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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

DevanagariHindipublished675 पृष्ठ

* अष्टावक्रगीता * ५२३

भावनाभावनासक्ता दृष्टिर्मूढस्य सर्वदा।
भाव्यभावनया सा तु स्वस्थस्यादृष्टिरूपिणी ॥ ६३ ॥

अज्ञानीकी दृष्टि सर्वदा भाव या अभावमें लगी रहती है, तत्त्वज्ञ-पुरुषकी दृष्टि तो दृश्यको देखते रहनेपर भी अदृष्टि ही है॥ ६३ ॥

सर्वारम्भेषु निष्कामो यश्चरेद् बालवन्मुनिः।
न लेपस्तस्य शुद्धस्य क्रियमाणेऽपि कर्मणि ॥ ६४ ॥

जो तत्त्वज्ञ सभी कामोंमें बालकके समान निष्काम व्यवहार करता है, वह शुद्ध है। कर्म करनेपर भी वह लिप्त नहीं होता ॥ ६४ ॥

स एव धन्य आत्मज्ञः सर्वभावेषु यः समः।
पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्निस्तर्षमानसः ॥ ६५ ॥

वह आत्मज्ञानी धन्य है, जो समस्त स्थितियोंमें सम रहता है। देखते, सुनते, छूते, सूँघते और खाते-पीते भी उसका मानस तृष्णा-रहित होता है ॥ ६५ ॥

क्व संसारः क्व चाभासः क्व साध्यं क्व च साधनम्।
आकाशस्येव धीरस्य निर्विकल्पस्य सर्वदा ॥ ६६ ॥

स्थितप्रज्ञ पुरुष सर्वदा आकाशके समान निर्विकल्प रहता है। उसकी दृष्टिमें संसार कहाँ और उसका भान कहाँ ? उसके लिये साध्य क्या और साधन क्या ? ॥ ६६ ॥

स जयत्यर्थसंन्यासी पूर्णस्वरसविग्रहः।
अकृत्रिमोऽनवच्छिन्ने समाधिर्यस्य वर्तते ॥ ६७ ॥

जिस तत्त्वज्ञ पुरुषको अपने अखण्ड स्वरूपमें सर्वदा स्वाभाविक समाधि रहती है, जिसका लौकिक, पारलौकिक कोई स्वार्थ नहीं है, जो पूर्ण स्वानन्द-घन है, वास्तवमें वही विजयी है ॥ ६७ ॥

५२४ * गीता-संग्रह *


बहुनात्र किमुक्तेन ज्ञाततत्त्वो महाशयः । भोगमोक्षनिराकाङ्क्षी सदा सर्वत्र नीरसः ॥ ६८ ॥

बहुत कहनेसे क्या लाभ? तत्त्वज्ञ महापुरुष भोग और मोक्ष दोनोंके प्रति आकांक्षारहित होता है और सदा सर्वत्र रागरहित होता है ॥ ६८ ॥

महदादि जगद् द्वैतं नाममात्रविजृम्भितम् । विहाय शुद्धबोधस्य किं कृत्यमवशिष्यते ॥ ६९ ॥

महत्तत्त्वसे लेकर सम्पूर्ण द्वैत-रूप दृश्य जगत् नाममात्रका पसारा है। शुद्ध बोध-स्वरूप तत्त्वज्ञने जब इसका परित्याग ही कर दिया तब भला उसका क्या कर्तव्य शेष है? ॥ ६९ ॥

भ्रमभूतमिदं सर्वं किञ्चिन्नास्तीति निश्चयी । अलक्ष्यस्फुरणः शुद्धः स्वभावेनैव शाम्यति ॥ ७० ॥

यह सम्पूर्ण दृश्य-प्रपंच भ्रममात्र है। यह कुछ नहीं है—ऐसे महानिश्चयसे सम्पन्न शुद्ध पुरुष दृश्यकी स्फूर्तिसे भी रहित हो जाता है और स्वभावसे ही शान्त हो जाता है ॥ ७० ॥

शुद्धस्फुरणरूपस्य दृश्यभावमपश्यतः । क्व विधिः क्व च वैराग्यं क्व त्यागः क्व शमोऽपि वा ॥ ७१ ॥

जो शुद्ध स्फुरण-स्वरूप है, जिसे दृश्य सत्तावान् नहीं मालूम पड़ता, उसके लिये विधि क्या? वैराग्य क्या? त्याग क्या? और शान्ति क्या? ॥ ७१ ॥

स्फुरतोऽनन्तरूपेण प्रकृतिं च न पश्यतः । क्व बन्धः क्व च वा मोक्षः क्व हर्षः क्व विषादिता ॥ ७२ ॥

जो अनन्त रूपसे स्वयं ही स्फुरित हो रहा है और प्रकृतिकी पृथक् सत्ताको नहीं देखता है, उसके लिये बन्ध कहाँ? मोक्ष कहाँ? हर्ष कहाँ और विषाद कहाँ? ॥ ७२ ॥

  • अष्टावक्रगीता * ५२५

बुद्धिपर्यन्तसंसारे मायामात्रं विवर्तते। निर्ममो निरहङ्कारो निष्कामः शोभते बुधः॥ ७३ ॥ संसारका पर्यवसान है बुद्धि और यहाँ मात्र मायाका विवर्त है। इस तत्त्वको जाननेवाला पुरुष काम, ममता और अहंकारसे रहित होकर शोभा पाता है॥ ७३ ॥

अक्षयं गतसन्तापमात्मानं पश्यतो मुनेः। क्व विद्या क्व च वा विश्वं क्व देहोऽहं ममेति वा॥ ७४ ॥ जो तत्त्वज्ञ सन्तापसे रहित अपने अविनाशी स्वरूपको जानता है, उसके लिये विद्या कहाँ, विश्व कहाँ, देह कहाँ और अहंता-ममता कहाँ? ॥ ७४ ॥

