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गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

गीतावली १०२ ही सिरपर मयूरपिच्छ तथा पुष्पदलके आभूषण बनाये हैं तथा शरीरमें लगी हुई खेल-कूदकी चिह्नस्वरूप रज तथा कीच मानो [मुनिजनसे] चुराकर किये हुए इनके बालचरित्रोंको प्रकट करती है ॥ ५ ॥ विश्वामित्रजीने यज्ञरक्षाके लिये दशरथजीसे माँगकर अपने आश्रमपर लाये हुए अपने प्राणप्रिय पाहुनोंको प्रेमपूर्वक पूजकर सम्मानित किया ॥ ६ ॥ ये साधक और सिद्धजनोंके साधनोंके फल हैं, सभीके नेत्रोंको सफल करनेवाले हैं, माता-पिताके सम्पूर्ण सुकृतोंके फल हैं तथा तुलसीदासके जीवनधन हैं ॥ ७ ॥ अहल्‍योद्धार राग सूहो [ ५७ ] रामपद पदुम-पराग परी । ऋषितिय तुरत त्यागि पाहन-तनु छबिमय देह धरी ॥ १ ॥ प्रबल पाप पति-साप दुसह दव दारुन जरनि जरी । कृपासुधा सिंचि बिबुध-बेलि ज्यों फिरि सुख-फरनि फरी ॥ २ ॥ निगम-अगम मूरति महेस-मति-जुबति बराय बरी । सोइ मूरति भइ जानि नयनपथ इकटकतें न टरी ॥ ३ ॥ बरकति हृदय सरूप, सील, गुन प्रेम-प्रमोद-भरी । तुलसिदास अस केहि आरतकी आरति प्रभु न हरी ? ॥ ४ ॥ ऋषिपत्नी अहल्याके सिरपर जैसे ही भगवान् रामके चरण- कमलोंका पराग पड़ा, वैसे ही उसने पत्थरका शरीर त्याग कर अति छबिमय शरीर धारण कर लिया ॥ १ ॥ अपने प्रबल पापके कारण पतिके शापरूप दुःसह अग्निके कठोर तापसे जलती हुई कल्पलता

१०३ बालकाण्ड मानो कृपारूप अमृतसे सींची जाकर पुनः सुखरूप फलीसे सम्पन्न हो गयी ॥ २ ॥ वेदोंके लिये भी अगम जिस मूर्तिको भगवान् शंकरकी बुद्धिरूपा युवतीने अन्य भगवन्मूर्तियोंको त्याग कर वरण किया है, उसीको नेत्रपथमें आयी हुई देख वह (अहल्या) एकटक होकर उससे विचलित न हुई ॥ ३ ॥ वह प्रेम और आनन्दसे भरकर मन-ही-मन उनके रूप, शील और गुणोंका बखान करने लगी। तुलसीदास कहते हैं, इसी प्रकार प्रभुने किस दीनकी दीनता नहीं हरी ॥ ४ ॥ [ ५८ ] परत पद-पंकज ऋषि-रवनी । भई है प्रगट अति दिब्य देह धरि मानो त्रिभुवन-छबि-छवनी ॥ १ ॥ देखि बड़ो आचरज, पुलकि तनु कहति मुदित मुनि-भवनी । जो चलिहैं रघुनाथ पयादेहि, सिला न रहिहि अवनी ॥ २ ॥ परसि जो पाँय पुनीत सुरसरी सोहै तीनि-गवनी । तुलसिदास तेहि चरन-रेनुकी महिमा कहै मति कवनी ॥ ३ ॥ प्रभुके चरणकमल पड़ते ही मुनिपत्नी अहल्या अत्यन्त दिव्य देह धारणकर प्रकट हो गयी है, मानो तीनों लोकोंकी छविकी पुत्री ही हो ॥ १ ॥ यह परम आश्चर्य देखकर मुनिपत्नियाँ प्रसन्न होकर कहने लगीं कि यदि रघुनाथजी पैदल चलेंगे तो पृथ्वीतलपर शिला नहीं रहने पावेंगी ॥ २ ॥ जिन चरणोंका स्पर्श करके पवित्र हुई गङ्गाजी त्रिपथगामिनी होकर सुशोभित हो रही हैं, तुलसीदासजी कहते हैं, ऐसी कौन-सी बुद्धि है जो उनकी महिमाका वर्णन कर सके ? ॥ ३ ॥

गीतावली १०४ [ ५९ ] मूरिभाग-भाजनु भई । रूपरासि अवलोकि बंधु दोउ प्रेम-सुरंग रई ॥ १ ॥ कहा कहैं, केहि भाँति सराहँै, नहि करतूति नई । बिनु कारन करुनाकर रघुबर केहि-केहि गति न दई ? ॥ २ ॥ करि बहु बिनय, राखि उर मूरति मंगल-मोदमई । तुलसी ह्वै बिसोक पतिलोकहि प्रभुगुन गनत गई ॥ ३ ॥ आज अहल्या परम सौभाग्यशालिनी हुई है। वह रूपकी राशि दोनों भाइयोंको देखकर प्रेमके रँगमें रँग गयी है ॥ १ ॥ कहिये, कवि किस प्रकार वर्णन करे, किस प्रकार उनकी सराहना करे ? उनकी यह करतूत कुछ नयी भी नहीं है। बिना कारण ही कृपा करनेवाले रघुनाथजीने भला किस-किसको शुभ गति नहीं दी ? ॥ २ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, इसी प्रकार बहुत-सी विनय कर और प्रभुकी मङ्गल तथा आनन्दमयी मूर्तिको हृदयमें धारण कर शोकहीन हो वह प्रभुका गुणगान करती पतिलोक- को चली गयी ॥ ३ ॥ राग कान्हरा [ ६० ] कौसिकके मखके रखवारे । नाम राम अरु लखन ललित अति, दसरथ-राज-दुलारे ॥ १ ॥ मेचक पीत कमल कोमल कल काकपच्छ-धर बारे । सोभा सकल सकेलि मदन-बिधि सुकर सरोज सँवारे ॥ २ ॥ सहस समूह सुबाहु सरिस खल समर सूर भट भारे । केलि-तून-धनु-बान-पानि रन निदरि निसाचर मारे ॥ ३ ॥

