गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली १०२ ही सिरपर मयूरपिच्छ तथा पुष्पदलके आभूषण बनाये हैं तथा शरीरमें लगी हुई खेल-कूदकी चिह्नस्वरूप रज तथा कीच मानो [मुनिजनसे] चुराकर किये हुए इनके बालचरित्रोंको प्रकट करती है ॥ ५ ॥ विश्वामित्रजीने यज्ञरक्षाके लिये दशरथजीसे माँगकर अपने आश्रमपर लाये हुए अपने प्राणप्रिय पाहुनोंको प्रेमपूर्वक पूजकर सम्मानित किया ॥ ६ ॥ ये साधक और सिद्धजनोंके साधनोंके फल हैं, सभीके नेत्रोंको सफल करनेवाले हैं, माता-पिताके सम्पूर्ण सुकृतोंके फल हैं तथा तुलसीदासके जीवनधन हैं ॥ ७ ॥ अहल्योद्धार राग सूहो [ ५७ ] रामपद पदुम-पराग परी । ऋषितिय तुरत त्यागि पाहन-तनु छबिमय देह धरी ॥ १ ॥ प्रबल पाप पति-साप दुसह दव दारुन जरनि जरी । कृपासुधा सिंचि बिबुध-बेलि ज्यों फिरि सुख-फरनि फरी ॥ २ ॥ निगम-अगम मूरति महेस-मति-जुबति बराय बरी । सोइ मूरति भइ जानि नयनपथ इकटकतें न टरी ॥ ३ ॥ बरकति हृदय सरूप, सील, गुन प्रेम-प्रमोद-भरी । तुलसिदास अस केहि आरतकी आरति प्रभु न हरी ? ॥ ४ ॥ ऋषिपत्नी अहल्याके सिरपर जैसे ही भगवान् रामके चरण- कमलोंका पराग पड़ा, वैसे ही उसने पत्थरका शरीर त्याग कर अति छबिमय शरीर धारण कर लिया ॥ १ ॥ अपने प्रबल पापके कारण पतिके शापरूप दुःसह अग्निके कठोर तापसे जलती हुई कल्पलता