निरोधादीनि कर्माणि जहाति जडधीर्यदि। मनोरथान्प्रलापांश्च कर्तुमाप्नोति तत्क्षणात् ॥ ७५ ॥ अज्ञानी पुरुष यदि निरोधादि अभ्यासोंको छोड़ देता है तो वह दूसरे ही क्षण बड़े-बड़े मनोरथ और प्रलाप करने लगता है॥ ७५ ॥

मन्दः श्रुत्वापि तद्वस्तु न जहाति विमूढताम्। निर्विकल्पो बहिर्यत्नादन्तर्विषयलालसः ॥ ७६ ॥ अज्ञानी ब्रह्म और आत्माके एकतारूप तत्त्वका श्रवण करके भी अपनी मूर्खताका परित्याग नहीं करता। वह बाहर तो प्रयत्नसे (कुछ क्षणके लिये) निःसंकल्प हो जाता है, परंतु उसके भीतर विषयोंकी लालसाका बीज बना ही रहता है॥ ७६ ॥

ज्ञानाद् गलितकर्मा यो लोकदृष्ट्यापि कर्मकृत्। नाप्नोत्यवसरं कर्तुं वक्तुमेव न किञ्चन ॥ ७७ ॥ आत्मज्ञानसे जिसकी कर्म-वासना गल गयी है, वह लोकदृष्टिसे कर्म करता रहे तो भी उसके कुछ करने अथवा कहनेके लिये कोई अवसर नहीं मिलता। (वास्तवमें वह अकर्ता और अवक्ता ही है) ॥ ७७ ॥

५२६ * गीता-संग्रह *


क्व तमः क्व प्रकाशो वा हानं क्व च न किञ्चन।
निर्विकारस्य धीरस्य निरातङ्कस्य सर्वदा ॥ ७८ ॥
जो स्थितप्रज्ञ सर्वदा निर्विकार अतएव निरातंक है, उसके लिये अज्ञान कहाँ, ज्ञान कहाँ और त्याग कहाँ? उसके लिये किसीका अस्तित्व नहीं रहता ॥ ७८ ॥

क्व धैर्यं क्व विवेकित्वं क्व निरातङ्कतापि वा।
अनिर्वाच्यस्वभावस्य निःस्वभावस्य योगिनः ॥ ७९ ॥
तत्त्वज्ञको धैर्य कहाँ, विवेक कहाँ? और निर्भयता भी कहाँ? उसका स्वभाव अनिर्वचनीय होता है। वास्तवमें तो वह स्वाभावरहित होता है ॥ ७९ ॥

न स्वर्गो नैव नरको जीवन्मुक्तिर्न चैव हि।
बहुनात्र किमुक्तेन योगदृष्ट्या न किञ्चन ॥ ८० ॥
स्थितप्रज्ञ पुरुषके लिये न स्वर्ग है, न नरक और न जीवन्मुक्ति। इस सम्बन्धमें बहुत कहनेसे क्या लाभ? वस्तु-तत्त्वके साक्षात्कारकी दृष्टिसे कुछ नहीं है ॥ ८० ॥

नैव प्रार्थयते लाभं नालाभेनानुशोचति।
धीरस्य शीतलं चित्तममृतेनैव पूरितम् ॥ ८१ ॥
स्थितप्रज्ञका चित्त ऐसा शीतल रहता है मानो उसमें अमृत ही भर रहा हो। न वह लाभकी अभिलाषा करता है और न हानिका शोक ॥ ८१ ॥

न शान्तं स्तौति निष्कामो न दुष्टमपि निन्दति।
समदुःखसुखस्तृप्तः किञ्चित्कृत्यं न पश्यति ॥ ८२ ॥
स्थितप्रज्ञ पुरुष न सन्तकी स्तुति करता है न दुष्टकी निन्दा। वह दुःख एवं सुखमें सम रहता है, अपने आपमें तृप्त रहता है और वह अपने लिये कुछ कर्तव्य नहीं देखता ॥ ८२ ॥

* अष्टावक्रगीता * ५२७


धीरो न द्वेष्टि संसारमात्मानं न दिदृक्षति।
हर्षामर्षविनिर्मुक्तो न मृतो न च जीवति॥८३॥
स्थितप्रज्ञ न संसारसे द्वेष करता है और न तो आत्म-दर्शन ही करना चाहता है। वह हर्ष एवं रोषसे रहित होता है। वह (सामान्य रूपसे) न तो मृत है न जीवित ॥८३॥

निःस्नेहः पुत्रदारादौ निष्कामो विषयेषु च।
निश्चिन्तः स्वशरीरेऽपि निराशः शोभते बुधः॥८४॥
जो पुत्र-स्त्री आदिके प्रति स्नेहरहित है, विषयोंके प्रति निष्काम है और अपने शरीरके लिये भी निश्चिन्त है, जिसे किसी वस्तुकी आशा नहीं है, ऐसा वह ज्ञानी शोभायमान होता है॥८४॥

तुष्टिः सर्वत्र धीरस्य यथापतितवर्तिनः।
स्वच्छन्दं चरतो देशान् यत्रास्तमितशायिनः॥८५॥
जहाँ सूर्यास्त हुआ, वहाँ सो गया। जहाँ मौज हुई, वहीं विचर गया। जो सामने आया वैसा व्यवहार कर लिया। इस प्रकार स्थितप्रज्ञ सर्वत्र सन्तुष्ट होता है॥८५॥