१०५ बालकाण्ड ऋषितिय तारि स्वयंबर पेखन जनकनगर पगु धारे। मग नर-नारि निहारत सादर, कहैं बड़ भाग हमारे ॥ ४ ॥ तुलसी सुनत एक-एकनि सों चलत बिलोकनिहारे। मूकनि बचन-लाहु, मानो अंधनि लहे हैं बिलोचन-तारे ॥ ५ ॥ [मार्गमें जाते समय पथिक जन कहते हैं—] ये दोनों विश्वामित्रजीके यज्ञकी रक्षा करनेवाले हैं। इनके अति सुन्दर राम और लक्ष्मण नाम हैं तथा ये महाराज दशरथके प्रिय पुत्र हैं ॥ १ ॥ ये काकपक्ष धारण किये हुए अति कोमल और सुन्दर श्याम एवं पीतवर्ण कमलके समान जान पड़ते हैं, मानो कामदेवरूप विधाताने सारी शोभाको एकत्रित कर इन्हें स्वयं अपने ही करकमलोंसे रचा हो ॥ २ ॥ इन्होंने युद्धमें सुबाहुके समान सहस्रों दुष्ट, समरशूर और भारी राक्षसयोद्धाओंका तिरस्कार कर उन्हें हाथमें खेलके ही धनुष-बाण लेकर खेलका ही तरकस धारण कर मार डाला है ॥ ३ ॥ अब ये मुनिपत्नीका उद्धार कर स्वयंवर देखनेके लिये जनकपुरीको जा रहे हैं। मार्गमें 'हमारे बड़े भाग्य हैं' ऐसा कहकर सब स्त्री-पुरुष आदरपूर्वक इन्हें निहारते हैं ॥ ४ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, इस समाचारको एक-एकसे सुनकर अन्य दर्शकलोग भी चलते हैं, मानो मूक पुरुषोंको वाणी प्राप्त हो जाती है तथा अन्धोंको नेत्रोंके तारे मिल जाते हैं ॥ ५ ॥ जनकपुर-प्रवेश राग तोड़ी [ ६१ ] आये सुनि कौसिक जनक हरषाने हैं। बोलि पुर भूसुर, समाज सों मिलन चले, जानि बड़े भाग अनुराग अकुलाने हैं ॥ १ ॥

गीतावली १०६ नाइ सीस पगनि, असीस पाइ प्रमुदित, पाँवड़े अरघ देत आदर सों आने हैं। ससन, बसन, वासकै सुपास सब बिधि, पूजि प्रिय पाहुने, सुभाय सनमाने हैं ॥ २ ॥ बिनय बढ़ाई ऋषि-राऊ परस्पर करत पुलकि प्रेम आनँद अघाने हैं। देखे राम-लखन निमेषै बिथकित भईं प्रानहु ते प्यारे लागे बिनु पहिचाने हैं ॥ ३ ॥ ब्रह्मानंद हृदय, दरस-सुख लोयननि अनभये उभय, सरस राम जाने हैं। तुलसी बिदेहकी सनेहकी दसा सुमिरि, मेरे मन माने राउ निपट सयाने हैं ॥ ४ ॥ मुनिवर विश्वामित्रजी आये हैं—यह जानकर जनकजी बड़े प्रसन्न हुए और गुरुजी तथा ब्राह्मणोंको बुलाकर समाजसहित उनसे मिलने- के लिये चले। इस समय उन्होंने अपने बड़े भाग्य जाने और वे अनुरागसे विह्वल हो गये ॥ १ ॥ जनकजी विश्वामित्रजीके चरणों सिर नवा, उनसे आशीर्वाद पा, उन्हें प्रसन्न-चित्तसे पाँवड़े तथा अर्घ्यदान देकर आदरपूर्वक ले आये तथा भोजन, वस्त्र और निवासस्थानका सुभीता कर, अपने प्रिय पाहुनोंको सब प्रकार पूज स्वभावसे ही सत्कार किया ॥ २ ॥ ऋषि और महाराज जनक आपसमें विनय और बड़ाई करते हैं। [अर्थात् जनकजी मुनिवरके प्रति विनीत होते हैं तथा मुनि महाराजकी बड़ाई करते हैं।] इस प्रकार प्रेमसे पुलकित हो वे आनन्दमें मग्न हो रहे हैं। राम-लक्ष्मणको देखकर वे पलक मारना भूल गये। बिना पहचाने हुए भी उन्हें वे दोनों भाई

