गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ६८ नयननिको फल लेत निरखि खग, मृग, सुरभी, ब्रजबधू, अहीर। तुलसी प्रभुहि देत सब आसन निज निज मन मृदु कमल कुटीर ॥ ५ ॥ मुनिवर विश्वामित्रके साथ दोनों भाई शोभायमान हैं। वे सिरपर काकपच्छ (जुल्फें), हाथोंमें धनुष-बाण तथा कमरमें सुन्दर पीताम्बर और तरकस धारण किये हुए हैं ॥ १ ॥ उनका मुख चन्द्रमाके समान, नेत्र कमलपुष्पवत् तथा शोभाके धाम श्याम-गौर शरीर हैं। उनकी अतुल छवि देखकर विश्वामित्रजी पुलकित होते हैं और उनके हृदयमें प्रेमकी उमंग नहीं समाती ॥ २ ॥ वे मार्गमें तरह- तरहके कौतुक करते खेलते चलते हैं तथा नदियों और सरोवरोंके तटपर लता, पुष्प और कमलोंको तोड़ते एवं उनका अमृतके समान शीतल जल पान करते हुए देरतक ठहरते हैं ॥ ३ ॥ वृक्षोंके नीचे स्वच्छ शिलाओंपर बैठ-बैठकर वे बारम्बार वहाँकी छाया और वायुकी प्रशंसा करते हैं। उन्हें देखकर मयूर नाचने लगते हैं एवं भ्रमर तथा कोयल और शुक आदिपक्षी बड़े सुन्दर ढंगसे गाने लगते हैं ॥ ४ ॥ प्रभुको देख-देखकर मृग, पक्षी, गौएँ, ग्वालिनी और ग्वाले अपने नेत्रोंका फल पाते हैं। तुलसीदासजी कहते हैं, सभी लोग अपने मनरूप कोमल कमलकी कुटियामें प्रभुको आसन देते हैं ॥ ५ ॥ राग कान्हरा [ ५५ ] सोहत मग मुनि सँग दोउ भाई। तरुन तमाल चारु चंपक-छबि कबि-सुभाय कहि जाई ॥ १ ॥