पततूदेतु वा देहो नास्य चिन्ता महात्मनः।
स्वभावभूमिविश्रान्तिविस्मृताशेषसंसृतेः ॥८६॥
जो अपने स्वतःसिद्ध स्वरूपकी भूमिमें विश्राम करके समस्त प्रपंचका बाध कर चुका है, उस स्थितप्रज्ञ महात्माको शरीर नष्ट हो जाय अथवा बना रहे—ऐसी चिन्ता नहीं होती॥८६॥

अकिञ्चनः कामचारो निर्द्वन्द्वश्छिन्नसंशयः।
असक्तः सर्वभावेषु केवलो रमते बुधः॥८७॥
ज्ञानी पुरुष अकिंचन, स्वेच्छाचारी, निर्द्वन्द्व और सन्देहरहित होता है। वह किसी भी पदार्थमें आसक्त नहीं होता। वह तो केवल आनन्दमें विहार करता है॥८७॥

५२८ * गीता-संग्रह *


निर्ममः शोभते धीरः समलोष्टाश्मकाञ्चनः।
सुभिन्नहृदयग्रन्थिर्विनिर्धूतरजस्तमः ॥ ८८ ॥

स्थितप्रज्ञकी हृदय-ग्रन्थि खुल जाती है। रजोगुण, तमोगुण धुल जाते हैं। वह मिट्टीके ढेले, पत्थर और सोनेको सम-दृष्टिसे देखता है, उसको कहीं ममता नहीं होती। वास्तवमें वही शोभा पाता है॥ ८८॥

सर्वत्रानवधानस्य न किञ्चिद्वासना हृदि।
मुक्तात्मनो वितृप्तस्य तुलना केन जायते ॥ ८९ ॥

जो प्रपंचकी किसी वस्तुपर ध्यान नहीं देता; जो आत्मतृप्त है; उसके हृदयमें तनिक भी वासना नहीं होती—ऐसे मुक्तात्माकी बराबरी किसके साथ की जा सकती है!॥ ८९ ॥

जानन्नपि न जानाति पश्यन्नपि न पश्यति।
ब्रुवन्नपि न च ब्रूते कोऽन्यो निर्वासनादृते ॥ ९० ॥

वासनाहीन स्थितप्रज्ञ पुरुषके अतिरिक्त ऐसा और कौन है जो जानता हुआ भी न जाने, देखता हुआ भी न देखे और बोलता हुआ भी न बोले॥ ९० ॥

भिक्षुर्वा भूपतिर्वापि यो निष्कामः स शोभते।
भावेषु गलिता यस्य शोभनाशोभना मतिः ॥ ९१ ॥

राजा हो चाहे रंक, जो निष्काम है वही शोभा पाता है। जिसकी दृश्य-पदार्थोंमें शुभ और अशुभ बुद्धि समाप्त हो गयी है, वही निष्काम है॥ ९१ ॥

क्व स्वाच्छन्द्यं क्व सङ्कोचः क्व वा तत्त्वनिश्चयः।
निर्व्याजार्जवभूतस्य चरितार्थस्य योगिनः ॥ ९२ ॥

तत्त्वज्ञ निष्कपट, सरल और कृतकृत्य होता है। उसके लिये स्वच्छन्दता कहाँ, संकोच कहाँ और तत्त्व-निश्चय भी कहाँ?॥ ९२ ॥

  • अष्टावक्रगीता * ५२९

आत्मविश्रान्तितृप्तेन निराशेन गतार्तिना। अन्तर्यदनुभूयेत तत्कथं कस्य कथ्यते॥ ९३॥

जो अपने स्वरूपमें विश्राम करके तृप्त है, किसी वस्तुकी आशा नहीं रखता, आर्तिरहित है, वह अपने अन्तःकरणमें जिस आनन्दका अनुभव करता है, वह कैसे किसको बतलाया जाय ? ॥ ९३ ॥

सुप्तोऽपि न सुषुप्तौ च स्वप्नेऽपि शयितो न च। जागरेऽपि न जागर्ति धीरस्तृप्तः पदे पदे॥ ९४॥

स्थितप्रज्ञ पुरुष पद-पदपर तृप्त रहता है। वह सोकर भी नहीं सोता, वह स्वप्न देखकर भी नहीं देखता और वह जाग्रत्-अवस्थामें रहनेपर भी वस्तुतः नहीं जागता ॥ ९४ ॥

ज्ञः सचिन्तोऽपि निश्चिन्तः सेन्द्रियोऽपि निरिन्द्रियः। सबुद्धिरपि निर्बुद्धिः साहङ्कारोऽनहङ्कृती ॥ ९५ ॥

तत्त्वज्ञ सचिन्त होनेपर भी निश्चिन्त होता है, इन्द्रियवान् होनेपर भी निरिन्द्रिय है, बुद्धिमान् होनेपर भी बुद्धिहीन है और साहंकार होनेपर भी निरहंकार रहता है॥ ९५॥

न सुखी न च वा दुःखी न विरक्तो न सङ्गवान्। न मुमुक्षुर्न वा मुक्तो न किञ्चिन्न च किञ्चन॥ ९६ ॥

तत्त्वज्ञ न सुखी होता है न दुःखी। न विरक्त होता है न अनुरक्त। वह न मुमुक्षु है, न मुक्त। न कुछ है, न कुछ नहीं ॥ ९६ ॥

विक्षेपेऽपि न विक्षिप्तः समाधौ न समाधिमान्। जाड्येऽपि न जडो धन्यः पाण्डित्येऽपि न पण्डितः॥ ९७ ॥

तत्त्वज्ञ विक्षेपमें भी विक्षिप्त नहीं होता, समाधिमें भी समाधिस्थ नहीं रहता। वह जड़तामें जड़ नहीं है और पाण्डित्यमें भी पण्डित नहीं है॥ ९७॥