१०७ बालकाण्ड प्राणोंसे भो प्रिय जान पड़े ॥ ३ ॥ हृदयसे ब्रह्मानन्दका तथा नेत्रोंसे दर्शनके आनन्दका अनुभव कर महाराज जनकने रामरूपको ही अधिक सरस जाना है [अर्थात् दर्शनसुखको ही विशेष समझा है] । तुलसीदासजी कहते हैं, विदेहके स्नेहकी दशा स्मरण कर मेरे मनको तो यही जान पड़ता है कि महाराज बड़े ही चतुर हैं ॥ ४ ॥ राग मलार [ ६२ ] कोसलरायके कुअँरोटा । राजत रुचिर जनक-पुर पैंठत स्याम गैर नीके जोटा ॥ १ ॥ चौतनि सिरनि, कनककली काननि, कटि पट पीत सोहाये । उर-मनि-माल, बिसाल बिलोचन, सीय-स्वयंबर आये ॥ २ ॥ बरनि न जात, मनहिं मन भावत, सुभग अबहिं बय थोरी । भई हैं मगन बिधुबदन बिलोकत बनिता चतुर चकोरी ॥ ३ ॥ कहँ सिवचाप, लरिकवनि बूझत, बिहँसि चितै तिरछौंहैं । तुलसी गलिन भीर, दरसन लगि लोग अटनि आरोहैं ॥ ४ ॥ जनकपुरमें प्रवेश करते समय कोसलराजकुमारोंकी अति सुन्दर गौर-श्याम जोड़ी बड़ी ही मनोहर जान पड़ती है ॥ १ ॥ दोनों बालकोंके सिरपर चौतनी टोपी, कानोंमें सुवर्णकली, कमरमें पीताम्बर और हृदयपर मणियोंकी माला शोभायमान है। उनके नेत्र बड़े विशाल हैं। इस प्रकार वे सीताजीके स्वयंवरमें पधारे ॥ २ ॥ उस जोड़ीका वर्णन नहीं होता, वह मन-ही-मन बड़ी भली जान पड़ती है। अभी अवस्था भी बहुत थोड़ी है। उनके मुखचन्द्रको निहारकर चतुर चकोरीरूप नगरकी नारियाँ प्रसन्न हो रही हैं ॥ ३ ॥ भगवान्

गीतावली १०८ तिरछी चितवनसे देखते हुए लड़कोंसे हँसकर पूछते हैं 'शिवजीका धनुष कहाँ है ?' तुलसीदासजी कहते हैं, गलियोंमें भीड़ हुई देखकर लोग प्रभुका दर्शन करनेके लिये अटारियोंपर चढ़े हुए हैं ॥ ४ ॥ [ ६३ ] ये अवधेसके सुत दोऊ । चढ़ि मंदिरनि बिलोकत सादर जनकनगर सब कोऊ ॥ १ ॥ स्याम गौर सुंदर किसोर तनु, तून-बान-धनुधारी । कटि पट पीत, कंठ मुकुतामनि, भुज बिसाल, बल भारी ॥ २ ॥ मुख मयंक, सरसीरुह लोचन, तिलक भाल, टेढ़ी भौंहें । कल कुंडल, चौतनी चारु अति, चलत मत्त-गज-गौंहें ॥ ३ ॥ बिस्वामित्र हेतु पठये नृप, इन्हिं ताडुका मारी । मख राख्यो रिपु जीति, जान जग, मग मुनिबधू उधारी ॥ ४ ॥ प्रिय पाहुने जानि नर-नारिन नयननि अयन दये । तुलसीदास प्रभु देखि लोग सब जनक समान भये ॥ ५ ॥ जनकपुरीके सभी लोग अपने घरोंपर चढ़कर आदरपूर्वक देखते हैं और कहते हैं कि ये दोनों अवधपति महाराज दशरथके पुत्र हैं ॥ १ ॥ इनका अति सुन्दर श्याम-गौर शरीर है, किशोर अवस्था है तथा ये धनुष-बाण एवं तरकस धारण किये हुए हैं । इनकी कमरमें पीताम्बर है। कण्ठमें मोती और मणियोंकी माला है तथा इनकी विशाल भुजाएँ अत्यन्त बलशालिनी हैं ॥ २ ॥ इनका मुख चन्द्रमाके समान है, नेत्र कमलसदृश हैं, माथेपर तिलक शोभायमान है तथा तिरछी भौंहें हैं। इनके कानोंमें मनोहर कुण्डल और सिरपर अति सुन्दर चौतनी टोपी है । ये मत्त गजराजकी गतिसे चल रहे हैं ॥ ३ ॥ महाराजने इन्हें विश्वामित्रजीकी यज्ञरक्षाके लिये भेजा था।

१०६ बालकाण्ड इन्होंने ताड़काको मारा है तथा शत्रुको जीतकर यज्ञकी रक्षा की है। इस बातको भी संसार जानता है कि इन्होंने मार्गमें मुनिपत्नीका उद्धार किया है॥ ४॥ प्रिय पाहुने जानकर नगरके सभी नर- नारियोंने प्रभुको अपने नेत्रोंमें स्थान दिया। तुलसीदासजी कहते हैं—प्रभुको देखकर सभी लोग जनकके समान [ विदेह ] हो गये [अर्थात् अपनी देहकी दशा भूल गये] ॥ ५ ॥ राग तोड़ी [ ६४ ] बूझत जनक 'नाथ' ढोटा दोउ काके हैं ? तरुन तमाल चारु चंपक-बरन तनु कौन बड़े भागीके सुकृत परिपाके हैं ॥ १ ॥ सुखके निधान पाये, हियके पिधान लाये, ठगके-से लाडू खायें, प्रेम-मधु छाके हैं। स्वारथ-रहित परमारथी कहावत हैं, भे सनेह-बिबस बिदेहता बिबाके हैं ॥ २ ॥ सील-सुधाके अगार, सुखमाके पारावार, पावत न पैरि पार पैरि पैरि थाके हैं। लोचन ललकि लागे, मन अति अनुरागे, एक रसरूप चित सकल सभाके हैं ॥ ३ ॥ जिय जिय जोरत सगाई राम लखनसों आपने आपने भाय जैसे भाय जाके हैं। प्रीतिको, प्रतीको, सुमिरिबेको, सेइबेको, सरनको समरथ तुलसिहु ताके हैं ॥ ४ ॥ जनकजी पूछने लगे—हे नाथ ! ये दोनों बालक किसके

