित न करना, माता-पिताकी सेवा, देवता, अतिथि और गुरुओंकी पूजा, दया, पवित्रता, इन्द्रियोंको सदा काबूमें रखना तथा शुभ कर्मोंका प्रचार करना—यह सब श्रेष्ठ पुरुषोंका बर्ताव कहलाता है। इनके अनुष्ठानसे धर्म होता है, जो सदा प्रजावर्गकी रक्षा करता है॥ १५-१८॥
- उत्तरगीता * ३५९
एवं सत्सु सदा पश्येत् तत्राप्येषा ध्रुवा स्थितिः। आचारो धर्ममाचष्टे यस्मिञ्शान्ता व्यवस्थिताः ॥ १९॥
सत्पुरुषोंमें सदा ही इस प्रकारका धार्मिक आचरण देखा जाता है। उन्हींमें धर्मकी अटल स्थिति होती है। सदाचार ही धर्मका परिचय देता है। शान्तचित्त महात्मा पुरुष सदाचारमें ही स्थित रहते हैं ॥ १९॥
तेषु तत् कर्म निक्षिप्तं यः स धर्मः सनातनः। यस्तं समभिपद्येत न स दुर्गतिमाप्नुयात् ॥ २०॥
उन्हींमें पूर्वोक्त दान आदि कर्मोंकी स्थिति है। वे ही कर्म सनातन धर्मके नामसे प्रसिद्ध हैं। जो उस सनातन धर्मका आश्रय लेता है, उसे कभी दुर्गति नहीं भोगनी पड़ती है ॥ २०॥
अतो नियम्यते लोकः प्रच्यवन् धर्मवर्त्मसु। यश्च योगी च मुक्तश्च स एतेभ्यो विशिष्यते ॥ २१॥
इसीलिये धर्ममार्गसे भ्रष्ट होनेवाले लोगोंका नियन्त्रण किया जाता है। जो योगी और मुक्त है, वह अन्य धर्मात्माओंकी अपेक्षा श्रेष्ठ होता है ॥ २१॥
वर्तमानस्य धर्मेण शुभं यत्र यथा तथा। संसारतारणं ह्यस्य कालेन महता भवेत् ॥ २२॥
जो धर्मके अनुसार बर्ताव करता है, वह जहाँ जिस अवस्थामें हो, वहाँ उसी स्थितिमें उसको अपने कर्मानुसार उत्तम फलकी प्राप्ति होती है और वह धीरे-धीरे अधिक काल बीतनेपर संसार-सागरसे तर जाता है ॥ २२॥
एवं पूर्वकृतं कर्म नित्यं जन्तुः प्रपद्यते। सर्वं तत्कारणं येन विकृतोऽयमिहागतः ॥ २३॥
इस प्रकार जीव सदा अपने पूर्वजन्मोंमें किये हुये कर्मोंका फल भोगता है। यह आत्मा निर्विकार ब्रह्म होनेपर भी विकृत होकर इस जगत्में जो जन्म धारण करता है, उसमें कर्म ही कारण है ॥ २३॥
३६० * गीता-संग्रह *
शरीरग्रहणं चास्य केन पूर्वं प्रकल्पितम्। इत्येवं संशयो लोके तच्च वक्ष्याम्यतः परम्॥ २४॥ आत्माके शरीर धारण करनेकी प्रथा सबसे पहले किसने चलायी है, इस प्रकारका संदेह प्रायः लोगोंके मनमें उठा करता है, अतः उसीका उत्तर दे रहा हूँ॥ २४॥
शरीरमात्मनः कृत्वा सर्वलोकपितामहः। त्रैलोक्यमसृजद् ब्रह्मा कृत्स्नं स्थावरजङ्गमम्॥ २५॥ सम्पूर्ण जगत्के पितामह ब्रह्माजीने सबसे पहले स्वयं ही शरीर धारण करके स्थावर-जंगमरूप समस्त त्रिलोकीकी (कर्मानुसार) रचना की॥ २५॥