५३० * गीता-संग्रह *


मुक्तो यथास्थितिस्वस्थः कृतकर्तव्यनिर्वृतः।
समः सर्वत्र वैतृष्ण्यान्न स्मरत्यकृतं कृतम्॥ ९८॥

तत्त्वज्ञ समस्त स्थितियोंमें स्वरूपस्थित रहता है। कृतकृत्य होनेके कारण परम शान्त होता है। सर्वत्र सम रहता है। तृष्णाका अभाव होनेके कारण वह 'क्या किया, क्या नहीं किया'—इन बातोंका स्मरण नहीं करता॥ ९८॥

न प्रीयते वन्द्यमानो निन्द्यमानो न कुप्यति।
नैवोद्विजति मरणे जीवने नाभिनन्दति॥ ९९॥

वन्दना करनेसे वह प्रसन्न नहीं होता, निन्दा करनेसे क्रुद्ध नहीं होता, मृत्युसे उद्वेग नहीं करता और जीवनका अभिनन्दन नहीं करता॥ ९९॥

न धावति जनाकीर्णं नारण्यमुपशान्तधीः।
यथा तथा यत्र तत्र सम एवावतिष्ठते॥ १००॥

शान्तचित्त तत्त्वज्ञ न तो जनसमूहकी ओर दौड़ता है और न जंगलकी ओर। जहाँ जिस स्थितिमें वह होता है, वहाँ समचित्त ही रहता है॥ १००॥

॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायां शान्तिशतकं नामाष्टादशं प्रकरणं समाप्तम्॥ १८॥


उन्नीसवाँ प्रकरण

तत्त्वज्ञानीकी विवेक-प्रक्रिया

तत्त्वविज्ञानसन्दंशमादाय हृदयोदरात्।
नानाविधपरामर्शशल्योद्धारः कृतो मया॥ १॥

जैसे सफल चिकित्सक सँड़सीके द्वारा पेटमें घुसे हुए बाणोंको बड़ी चतुरतासे निकाल लेता है, वैसे ही मैंने तत्त्वज्ञानके द्वारा अपने हृदयसे अनेक प्रकारके संकल्प-विकल्प, विचार-विमर्शको निकाल फेंका है॥ १॥

  • अष्टावक्रगीता * ५३१

क्व धर्मः क्व च वा कामः क्व चार्थः क्व विवेकता।
क्व द्वैतं क्व च वाऽद्वैतं स्वमहिम्नि स्थितस्य मे॥२॥

मैं अपनी महिमामें स्थित हूँ। मेरे लिये धर्म कहाँ ? काम कहाँ ? अर्थ कहाँ? विवेक कहाँ? द्वैत कहाँ और अद्वैत कहाँ?॥२॥

क्व भूतं क्व भविष्यद्वा वर्तमानमपि क्व वा।
क्व देशः क्व च वा नित्यं स्वमहिम्नि स्थितस्य मे॥३॥

मैं सदा-सर्वदा अपनी महिमामें स्थित हूँ। मेरे लिये भूत, भविष्य तथा वर्तमान-रूप काल कहाँ, देश कहाँ?॥३॥

क्व चात्मा क्व च वानात्मा क्व शुभं क्वाशुभं तथा।
क्व चिन्ता क्व च वाचिन्ता स्वमहिम्नि स्थितस्य मे॥४॥

मैं अपनी महिमामें स्थित हूँ। मेरे लिये आत्मा-अनात्मा, शुभ-अशुभ चिन्ता एवं अचिन्ताका अस्तित्व ही कहाँ है?॥४॥

क्व स्वप्नः क्व सुषुप्तिर्वा क्व च जागरणं तथा।
क्व तुरीयं भयं वापि स्वमहिम्नि स्थितस्य मे॥५॥

मैं अपनी महिमामें स्थित हूँ। मेरे लिये कहाँ स्वप्न और कहाँ सुषुप्ति ? कहाँ जागरण और कहाँ तुरीय ? मेरे लिये भय ही कहाँ है?॥५॥

क्व दूरं क्व समीपं वा बाह्यं क्वाभ्यन्तरं क्व वा।
क्व स्थूलं क्व च वा सूक्ष्मं स्वमहिम्नि स्थितस्य मे॥६॥

मैं अपनी महिमामें स्थित हूँ। मेरे लिये कहाँ दूर और कहाँ समीप? कहाँ बाह्य और कहाँ आभ्यन्तर? कहाँ स्थूल और कहाँ सूक्ष्म ?॥६॥

क्व मृत्युर्जीवितं वा क्व लोकाः क्वास्य क्व लौकिकम्।
क्व लयः क्व समाधिर्वा स्वमहिम्नि स्थितस्य मे॥७॥

मैं अपनी महिमामें स्थित हूँ। मेरे लिये कहाँ मृत्यु और कहाँ

५३२ * गीता-संग्रह *


जीवन ? कहाँ लोक और कहाँ लौकिक विषयवस्तु ? कहाँ लय और कहाँ समाधि ? ॥ ७ ॥
अलं त्रिवर्गकथया योगस्य कथयाप्यलम्।
अलं विज्ञानकथया विश्रान्तस्य ममात्मनि ॥ ८ ॥
अर्थ, धर्म, कामकी बात बन्द करो। योगकी कथा भी अनावश्यक है। अब विज्ञानकी चर्चा भी बहुत हो चुकी। बस, मैं तो अपने स्वरूपमें स्थित हूँ॥ ८ ॥
॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायामात्मविश्रान्तिनाम एकोनविंशतिकं प्रकरणं समाप्तम् ॥ १९ ॥