गीतावली ११० हैं ? इनके शरीर तरुण, तमाल और मनोहर चम्पक-पुष्पके समान श्याम और गौर-वर्ण हैं। अहा ! ये किस बड़भागीके पुण्यकर्म फलित हुए हैं ॥ १ ॥ जनकजीने सुखके निधान प्रभुको पाकर उन्हें हृदयमें ले जाकर पट लगा दिये और ठगके-से लड्डू खाकर प्रेमकी मदिरासे छक गये । जनकजी स्वार्थहीन तथा परमार्थपरायण कहलाते थे; किन्तु इस समय वे स्नेहवश होकर विदेहताको भूल गये ॥ २ ॥ प्रभु शीलरूप अमृतके आगार और शोभाके समुद्र हैं । जनकजी उसमें तैर तैरकर हार गये, फिर भी उन्हें उसका पार नहीं मिला। सम्पूर्ण सभाके नेत्र उतावले होकर प्रभुमें लग गये, मन अत्यन्त अनुरक्त हो गये तथा चित्त एकरसरूप हो गये ॥ ३ ॥ अपने-अपने भावके अनुसार जैसा जिसका भाव था, वह उसी प्रकार मन-ही-मन राम और लक्ष्मणसे सम्बन्ध जोड़ने लगा । जो प्रभु प्रीति, प्रतीति, स्मरण, सेवन और शरण ग्रहण करने योग्य हैं उनका आश्रय तुलसीदासजीने भी ताका है ॥ ४ ॥ [ ६५ ] ए कौन कहाँतें आए ? नील-पीत-पाथोज-बरन, मन-हरन, सुभाय सुहाए ॥ १ ॥ मुनिसुत किधौं भूप-बालक, किधौं ब्रह्म-जीव जग जाए । रूप-जलधिके रतन, सुछबि-तिय-लोचन ललित ललाए ॥ २ ॥ किधौं रबि-सुवन, मदन-ऋतुपति, किधौं हरि-हर बेष बनाए । किधौं आपने सुकृत-सुरतरुके सुफल रावरेहि पाए ॥ ३ ॥ भए बिदेह बिदेह नेहबस देहदसा बिसराए । पुलक गात, न समान हरष हिय, सलिल सुलोचन छाए ॥ ४ ॥ जनक-बचन मृदु मंजु मधु-भरे भगति कौसिकहि भाए । तुलसी अति आनंद उमगि उर राम लखन गुन गाए ॥ ५ ॥

१११ बालकाण्ड [महाराज जनक पूछते हैं—] ये कौन हैं और कहांसे आये हैं? ये नीले और पीले कमलके समान श्याम एवं गौर-वर्ण, अत्यन्त मनमोहन और स्वभावसे ही शोभायमान हैं ॥ १ ॥ ये बालक कोई मुनिपुत्र हैं या राजकुमार अथवा परब्रह्म और जीव (हिरण्यगर्भ) ही जगत्‌में उत्पन्न हो गये हैं। ये दोनों लालन रूपसमुद्रके रत्न अथवा छबिरूप रमणीके सुललित लोचन तो नहीं हैं? ॥ २ ॥ अथवा ये दोनों अश्विनीकुमार, कामदेव और ऋतुराज बसन्त अथवा श्रीविष्णु और महादेव ही [मनुष्यका] वेष धरकर आ गये हैं? अथवा आपने अपने सुकृतरूप कल्पतरुके सुन्दर फल ही पा लिये हैं? ॥ ३ ॥ ऐसा कहकर जनकजी स्नेहवश विदेह हो गये। अपने शरीर- की सुधि भूल गये। उनका शरीर पुलकित हो गया, हृदयमें आनन्द नहीं अँटता था तथा नेत्रोंमें जल छा गया ॥ ४ ॥ जनकजीके मृदुल, मनोहर और भक्तिरस भरे सुमधुर वचन विश्वामित्रजीको बड़े ही प्रिय लगे। तुलसीदासजी कहते हैं, तब विश्वामित्रजीने हृदयमें आनन्दसे अत्यन्त उमगकर राम-लक्ष्मणके गुण गाये ॥ ५ ॥ [ ६६ ] कौसिक कृपालहूको पुलकित तनु भौ। उमगत अनुराग, सभाके सराहे भाग, देखि दसा जनककी कहिबेको मनु भौ ॥ १ ॥ प्रीतिके न पातकी, दियेहू साप पाप बड़ो, मख-मिस मेरो तब अवध-गवनु भौ। प्रानहूते प्यारे सुत माँगे दिये दसरथ, सत्यसिंधु सोच सहे, सूनो सो भवनु भौ ॥ २ ॥