ततः प्रधानमसृजत् प्रकृतिं स शरीरिणाम्। यया सर्वमिदं व्याप्तं यां लोके परमां विदुः॥ २६॥ उन्होंने प्रधान नामक तत्त्वकी उत्पत्ति की, जो देहधारी जीवोंकी प्रकृति कहलाती है। जिसने इस सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त कर रखा है तथा लोकमें जिसे मूल प्रकृतिके नामसे जानते हैं॥ २६॥
इदं तत्क्षरमित्युक्तं परं त्वमृतमक्षरम्। त्रयाणां मिथुनं सर्वमेकैकस्य पृथक् पृथक्॥ २७॥ यह प्राकृत जगत् क्षर कहलाता है, इससे भिन्न अविनाशी जीवात्माको अक्षर कहते हैं। (इनसे विलक्षण शुद्ध परब्रह्म हैं)— इन तीनोंमेंसे जो दो तत्त्व—क्षर और अक्षर हैं, वे सब प्रत्येक जीवके लिये पृथक्-पृथक् होते हैं॥ २७॥
असृजत् सर्वभूतानि पूर्वदृष्टः प्रजापतिः। स्थावराणि च भूतानि इत्येषा पौर्विकी श्रुतिः॥ २८॥ श्रुतिमें जो सृष्टिके आरम्भमें सत्रूपसे निर्दिष्ट हुए हैं, उन प्रजापतिने समस्त स्थावर भूतों और जंगम प्राणियोंकी सृष्टि की है, यह पुरातन श्रुति है॥ २८॥
- उत्तरगीता * ३६१
तस्य कालपरीमाणमकरोत् स पितामहः।
भूतेषु परिवृत्तिं च पुनरावृत्तिमेव च॥ २९॥
पितामहने जीवके लिये नियत समयतक शरीर धारण किये रहनेकी, भिन्न-भिन्न योनियोंमें भ्रमण करनेकी और परलोकसे लौटकर फिर इस लोकमें जन्म लेने आदिकी भी व्यवस्था की है॥ २९॥
यथात्र कश्चिन्मेधावी दृष्टात्मा पूर्वजन्मनि।
यत् प्रवक्ष्यामि तत् सर्वं यथावदुपपद्यते॥ ३०॥
जिसने पूर्वजन्ममें अपने आत्माका साक्षात्कार कर लिया हो, ऐसा कोई मेधावी अधिकारी पुरुष संसारकी अनित्यताके विषयमें जैसी बात कह सकता है, वैसी ही मैं भी कहूँगा। मेरी कही हुई सारी बातें यथार्थ और संगत होंगी॥ ३०॥
सुखदुःखे यथा सम्यगनित्ये यः प्रपश्यति।
कायं चामेध्यसङ्घातं विनाशं कर्मसंहितम्॥ ३१॥
यच्च किञ्चित्सुखं तच्च दुःखं सर्वमिति स्मरन्।
संसारसागरं घोरं तरिष्यति सुदुस्तरम्॥ ३२॥
जो मनुष्य सुख और दुःख दोनोंको अनित्य समझता है, शरीरको अपवित्र वस्तुओंका समूह समझता है और मृत्युको कर्मका फल समझता है तथा सुखके रूपमें प्रतीत होनेवाला जो कुछ भी है, वह सब दुःख-ही-दुःख है, ऐसा मानता है, वह घोर एवं दुस्तर संसार-सागरसे पार हो जायगा॥ ३१-३२॥
जातीमरणरोगैश्च समाविष्टः प्रधानवित्।
चेतनावत्सु चैतन्यं समं भूतेषु पश्यति॥ ३३॥
निर्विद्यते ततः कृत्स्नं मार्गमाणः परं पदम्।
तस्योपदेशं वक्ष्यामि याथातथ्येन सत्तम॥ ३४॥
जन्म, मृत्यु एवं रोगोंसे घिरा हुआ जो पुरुष प्रधान तत्त्व (प्रकृति)-