बीसवाँ प्रकरण

स्वस्वरूपमें स्थित पुरुषकी स्थिति

क्व भूतानि क्व देहो वा क्वेन्द्रियाणि क्व वा मनः।
क्व शून्यं क्व च नैराश्यं मत्स्वरूपे निरञ्जने ॥ १ ॥
मेरे निर्मल स्वरूपमें पंचभूत कहाँ ? देह कहाँ ? इन्द्रियाँ कहाँ ? मन कहाँ ? शून्य कहाँ ? और निराशा भी कहाँ ? ॥ १ ॥

क्व शास्त्रं क्वात्मविज्ञानं क्व वा निर्विषयं मनः।
क्व तृप्तिः क्व वितृष्णत्वं गतद्वन्द्वस्य मे सदा ॥ २ ॥
मैं सर्वदा निर्द्वन्द्व हूँ। मेरे लिये कहाँ शास्त्र और कहाँ आत्म-विज्ञान ? कहाँ मनकी निर्विषयता, कहाँ तृप्ति और कहाँ तृष्णासे रहित होना ? ॥ २ ॥

क्व विद्या क्व च वाविद्या क्वाहं क्वेदं मम क्व वा।
क्व बन्धः क्व च वा मोक्षः स्वरूपस्य क्व रूपिता ॥ ३ ॥
स्वरूपमें विद्या कहाँ ? अविद्या कहाँ ? अहं कहाँ और इदं कहाँ ? ममता कहाँ ? बन्धन कहाँ ? मोक्ष कहाँ ? उसमें रूपका होना भी कहाँ है ? ॥ ३ ॥

  • अष्टावक्रगीता * ५३३

क्व प्रारब्धानि कर्माणि जीवन्मुक्तिरपि क्व वा।
क्व तद्विदेहकैवल्यं निर्विशेषस्य सर्वदा॥४॥
जो सर्वदा निर्विशेष एकरस वस्तु है, उसमें प्रारब्ध-कर्म कहाँ? जीवन्मुक्ति कहाँ और विदेहकैवल्य भी कहाँ?॥४॥

क्व कर्ता क्व च वा भोक्ता निष्क्रियं स्फुरणं क्व वा।
क्वापरोक्षं फलं वा क्व निःस्वभावस्य मे सदा॥५॥
मैं सदा-सर्वदा एकरस, स्वभावरहित हूँ। मुझमें कर्ता कहाँ? भोक्ता कहाँ? निष्क्रिय स्फुरण भी कहाँ? अपरोक्ष ज्ञान कहाँ और फल-ज्ञान कहाँ?॥५॥

क्व लोकः क्व मुमुक्षुर्वा क्व योगी ज्ञानवान् क्व वा।
क्व बद्धः क्व च वा मुक्तः स्वस्वरूपेऽहमद्वये॥६॥
अद्वितीय स्वस्वरूपमें कहाँ लोक और कहाँ मुमुक्षु? कहाँ योगी और कहाँ ज्ञानवान्? कहाँ बद्ध और कहाँ मुक्त?॥६॥

क्व सृष्टिः क्व च संहारः क्व साध्यं क्व च साधनम्।
क्व साधकः क्व सिद्धिर्वा स्वस्वरूपेऽहमद्वये॥७॥
अद्वितीय स्वस्वरूपमें कहाँ सृष्टि और कहाँ संहार? कहाँ साध्य और कहाँ साधन? कहाँ साधक और कहाँ सिद्धि?॥७॥

क्व प्रमाता प्रमाणं वा क्व प्रमेयं क्व च प्रमा।
क्व किञ्चित् क्व न किञ्चिद्वा सर्वदा विमलस्य मे॥८॥
मैं सर्वदा शुद्धस्वरूप हूँ। मुझमें न प्रमाता है न प्रमाण। न प्रमेय है न प्रमा। न कुछ है, न कुछ नहीं॥८॥

क्व विक्षेपः क्व चैकाग्र्यं क्व निर्बोधः क्व मूढता।
क्व हर्षः क्व विषादो वा सर्वदा निष्क्रियस्य मे॥९॥
मैं सर्वदा निष्क्रिय हूँ। मुझमें न विक्षेप है न एकाग्रता। न बोध है न मूढ़ता। न हर्ष है न विषाद॥९॥

५३४

  • गीता-संग्रह *

क्व चैष व्यवहारो वा क्व च सा परमार्थता।
क्व सुखं क्व च वा दुःखं निर्विमर्शस्य मे सदा॥१०॥
निर्विमर्श मुझमें संकल्प, विकल्प, विचार, बोध कुछ भी नहीं है। इसलिये न व्यवहार है न परमार्थ। न सुख है न दुःख॥१०॥
क्व माया क्व च संसारः क्व प्रीतिर्विरतिः क्व वा।
क्व जीवः क्व च तद् ब्रह्म सर्वदा विमलस्य मे॥११॥
मैं सर्वदा एकरस सम्पूर्ण मलोंसे रहित हूँ। मुझमें माया कहाँ, संसार कहाँ? राग कहाँ? वैराग्य कहाँ? जीव कहाँ? ब्रह्म कहाँ?॥११॥
क्व प्रवृत्तिर्निवृत्तिर्वा क्व मुक्तिः क्व च बन्धनम्।
कूटस्थनिर्विभागस्य स्वस्थस्य मम सर्वदा॥१२॥
मैं कूटस्थ और निरवयव हूँ। सदा-सर्वदा अपने स्वरूपमें ही स्थित हूँ। तब मेरे लिये प्रवृत्ति-निवृत्ति क्या है? और मुक्ति तथा बन्धन क्या है?॥१२॥
क्वोपदेशः क्व वा शास्त्रं क्व शिष्यः क्व च वा गुरुः।
क्व चास्ति पुरुषार्थो वा निरुपाधेः शिवस्य मे॥१३॥
मैं उपाधिरहित शिव हूँ। मेरे लिये उपदेश क्या ? शास्त्र क्या ? शिष्य क्या और गुरु क्या ? मेरे लिये पुरुषार्थका अस्तित्व भी नहीं है॥१३॥
क्व चास्ति क्व च वा नास्ति क्वास्ति चैकं क्व च द्वयम्।
बहुनात्र किमुक्तेन किञ्चिन्नोत्तिष्ठते मम॥१४॥
‘है’ कहाँ और ‘नहीं’ कहाँ? न एक है, न दो है। बहुत कहनेसे क्या लाभ? मेरे स्वरूपमें कुछ नहीं है, कुछ नहीं है॥१४॥

॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायां जीवन्मुक्तिनाम विंशतिकं प्रकरणं समाप्तम्॥२०॥

* अष्टावक्रगीता * ५३५


इक्कीसवाँ प्रकरण

अष्टावक्रगीताके प्रकरणोंके नाम और उनकी श्लोक-संख्या

विंशतिश्चोपदेशे स्युः श्लोकाश्च पञ्चविंशतिः।
सत्यात्मानुभवोल्लासे उपदेशे चतुर्दश॥ १॥

(इस २१वें प्रकरणमें ग्रन्थकी श्लोक-संख्या और विषय दिखाये गये हैं।) उपदेशनामक प्रथम प्रकरणमें २० श्लोक हैं। शिष्योक्त आत्मानुभवात्मक द्वितीय प्रकरणमें २५ श्लोक हैं। आक्षेपोपदेशनामक तृतीय प्रकरणमें १४ श्लोक हैं॥ १॥

षडुल्लासे लये चैवोपदेशे च चतुश्चतुः।
पञ्चकं स्यादनुभवे बन्धमोक्षे चतुष्ककम्॥ २॥

शिष्यानुभवात्मक चतुर्थ प्रकरणमें ६ श्लोक हैं। लयनामक पंचम प्रकरणमें ४ श्लोक हैं। गुरूपदेशनामक षष्ठ प्रकरणमें भी ४ श्लोक हैं। शिष्यानुभवात्मक सप्तम प्रकरणमें ५ श्लोक हैं। बन्धमोक्षनामक अष्टम प्रकरणमें ४ श्लोक हैं॥ २॥

निर्वेदोपशमे ज्ञान एवमेवाष्टकं भवेत्।
यथासुखे सप्तकं च शान्तौ स्याद्वेदसम्मितम्॥ ३॥

निर्वेदनामक नवम प्रकरणमें ८ श्लोक हैं। उपशमनामक दशम प्रकरणमें ८ श्लोक हैं। ज्ञानाष्टकनामक एकादश प्रकरणमें ८ श्लोक हैं। एवमेवाष्टकनामक द्वादश प्रकरणमें ८ श्लोक हैं। यथासुखनामक त्रयोदश प्रकरणमें ७ श्लोक हैं। शान्तिचतुष्कनामक चतुर्दश प्रकरणमें ४ श्लोक हैं॥ ३॥

तत्त्वोपदेशे विंशच्च दश ज्ञानोपदेशके।
तत्त्वरूपे च विंशच्च शमे च शतकं भवेत्॥ ४॥

तत्त्वोपदेशनामक पंचमदशप्रकरणमें २० श्लोक हैं। ज्ञानोपदेशनामक

२३- अवधूतगीता (१) (भगवान दत्तात्रेय)

५३६ * गीता-संग्रह *


षोडश प्रकरणमें १० श्लोक हैं। तत्त्वस्वरूपनामक सप्तदश प्रकरणमें २० श्लोक हैं। शमनामक अष्टादश प्रकरणमें १०० श्लोक हैं॥४॥

अष्टकं चात्मविश्रान्तौ जीवन्मुक्तौ चतुर्दश।
षट् सङ्ख्याक्रमविज्ञाने ग्रन्थैकात्म्यं ततः परम्॥५॥
विंशत्येकमितैः खण्डैः श्लोकैरात्माग्निमध्यखैः।
अवधूतानुभूतेशच श्लोकाः सङ्ख्याक्रमा अमी॥६॥

आत्मविश्रान्तिनामक उन्नीसवें प्रकरणमें ८ श्लोक हैं। जीवन्मुक्तिनामक विंशतिक प्रकरणमें १४ श्लोक हैं और संख्याक्रमविज्ञान नामक एकविंशतिक प्रकरणमें ६ श्लोक हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण ग्रन्थमें इक्कीस प्रकरण और ३०३ श्लोक हैं। इस प्रकार अवधूतका अनुभवरूप जो ‘अष्टावक्रगीता’ है, उसके श्लोकोंकी संख्याका क्रम बताया है॥५-६॥

॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायां संख्याक्रमविज्ञाननाम एकविंशतिकं प्रकरणं समाप्तम्॥२१॥
॥ अष्टावक्रगीता सम्पूर्ण॥

अवधूतगीता-(१)

[ भगवान् श्रीदत्तात्रेयकृत अवधूतगीता एक प्राचीन स्वतन्त्र ग्रन्थके रूपमें प्राप्त है। आठ अध्यायोंमें विभक्त इस गीतामें अवधूत श्रीदत्तात्रेयजीने मुमुक्षुजनोंके कल्याणार्थ वेदान्तमार्गद्वारा गूढ़ ब्रह्म-ज्ञानप्राप्तिका सुन्दर विवेचन किया है। इसमें आत्माका निरूपण, निर्द्वन्द्व भाव-कथन, जीव-ब्रह्मकी एकता, प्रणवका स्वरूप, वेदान्तके महावाक्योंपर विचार, ब्रह्मकी सर्वव्यापकता, मनकी लोलुपतासे निवृत्तिका उपाय, विषय-भोगकी निन्दा एवं उसके त्यागका उपाय इत्यादि अनेक परमोपयोगी उपदेश गुम्फित हैं। विरक्त मुमुक्षुजनों एवं प्रबुद्ध विचारकोंके मध्य यह अवधूतगीता प्राचीनकालसे लोकप्रिय बनी हुई है, इसीको यहाँ सानुवाद प्रस्तुत किया जा रहा है— ]