गीतावली ११२ काकसिखा सिर, कर केलि-तून-धनु-सर, बालक-बिनोद जातुधाननिसों रनु भो। बूझत बिदेह अनुराग-आचरज-बस, ऋषिराज जाग भयो, महाराज अनु भो ॥ ३ ॥ भूमिदेव, नरदेव, सचिव परस्पर कहत, हमहिं सुरतरु सिवधनु भो। सुनत राजाकी रीति, उपजी प्रतीति-प्रीति, भाग तुलसीके, भले साहेबको जनु भो ॥ ४ ॥ [जनकजीके ये वचन सुनकर] परम कृपालु विश्वामित्रजीका शरीर भी पुलकित हो गया। उनके हृदयमें अनुराग उमँगने लगा। उन्होंने सभाके भाग्यकी सराहना की। जनकजीकी दशा देखकर उनका चित्त कहनेके लिये प्रवृत्त हुआ ॥ १ ॥ [ वे कहने लगे— 'राक्षस लोग मेरे यज्ञमें विघ्न डालते थे, मैंने सोचा ] ये पापी हैं, इनसे प्रीति करना तो उचित नहीं और शाप देनेमें भी बड़ा पाप लगता है, अतः यज्ञरक्षाके मिषसे ही मेरा अयोध्यापुरीमें जाना हुआ। मैंने दशरथजीसे उनके प्राणोंसे भी प्यारे पुत्र माँगे; सत्यसन्ध दशरथ- जीने मुझे तत्काल इन्हें दे दिया। यद्यपि [ इनमें अधिक स्नेह होनेके कारण ] उन्होंने बड़ा शोक सहा और उनका घर सूना-सा हो गया ॥ २ ॥ उस समय इनके मस्तकपर काकपक्ष, हाथमें खेलके तरकस और धनुष-बाण थे। तब बालकेलिके रूपमें ही इनका राक्षसोंसे युद्ध हुआ।' यह सुनकर जनकजी प्रेम और आश्चर्यवश पूछने लगे, 'महाराज ! तो क्या फिर आपका यज्ञ पूर्ण हो गया ?' (विश्वामित्रजीने कहा—) 'आप स्वयं अनुभव कर लीजिये' ॥ ३ ॥

११३ बालकाण्ड तब ब्राह्मणलोग, महाराज जनक और मन्त्रिगण आपसमें कहने लगे- 'हमको तो शिवजीका धनुष कल्पवृक्ष हो गया।' राजा जनककी रीति सुन तुलसीदासके मनमें भी प्रतीति और प्रीति उत्पन्न हुई। उसके बड़े भाग्य हैं कि वह ऐसे स्वामीका [ जिनके दर्शन पाकर ब्रह्मज्ञानी जनकजी भी प्रेमविभोर हो गये थे ] सेवक हुआ ॥ ४ ॥ [ ६७ ] चार्यो भले बेटा देव दसरथ रायके। जैसे राम-लषन, भरत-रिपुहन तैसे, सील-सोभा-सागर, प्रभाकर प्रभायके ॥ १ ॥ ताड़का सँहारि मख राखे, नीके पाले व्रत, कोटि कोटि भट किये एक एक घायके। एक बान बेगही उड़ाने जातुधान-जात, सूखि गये गात हैं, पतौंगा भये बायके ॥ २ ॥ सिलाछोर छुवत अहल्या भई दिव्यदेह, गुन पेखे पारसके पंकरुह पायके। रामके प्रसाद गुर गौतम खसम भये, रावरेहु सतानंद पूत भये मायके ॥ ३ ॥ प्रेम-परिहास-पोख बचन परस्पर कहत सुनत सुख सब ही सुभायके। तुलसी सराहें भाग कौसिक जनकजूके, बिधिके सुढर होत सुढर सुदायके ॥ ४ ॥ महाराज दशरथके चारों ही पुत्र बड़े सुन्दर हैं। जैसे राम- लक्ष्मण हैं वैसे ही भरत और शत्रुघ्नजी भी शील और शोभाके समुद्र तथा प्रभावके सूर्य हैं ॥ १ ॥ इन्होंने ताड़काका संहार कर मेरे यज्ञकी गी० ८-

गीतावली ११४ भलीभांति रक्षा और अपनी प्रतिज्ञाका पालन किया। इन्होंने करोड़ों शूरवीरोंको अपने एक-एक ही वारसे धराशायी कर दिया। इनके एक ही बाणके वेगसे अनेक राक्षससमूह उड़ गये। उनके शरीर सूखकर मानो हवामें उड़नेवाले पत्ते ही हो गये ॥ २ ॥ शिलाके छोरका स्पर्श करते ही अहल्या दिव्य देहमयी हो गयी। इस प्रकार इनके चरणकमलोंमें पारसकागुण देखा गया है। इस प्रकार रामचन्द्रजी की कृपासे [अहल्याका उद्धार हुआ और आपके पुरोहित शतानन्दजीके पिता] गुरु गौतमजी सपत्नीक हुए तथा शतानन्दजी अपनी माताके पुत्र हुए [अर्थात् इन्हें फिरसे अहल्या मिल गयीं] ॥ ३ ॥ इस प्रकार आपसमें प्रेम और परिहाससे पोषित वचन कहते-सुनते सबको स्वाभाविक ही सुख मिला। तुलसीदास कहते हैं कि विश्वामित्रजी महाराज जनकके सौभाग्यकी सराहना करते हैं और कहते हैं, विधाताके दायें होनेपर अच्छे दांवके पासे भी पड़ने लगते हैं ॥ ४ ॥ [ ६७ ] ये दोऊ दसरथके बारे। नाम राम घनस्याम, लखन लघु, नखसिख अँग उजियारे ॥ १ ॥ निज हित लागि मांगि आने मैं धरमसेतु-रखवारे। धीर बीर बिरुदैत, बाँकुरे महाबाहु बल भारे ॥ २ ॥ एक तीर तकि हती ताड़का, किये सुर-साधु सुखारे। जग्य राखि, जग साखि, तोषि ऋषि, निदरि निसाचर मारे ॥ ३ ॥ मुनितिय तारि स्वयंबर पेखन आये सुनि बचन तिहारे। एउ देखिहैं पिनाकु नेकु, जेहि नृपति लाज-ज्वर जारे ॥ ४ ॥ सुनि सानंद सराहि सपरिजन, बारहि बार निहारे। पूजि सप्रेम, प्रसंसि कौसिकहि भूपति सदन सिधारे ॥ ५ ॥

