गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४ बालकाण्ड
भूषन बसन अनुहरत अंगनि, उमगति सुन्दरताई। बदन मनोज सरोज लोचननि रही है लुभाइ लुनाई ॥ २ ॥ अंसनि धनु, सर कर-कमलनि, कटि ससे हैं निखंग बनाई। सकल भुवन सोभा सरबसु लघु लागति निरसि निकाई ॥ ३ ॥ महि मृदु पथ, घन छाँह, सुमन सुर बरष, पवन सुखदाई। जल-थल-रुह फल, फूल, सलिल सब करत प्रेम पहुनाई ॥ ४ ॥ सकुच सभीत बिनीत साथ गुरु बालनि-चलनि सुहाई। खग-मृग-चित्र बिलोकत बिंच बिच, लसति ललित लरिकाई ॥ ५ ॥ बिद्या दई जानि बिद्यानिधि, बिद्यहु लही बड़ाई। ख्याल दली ताड़का, देखि ऋषि देत असीस अघाई ॥ ६ ॥ बूझत प्रभु सुरसरि-प्रसंग कहि निज कुल कथा सुनाई। गाधिसुवन-सनेह-सुख-संपति उर-आश्रम न समाई ॥ ७ ॥ बनबासी बटु, जती, जोगि-जन साधु सिद्ध-समुदाई। पूजत पेखि प्रीति पुलकत तनु, नयन लाभ लुटि पाई ॥ ८ ॥ मख राख्यो खलदल दलि भुजबल, बाजत बिबुध बधाई। नित पथ-चरित-सहित तुलसी-चित बसत लखन रघुराई ॥ ६ ॥ मार्गमें विश्वामित्रजीके साथ दोनों भाई शोभायमान हैं। कवि- स्वभावसे उनके अङ्गोंके लिये तरुण तमाल तथा मनोहर चम्पक वृक्षकी उपमा कही जाती है [निकल पड़ती है] ॥ १॥ भगवान्के वस्त्र और आभूषण उनके अङ्गोंके अनुरूप ही हैं, जिनसे सुन्दरता उमड़ पड़ती है, मानो उनके मुखमण्डलमें कामदेवकी तथा नेत्रोंमें कमलकी सुन्दरता लुभाकर रह गयी है ॥ २ ॥ उनके कन्धोंपर धनुष, करकमलोंमें बाण और कमरमें भलीभाँतिसे तरकस कसा हुआ है। भगवान् की सुन्दरताको देखकर चौदहों भुवनोंकी सारी