पहला अध्याय

आत्मतत्त्व एवं ब्रह्मतत्त्वका निरूपण, उनका ऐक्य तथा अनुभूति

अवधूत उवाच

ईश्वरानुग्रहादेव पुंसामद्वैतवासना ।
महद्भयपरित्राणा विप्राणामुपजायते ॥ १ ॥

अवधूत दत्तात्रेयजी बोले—ईश्वरकी कृपासे ही श्रेष्ठ पुरुषोंको [जन्ममरण-रूपी] महान् भयसे रक्षा करनेवाली अद्वैत वासना उत्पन्न होती है॥ १॥

येनेदं पूरितं सर्वमात्मनैवात्मनात्मनि ।
निराकारं कथं वन्दे ह्यभिन्नं शिवमव्ययम् ॥ २ ॥

जिस आत्माके द्वारा निश्चय ही अपनेमें यह सम्पूर्ण जगत् परिव्याप्त हो रहा है, उस निराकार आत्मतत्त्वकी वन्दना मैं किस प्रकार करूँ, क्योंकि वह [जीवसे] अभिन्न, कल्याणस्वरूप तथा अविनाशी है॥ २॥

पञ्चभूतात्मकं विश्वं मरीचिजलसन्निभम् ।
कस्याप्यहो नमस्कुर्यामहमेको निरञ्जनः ॥ ३ ॥

पाँच भूतों [पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश]–से निर्मित

अवधूतगीता (१) ❂ ॐ

अवधूत भगवान् दत्तात्रेय

अवधूत भगवान् दत्तात्रेयद्वारा आत्मतत्त्वका निरूपण

  • अवधूतगीता ( १ ) * ५३९

यह जगत् मृगतृष्णाके जलके समान [मिथ्या] है। मायामलसे रहित मैं एक हूँ तो फिर किसको नमस्कार करूँ ? ॥ ३ ॥

आत्मैव केवलं सर्वं भेदाभेदो न विद्यते।
अस्ति नास्ति कथं ब्रूयां विस्मयः प्रतिभाति मे ॥ ४ ॥
[सम्पूर्ण ब्रह्माण्डमें] सब कुछ एकमात्र आत्मा ही है। इसमें भेद तथा अभेद दोनों ही नहीं है। यह है अथवा नहीं है—यह मैं कैसे कहूँ; मुझे विस्मय प्रतीत हो रहा है॥ ४ ॥

वेदान्तसारसर्वस्वं ज्ञानविज्ञानमेव च।
अहमात्मा निराकारः सर्वव्यापी स्वभावतः ॥ ५ ॥
वेदान्तका सार तथा ज्ञान-विज्ञान इतना ही है कि मैं स्वभावसे ही सर्वव्यापी निराकार आत्मा (ब्रह्मतत्त्व) हूँ॥ ५॥

यो वै सर्वात्मको देवो निष्कलो गगनोपमः।
स्वभावनिर्मलः शुद्धः स एवाहं न संशयः ॥ ६॥
जो सर्वरूप परमात्मा हैं, वे निश्चय ही अखण्ड, आकाशतुल्य, स्वभावसे निर्मल तथा शुद्ध हैं। मैं वही [चेतन ब्रह्म] हूँ; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ६ ॥

अहमेवाव्ययोऽनन्तः शुद्धविज्ञानविग्रहः।
सुखं दुःखं न जानामि कथं कस्यापि वर्तते ॥ ७ ॥
मैं निश्चय ही नाशरहित, अनन्त तथा शुद्ध विज्ञानस्वरूप हूँ। मैं नहीं जानता कि यह सुख-दुःख किसीको भी किस प्रकार हो सकता है ॥ ७ ॥

न मानसं कर्म शुभाशुभं मे
न कायिकं कर्म शुभाशुभं मे।
न वाचिकं कर्म शुभाशुभं मे
ज्ञानामृतं शुद्धमतीन्द्रियोऽहम् ॥ ८ ॥
[कोई भी] मानसिक कर्म मेरे लिये शुभ अथवा अशुभ नहीं

५४० * गीता-संग्रह *


है, कायिक कर्म मेरे लिये शुभ अथवा अशुभ नहीं हैं और वाचिक कर्म मेरे लिये शुभ अथवा अशुभ नहीं है। मैं तो ज्ञानामृत, शुद्ध तथा इन्द्रियातीत हूँ॥८॥

मनो वै गगनाकारं मनो वै सर्वतोमुखम्। मनोऽतीतं मनः सर्वं न मनः परमार्थतः॥९॥

मन आकाशके आकारवाला है, मनकी गति सभी ओर है, मन सबसे परे है और मन ही सब कुछ है, किंतु परमार्थकी दृष्टिसे मन कुछ भी नहीं है॥९॥

अहमेकमिदं सर्वं व्योमातीतं निरन्तरम्। पश्यामि कथमात्मानं प्रत्यक्षं वा तिरोहितम्॥१०॥

मैं एक हूँ और यह दृश्यमान सर्वरूप भी मैं ही हूँ। मैं आकाशसे भी अतीत हूँ तथा असीम हूँ। मैं इस आत्माको प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष किस प्रकार देखूँ?॥१०॥

त्वमेवमेकं हि कथं न बुध्यसे समं हि सर्वेषु विमृष्टमव्ययम्। सदोदितोऽसि त्वमखण्डितः प्रभो दिवा च नक्तं च कथं हि मन्यसे॥११॥