· ११५ बालकाण्ड सोचत सत्य-सनेह-बिबस निसि, नृपहि गनत गये तारे। पठये बोलि भोर, गुरके सँग रंगभूमि पगु धारे ॥ ६ ॥ नगर-लोग सुधि पाइ मुदित, सब ही सब काज बिसारे। मनहु मघा-जल उमगि उदधि-रुख चले नदी-नद-नारे ॥ ७ ॥ ए किसोर, धनु घोर बहुत, बिलखात बिलोकनिहारे। टरघो न चाप तिन्ह तें, जिन्ह सुभटनि कौतुक कुधर उखारे ॥ ८ ॥ ए जाने बिनु जनक जानियत करि पन भूप हँकारे। नतरु सुधासागर परिहरि कंत कूप खनावत खारे ॥ ९ ॥ सुखमा सील-सनेह सानि मनो रूप बिरंचि सँवारे। रोम-रोमपर सोम-काम सत कोटि बारि फेरि डारे ॥ १० ॥ कोउ कहै, तेज-प्रताप-पुंज चितये नहिं जात, भैया रे। छुअत सरासन-सलभ जरैगो ए दिनकर-बंस-दिया रे ॥ ११ ॥ एक कहै, कछु होउ, सुफल भये जीवन-जनम हमारे। अवलोके भरि नयन आजु तुलसीके प्रानपियारे ॥ १२ ॥ ये दोनों दशरथजीके पुत्र हैं। इनमें जो मेघके समान श्यामवर्ण हैं उनका नाम राम है और जिनके नखसे शिखतक सारे अङ्ग उज्ज्वलवर्ण हैं वे छोटे भाई लक्ष्मणजी है ॥ १ ॥ इन धर्ममर्यादा- की रक्षा करनेवालोंको मैं अपने हितके लिये माँग लाया था। ये बड़े ही धीर, वीर, यशस्वी, रणबाँकुरे, महाबाहु और बलशाली हैं ॥ २ ॥ इन्होंने एक तीर छोड़कर ही ताड़काको मार डाला और सब देवता तथा साधुजनोंको सुखी कर दिया। इस प्रकार यज्ञकी रक्षा कर मुनियोंको सन्तुष्ट किया तथा राक्षसोंका तिरस्कारपूर्वक वध किया— इस विषयमें सारा जगत् साक्षी है ॥ ३ ॥ तत्पश्चात् ऋषि-पत्नीका उद्धार कर आपकी प्रतिज्ञा सुन यहाँ स्वयंवर देखनेके लिये पधारे

गीतावली ११६ हैं। आपके जिस धनुषने राजाओंको लज्जारूप ज्वरसे सन्तप्त कर दिया है, उसे तनिक ये भी देखेंगे ॥ ४ ॥ मुनीश्वरके ये वचन सुन जनकजीने अपने कुटुम्बियोंके सहित उनकी आनन्दपूर्वक सराहना की और बारम्बार प्रभुकी ओर देखकर तथा उनकी पूजा कर, विश्वामित्रजीकी प्रशंसा करते अपने घरको चले गये ॥ ५ ॥ सत्य स्नेहवश (अपनी प्रतिज्ञाकी कठिनता देखकर) वे विचारमें पड़ गये। इस प्रकार सारी रात महाराजको तारे गिनते बीत गयी। प्रातःकाल होनेपर राजाने उन्हें बुलावा भेजा। तब प्रभुने गुरुजीके साथ रङ्ग- भूमिमें पदार्पण किया ॥ ६ ॥ भगवान्‌के पधारनेका समाचार पाकर नगरके लोग प्रसन्न हो गये और सभीने सारे काम भुला दिये, मानो मघा नक्षत्रकी जलवृष्टिसे समस्त नदी, नद और नाले उमड़कर समुद्रकी ओर चले हों ॥ ७ ॥ सभी दर्शकगण यह सोचकर कि ये तो किशोर अवस्थाके हैं और धनुष बड़ा सुदृढ़ है, दुःखी हो गये। [ उन्होंने सोचा ] यह धनुष तो उन योद्धाओंसे भी विचलित नहीं हुआ, जिन्होंने खेलहीमें बड़े-बड़े पर्वतोंको उखाड़ डाला था [ फिर इन सुकुमार बालकोंसे यह कैसे उठ सकेगा ? ] ॥ ८ ॥ मालूम होता है, महाराज जनकने इन्हें न जाननेके कारण ही इस प्रकारका प्रण करके अन्य राजाओंको बुला लिया था, नहीं तो भला अमृत-समुद्रको छोड़कर खारी कुआं कौन खुदवावेगा ? ॥ ९ ॥ ब्रह्माजीने सुन्दरता, शील और स्नेहको सानकर ही मानो इनके रूप रचे हैं। इनके रोम-रोमपर अरबों चन्द्रमा और कामदेव वारकर फेंक दिये हैं ॥१०॥ कोई कहते हैं—'भैया रे ! ये तेज और प्रतापके पुञ्ज हैं, इसीसे इनकी ओर देखा नहीं जाता। ये सूर्यवंशके दीपक हैं, इनके स्पर्श

