गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 113, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ें१०७ बालकाण्ड प्राणोंसे भो प्रिय जान पड़े ॥ ३ ॥ हृदयसे ब्रह्मानन्दका तथा नेत्रोंसे दर्शनके आनन्दका अनुभव कर महाराज जनकने रामरूपको ही अधिक सरस जाना है [अर्थात् दर्शनसुखको ही विशेष समझा है] । तुलसीदासजी कहते हैं, विदेहके स्नेहकी दशा स्मरण कर मेरे मनको तो यही जान पड़ता है कि महाराज बड़े ही चतुर हैं ॥ ४ ॥ राग मलार [ ६२ ] कोसलरायके कुअँरोटा । राजत रुचिर जनक-पुर पैंठत स्याम गैर नीके जोटा ॥ १ ॥ चौतनि सिरनि, कनककली काननि, कटि पट पीत सोहाये । उर-मनि-माल, बिसाल बिलोचन, सीय-स्वयंबर आये ॥ २ ॥ बरनि न जात, मनहिं मन भावत, सुभग अबहिं बय थोरी । भई हैं मगन बिधुबदन बिलोकत बनिता चतुर चकोरी ॥ ३ ॥ कहँ सिवचाप, लरिकवनि बूझत, बिहँसि चितै तिरछौंहैं । तुलसी गलिन भीर, दरसन लगि लोग अटनि आरोहैं ॥ ४ ॥ जनकपुरमें प्रवेश करते समय कोसलराजकुमारोंकी अति सुन्दर गौर-श्याम जोड़ी बड़ी ही मनोहर जान पड़ती है ॥ १ ॥ दोनों बालकोंके सिरपर चौतनी टोपी, कानोंमें सुवर्णकली, कमरमें पीताम्बर और हृदयपर मणियोंकी माला शोभायमान है। उनके नेत्र बड़े विशाल हैं। इस प्रकार वे सीताजीके स्वयंवरमें पधारे ॥ २ ॥ उस जोड़ीका वर्णन नहीं होता, वह मन-ही-मन बड़ी भली जान पड़ती है। अभी अवस्था भी बहुत थोड़ी है। उनके मुखचन्द्रको निहारकर चतुर चकोरीरूप नगरकी नारियाँ प्रसन्न हो रही हैं ॥ ३ ॥ भगवान्