वस्तुतः तुम एक ही हो ऐसा क्यों नहीं समझते? सम्पूर्ण शरीरोंमें तुम (आत्मारूपसे) एक समान व्याप्त हो। तुम शाश्वत तथा अव्यय हो। हे प्रभो! तुम सर्वदा प्रकाशमान हो और भेदरहित हो। [निरन्तर प्रकाशमान होनेके कारण] तुम [उदयास्तरूप] दिन तथा रातको किस प्रकार मान सकते हो?॥११॥

आत्मानं सततं विद्धि सर्वत्रैकं निरन्तरम्। अहं ध्याता परं ध्येयमखण्डं खण्ड्यते कथम्॥१२॥

[हे वत्स!] आत्मा (स्वयं)-को सर्वदा सर्वत्र एक तथा अनन्त

  • अवधूतगीता (१) * ५४१

जानो। मैं ध्यान करनेवाला हूँ तथा अन्य कोई ध्यानका विषय है— (यदि तुम ऐसा कहते हो) तो फिर उस भेदरहित आत्माको भेदयुक्त कैसे किया जा सकता है?॥ १२॥

न जातो न मृतोऽसि त्वं न ते देहः कदाचन। सर्वं ब्रह्मेति विख्यातं ब्रवीति बहुधा श्रुतिः॥ १३॥

[हे शिष्य!] वास्तवमें तुम न तो उत्पन्न होते हो और न मरते ही हो; न तो यह देह ही कभी तुम्हारा है। सम्पूर्ण जगत् ब्रह्म ही है— ऐसा प्रसिद्ध है और श्रुति भी अनेक प्रकारसे ऐसा ही कहती है॥ १३॥

स बाह्याभ्यन्तरोऽसि त्वं शिवः सर्वत्र सर्वदा। इतस्ततः कथं भ्रान्तः प्रधावसि पिशाचवत्॥ १४॥

[हे शिष्य!] [सम्पूर्ण प्राणियोंके] बाहर तथा भीतर रहनेवाला, कल्याणस्वरूप, सर्वत्र सभी कालोंमें विद्यमान जो चेतन तत्त्व है, वह तुम ही हो। [अतः उसकी प्राप्तिके लिये] भ्रमित होकर तुम [व्यर्थ ही] पिशाचकी भाँति इधर-उधर क्यों दौड़ते हो?॥ १४॥

संयोगश्च वियोगश्च वर्तते न च ते न मे। न त्वं नाहं जगन्नेदं सर्वमात्मैव केवलम्॥ १५॥

संयोग तथा वियोग न तुम्हारेमें है और न तो मुझमें ही है। [वस्तुतः] न तुम हो, न मैं हूँ और न तो यह जगत् ही है; केवल आत्मा ही सब कुछ है॥ १५॥

शब्दादिपञ्चकस्यास्य नैवासि त्वं न ते पुनः। त्वमेव परमं तत्त्वमतः किं परितप्यसे॥ १६॥

शब्द आदि (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध) पाँच विषयोंके साथ तुम्हारा सम्बन्ध नहीं है और तुम्हारे साथ इनका भी सम्बन्ध नहीं है। तुम ही परमतत्त्व हो, अतः तुम क्यों सन्तप्त होते हो?॥ १६॥

५४२ * गीता-संग्रह *


जन्म मृत्युर्न ते चित्तं बन्धमोक्षौ शुभाशुभौ।
कथं रोदिषि रे वत्स नामरूपं न ते न मे॥ १७॥
जन्म-मृत्यु, बन्धन-मोक्ष और शुभ-अशुभ—ये तुम्हारे नहीं हैं, ये चित्तके धर्म हैं, हे वत्स! तुम क्यों रोते हो; ये नाम तथा रूप तुम्हारे भी नहीं हैं और मेरे भी नहीं हैं॥ १७॥

अहो चित्त कथं भ्रान्तः प्रधावसि पिशाचवत्।
अभिन्नं पश्य चात्मानं रागत्यागात्सुखी भव॥ १८॥
हे चित्त! तुम भ्रमित होकर पिशाचकी भाँति क्यों दौड़ रहे हो? तुम आत्माको भेदरहित देखो और रागका त्याग करके सुखी हो जाओ॥ १८॥

त्वमेव तत्त्वं हि विकारवर्जितं
निष्कम्पमेकं हि विमोक्षविग्रहम्।
न ते च रागो ह्यथवा विरागः
कथं हि सन्तप्यसि कामकामतः॥ १९॥
तुम वास्तवमें विकारहीन, निश्चल तथा मोक्षस्वरूप [परम] तत्त्व हो। तुम्हें राग अथवा विराग भी नहीं है; तब तुम विषय-भोगोंकी कामनासे सन्तप्त क्यों होते हो?॥ १९॥

वदन्ति श्रुतयः सर्वा निर्गुणं शुद्धमव्ययम्।
अशरीरं समं तत्त्वं तन्मां विद्धि न संशयः॥ २०॥
सभी श्रुतियाँ परमतत्त्वको निर्गुण, शुद्ध, नाशरहित, शरीररहित और सबमें समरूप कहती हैं; उसे ही तुम आत्मस्वरूप जानो, इसमें सन्देह नहीं है॥ २०॥

साकारमनृतं विद्धि निराकारं निरन्तरम्।
एतत्तत्त्वोपदेशेन न पुनर्भवसम्भवः॥ २१॥
साकार (पदार्थों)-को मिथ्या जानो और निराकारको शाश्वत समझो। इस तत्त्वोपदेशको धारण करनेसे [इस संसारमें] पुनर्जन्म नहीं होता है॥ २१॥