गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 109, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ें१०३ बालकाण्ड मानो कृपारूप अमृतसे सींची जाकर पुनः सुखरूप फलीसे सम्पन्न हो गयी ॥ २ ॥ वेदोंके लिये भी अगम जिस मूर्तिको भगवान् शंकरकी बुद्धिरूपा युवतीने अन्य भगवन्मूर्तियोंको त्याग कर वरण किया है, उसीको नेत्रपथमें आयी हुई देख वह (अहल्या) एकटक होकर उससे विचलित न हुई ॥ ३ ॥ वह प्रेम और आनन्दसे भरकर मन-ही-मन उनके रूप, शील और गुणोंका बखान करने लगी। तुलसीदास कहते हैं, इसी प्रकार प्रभुने किस दीनकी दीनता नहीं हरी ॥ ४ ॥ [ ५८ ] परत पद-पंकज ऋषि-रवनी । भई है प्रगट अति दिब्य देह धरि मानो त्रिभुवन-छबि-छवनी ॥ १ ॥ देखि बड़ो आचरज, पुलकि तनु कहति मुदित मुनि-भवनी । जो चलिहैं रघुनाथ पयादेहि, सिला न रहिहि अवनी ॥ २ ॥ परसि जो पाँय पुनीत सुरसरी सोहै तीनि-गवनी । तुलसिदास तेहि चरन-रेनुकी महिमा कहै मति कवनी ॥ ३ ॥ प्रभुके चरणकमल पड़ते ही मुनिपत्नी अहल्या अत्यन्त दिव्य देह धारणकर प्रकट हो गयी है, मानो तीनों लोकोंकी छविकी पुत्री ही हो ॥ १ ॥ यह परम आश्चर्य देखकर मुनिपत्नियाँ प्रसन्न होकर कहने लगीं कि यदि रघुनाथजी पैदल चलेंगे तो पृथ्वीतलपर शिला नहीं रहने पावेंगी ॥ २ ॥ जिन चरणोंका स्पर्श करके पवित्र हुई गङ्गाजी त्रिपथगामिनी होकर सुशोभित हो रही हैं, तुलसीदासजी कहते हैं, ऐसी कौन-सी बुद्धि है जो उनकी महिमाका वर्णन कर सके ? ॥ ३ ॥