११७ बालकाण्ड करते ही धनुषरूप पतङ्ग भस्म हो जायगा ॥११॥ अन्य लोग बोले, 'भाई ! कुछ भी हो, हमारे तो जीवन और जन्म आज सुफल हो गये, क्योंकि आज हमने नयन भरकर तुलसीदासके प्राणप्यारेका दर्शन किया है' ॥१२॥ [ ६९ ] जनक बिलोकि बार बार रघुबरको । मुनिपद सीस नाय, आयसु-असीस पाय, एई बातें कहत गवन कियो घरको ॥ १ ॥ नींद न परति राति, प्रेम-पन एक भाँति, सोचत, सकोचत बिरंचि-हरि-हरको । तुम्हते सुगम सब देव ! देखिबेको अब जस हंस किए जोगवत जुग परको ॥ २ ॥ ल्याए संग कौसिक, सुनाए कहि गुनगन, आए देखि दिनकर कुल-दिनकरको । तुलसी तेऊ सनेहको सुभाउ बाउ मानो चलदलको सो पात करै चित चरको ॥ ३ ॥ जनकजी बार-बार रघुनाथजीको देखकर, मुनिवरके चरणोंमें सर नवा, उनकी आज्ञा और आशीर्वाद पा, ये ही बातें करते अपने घरको गये ॥ १ ॥ रघुनाथजीका प्रेम ओर धनुष तोड़नेको प्रतिज्ञा—ये दोनों ही समान हैं, अतः इनके लिये उन्हें बड़ा सोच हो रहा है और रात्रिमें निद्रा भी नहीं पड़ती । [अपनी कार्यसिद्धिके लिये प्रार्थना कर] वे ब्रह्मा, विष्णु और महादेवको भी संकोचमें डालते हैं और यह कहते हुए कि 'हे देव ! तुम्हारी कृपासे सब कुछ देखना सुगम है' वे अपने सुयशको हंसरूप किये उसके [ प्रेम

गीतावली ११८ और प्राणरूप ] दोनों परोंकी सँभाल करते हैं ॥ २ ॥ इसी समय श्रीविश्वामित्रजी दोनों भाइयोंको साथ ले आये और उनके गुणगण कह सुनाये । तुलसीदास कहते हैं—सूर्यकुलके सूर्य श्रीरामचन्द्रको आया देख महाराज जनकका चित्त स्नेहकी स्वाभाविक वायुके झकोरेसे पीपलके पत्तेके समान चञ्चल हो गया ॥ ३ ॥ राग केदारा [ ७० ] रंग-भूमि भोरे ही जाइकै । राम-लषन लखि लोग लूटिहैं लोचन-लाभ आघइकै ॥ १ ॥ भूप-भवन, घर घर, पुर बाहर, इहै चरचा रही छाइकै । मगन मनोरथ-मोद नारि-नर, प्रेम-बिबस उठैं गाइकै ॥ २ ॥ सोचत बिधि-गति समुझि, परस्पर कहत बचन बिलखाइकै । कुंवर किसोर, कठोर सरासन, असमंजस भयो आइकै ॥ ३ ॥ सुकृत सँभारि, मनाइ पितर-सुर, सीस ईसपद नाइकै । रघुबर-कर धनु-भंग चहत सब अपनो-सो हितु चितु लाइकै ॥ ४ ॥ लेत भरत कनसुई सगुन सुभ, बूझत गनक बोलाइ कै । सुनि अनुकूल, मुदित मन मानहु धरत धीरजहि धाइ कै ॥ ५ ॥ कौसिक-कथा एक एकनिसों कहत प्रभाउ जनाइ कै । सीय-राम-संजोग जानियत, रच्यो बिरंचि बनाइकै ॥ ६ ॥ एक सराहि सुबाहु-मथन बर बाहु, उछाह बढ़ाइकै । सानुज राज-समाज बिराजिहैं राम पिनाक चढ़ाइकै ॥ ७ ॥ बड़ी सभा बड़ो लाभ, बड़ो जस, बड़ी बड़ाई पाइकै । को सोहिहै, औरको लायक रघुनायकहि बिहाइकै ? ॥ ८ ॥ भवनिहैं गँवाहि गवाँइ गरब गृह नृपकुल बलहि लजाइकै । भलीभाँति साहब तुलसीके चलिहैं ब्याहि बजाइकै ॥ ९ ॥

