गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 106, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ेंगीतावली १०० शोभा तुच्छ जान पड़ती है ॥ ३ ॥ पृथ्वी सुकोमल मार्ग देती है, बादल छाया कर रहे हैं, देवतालोग फूलोंकी वर्षा करते हैं तथा वायु सुखदायक हो रहा है। इस प्रकार जल एवं स्थलमें उत्पन्न होनेवाले फल, फूल और जल आदि सभी प्रेमपूर्वक भगवान्की पहुनाई कर रहे हैं ॥ ४ ॥ गुरुजीके साथ भगवान्का संकोच, भय और विनयके सहित बोलना एवं चलना-फिरना बड़ा सुन्दर जान पड़ता है। बीच- बीचमें जब चित्र-विचित्र पक्षी और मृगों को देखते हैं तो उनका मनोहर बाल-चापल्य सुहावना जान पड़ता है ॥ ५ ॥ तदनन्तर गुरुजीने भगवान्को विद्यानिधि जानकर भी विद्या दी और विद्याने भी उन्हें प्राप्तकर बड़ाई पायी। उन्होंने खेलमे ही ताड़काको मार डाला, जिसे देख ऋषिने भगवान्को जी खोलकर आशीर्वाद दिया ॥ ६ ॥ भगवान्ने गङ्गावतरणका प्रसंग पूछा तो ऋषिने उसके साथ ही उनके कुलकी कथा भी कह सुनायी। इस समय विश्वामित्रजीके स्नेह और आनन्दकी सम्पत्ति उनके हृदयरूप आश्रममें नहीं समाती थी ॥ ७ ॥ वनमें रहनेवाले ब्रह्मचारी, सन्यासी, योगिजन, साधु और सिद्धसमूह प्रभुको देखकर प्रीतिसे पुलकितशरीर हो नेत्रोंके लाभकी लूट पाकर उनकी पूजा करते थे ॥ ८ ॥ भगवान्ने अपने भुजबलसे दुष्टोंका दमन कर यज्ञकी रक्षा की है, यह जानकर देवताओंमें बधाई बजने लगी। तुलसीदासजी कहते हैं, हमारे चित्तमें तो मार्गके चरित्रोंके सहित श्रीराम और लक्ष्मण सर्वदा निवास करते हैं ॥ ९ ॥ [ ५६ ] मंजुल मंगलमय नृप-ढोटा। मुनि, मुनितिय, मुनिसिसु विलोकि कहें मधुर मनोहर जोटा ॥ १ ॥