गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली १०६ नाइ सीस पगनि, असीस पाइ प्रमुदित, पाँवड़े अरघ देत आदर सों आने हैं। ससन, बसन, वासकै सुपास सब बिधि, पूजि प्रिय पाहुने, सुभाय सनमाने हैं ॥ २ ॥ बिनय बढ़ाई ऋषि-राऊ परस्पर करत पुलकि प्रेम आनँद अघाने हैं। देखे राम-लखन निमेषै बिथकित भईं प्रानहु ते प्यारे लागे बिनु पहिचाने हैं ॥ ३ ॥ ब्रह्मानंद हृदय, दरस-सुख लोयननि अनभये उभय, सरस राम जाने हैं। तुलसी बिदेहकी सनेहकी दसा सुमिरि, मेरे मन माने राउ निपट सयाने हैं ॥ ४ ॥ मुनिवर विश्वामित्रजी आये हैं—यह जानकर जनकजी बड़े प्रसन्न हुए और गुरुजी तथा ब्राह्मणोंको बुलाकर समाजसहित उनसे मिलने- के लिये चले। इस समय उन्होंने अपने बड़े भाग्य जाने और वे अनुरागसे विह्वल हो गये ॥ १ ॥ जनकजी विश्वामित्रजीके चरणों सिर नवा, उनसे आशीर्वाद पा, उन्हें प्रसन्न-चित्तसे पाँवड़े तथा अर्घ्यदान देकर आदरपूर्वक ले आये तथा भोजन, वस्त्र और निवासस्थानका सुभीता कर, अपने प्रिय पाहुनोंको सब प्रकार पूज स्वभावसे ही सत्कार किया ॥ २ ॥ ऋषि और महाराज जनक आपसमें विनय और बड़ाई करते हैं। [अर्थात् जनकजी मुनिवरके प्रति विनीत होते हैं तथा मुनि महाराजकी बड़ाई करते हैं।] इस प्रकार प्रेमसे पुलकित हो वे आनन्दमें मग्न हो रहे हैं। राम-लक्ष्मणको देखकर वे पलक मारना भूल गये। बिना पहचाने हुए भी उन्हें वे दोनों भाई