११६ बालकाण्ड 'कल प्रातःकाल होते ही रङ्गभूमिमें पहुँचकर लोग राम और लक्ष्मणको देख जी खोलकर नेत्रोंका लाभ लूटेंगे' ॥ १ ॥ महाराजके महल तथा नगरके बाहर-भीतर घर-घरमें यही चर्चा फैली हुई है। सब नर-नारी अपनी मनोरथसिद्धिसे आनन्दित हो प्रेमवश यही गाने लगते हैं ॥ २ ॥ विधाताकी गति समझकर सब लोग सोच करते हैं और आपसमें बिलखकर ऐसे वचन कहते हैं—'भाई ! बड़ा असमञ्जस आ पड़ा है, बालकोंकी तो किशोर अवस्था है और धनुष बड़ा ही कठोर है' ॥ ३ ॥ इस प्रकार सभी लोग अपने-अपने सुकृतोंका स्मरण कर, चित्तमें अपना-सा ही हित जान, पितृगण, देवता और शिव- विष्णु आदि ईश्वरोंके चरणोंमें सिर नवा रघुनाथजीके हाथसे धनुर्भंग होनेकी अभिलाषा करते हैं ॥ ४ ॥ स्त्रियां कनसुई* लेती फिरती हैं और [पुरुष] गणक (ज्योतिषी) बुलाकर शकुन पूछते हैं। उनसे अनुकूल उत्तर सुनकर वे प्रसन्न मनसे दौड़कर धैर्य धारण करते हैं ॥ ५ ॥ महाराज जनक एक-एकसे श्रीविश्वामित्रजीका प्रभाव बतलाकर उनकी कथा सुनाते हैं और कहते हैं कि जान पड़ता है, विधाताने सीता और रामका संयोग निश्चय करके रचा है ॥ ६ ॥ कोई उत्साह बढ़ाकर सुबाहुका मथन करनेवाली भगवान् रामकी भुजाओंकी सराहना कर करते हैं—'भाई ! रघुनाथजी निश्चय ही धनुष चढ़ाकर भाई लक्ष्मणसहित राजसभा में विराजमान होंगे ॥ ७ ॥ क्योंकि इस बड़ी सभामें रघुनाथजीको छोड़कर और ऐसा कौन योग्य *शकुनविचारकी एक रीति, जिसमें स्त्रियां गोबरकी गौरी बनाकर चलनीमें रख पृथ्वीपर फेंकती हैं। यदि वह सीधी गिरे तो शुभ और उलटी या आड़ी गिरे तो अशुभ मानी जाती है।

गीतावली १२० है जो [सीतामिलनरूप] बड़ा लाभ, बड़ा यश और बड़ी बड़ाई पाकर सुशोभित हो सके ? ॥ ८ ॥ अब अन्य राजालोग धनुषके ऊपर अपना गर्व गँवाकर तथा अपने बलको लज्जित कर घर लौट जायँगे और तुलसीदासके प्रभु गाजे-बाजे के साथ अपना विवाह कर प्रस्थान करेंगे ॥ ९ ॥ पुष्पवाटिकामें राग तोड़ी [ ७१ ] भोर फूल बीनबेको गये फुलवाईं हैं । सीसनि टिपारे, उपबीत, पीत पट कटि, दोना बाम करनि सलोने मे सवाई हैं ॥ १ ॥ रूपके अगार, भूपके कुमार, सुकुमार, गुरके प्रानअधार संग सेवकाई हैं । नीच ज्यों टहल करें, राखें रुख अनुसरें, कौसिक-से कोही बस किये दुहुँ भाई हैं ॥ २ ॥ सखिन सहित तेहि औसर बिधिके संजोग गिरिजाजू पूजिबेको जानकीजू आई हैं । निरखि लषन-राम जाने ऋतुपति-काम, मोहि मानो मदन मोहनी मूड नाई हैं ॥ ३ ॥ राघौजू-श्रीजानकी-लोचन मिलिबेको मोद कहिबेको जोगु न, मैं बातें-सी बनाई हैं । स्वामी, सीय, सखिन्ह, लखन तुलसीको तैसो तैसो मन भयो जाकी जैसिये सगाई हैं ॥ ४ ॥ प्रातःकाल होते ही राम और लक्ष्मण फूल बीननेके लिये फुलवाड़ीमें पधारे हैं। उनके सिरोंपर चौतनी टोपी, [गलेमें] यज्ञोप-

१२१ बालकाण्ड बीत और कमरमें पीताम्बर तथा बायें हाथमें फूलोंके दोने शोभायमान हैं, जिनसे उनकी सुन्दरता सवायी हो गयी है ॥ १ ॥ दोनों भाई [स्वभावसे ही] रूपके भण्डार हैं, तिसपर भी राजकुमार, सुकुमार शरीर, गुरुके प्राणाधार और उनके साथ सेवाभावसे उपस्थित हैं। वे नीचके समान गुरुजीकी टहलमें लगे रहते हैं; उनका रुख देखकर परिचर्या करते हैं, इससे उन्होंने विश्वामित्र-जैसे क्रोधी मुनीश्वरको भी अपने अधीन कर लिया ॥ २ ॥ दैववश इसी समय पार्वतीजीका पूजन करनेके लिये सखियोंके सहित श्रीसीताजी आ गयीं। वहाँ उन्होंने राम और लक्ष्मणको देखा और उन्हें साक्षात् ऋतुराज वसन्त और कामदेव ही समझा। उन्हें देखकर वे ऐसी मोहित हो गयीं मानो कामदेवने उनके मस्तकपर मोहिनी डाल दी हो ॥ ३ ॥ भगवान् राम और सीताजीके दृष्टिमिलापका जो आनन्द हुआ वह कहने योग्य नहीं है, मैंने तो कुछ बातें-सी बना दी हैं। उस समय भगवान् राम, सीता, सखीजन, लक्ष्मणजी और तुलसीदास—इनमेंसे जिनका जैसी सम्बन्ध है उनका वैसा ही चित्त हो गया ॥ ४ ॥ [ ७२ ] पूजि पारबती भले भाय पांय परिकै । सजल सुलोचन, सिथिल तनु पुलकित, आवै न बचन, मन रह्यो प्रेम भरिकै ॥ १ ॥ अंतरजामिनि भवभामिनि स्वामिनिसों हौं, कही चाहौं बात, मातु, अंत तौ हौं लरिकै । मूरति कृपालु मंजु माल दै बोलत भई, पूजो मन कामना भावतो बरु बरिकै ॥ २ ॥