गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०५ बालकाण्ड ऋषितिय तारि स्वयंबर पेखन जनकनगर पगु धारे। मग नर-नारि निहारत सादर, कहैं बड़ भाग हमारे ॥ ४ ॥ तुलसी सुनत एक-एकनि सों चलत बिलोकनिहारे। मूकनि बचन-लाहु, मानो अंधनि लहे हैं बिलोचन-तारे ॥ ५ ॥ [मार्गमें जाते समय पथिक जन कहते हैं—] ये दोनों विश्वामित्रजीके यज्ञकी रक्षा करनेवाले हैं। इनके अति सुन्दर राम और लक्ष्मण नाम हैं तथा ये महाराज दशरथके प्रिय पुत्र हैं ॥ १ ॥ ये काकपक्ष धारण किये हुए अति कोमल और सुन्दर श्याम एवं पीतवर्ण कमलके समान जान पड़ते हैं, मानो कामदेवरूप विधाताने सारी शोभाको एकत्रित कर इन्हें स्वयं अपने ही करकमलोंसे रचा हो ॥ २ ॥ इन्होंने युद्धमें सुबाहुके समान सहस्रों दुष्ट, समरशूर और भारी राक्षसयोद्धाओंका तिरस्कार कर उन्हें हाथमें खेलके ही धनुष-बाण लेकर खेलका ही तरकस धारण कर मार डाला है ॥ ३ ॥ अब ये मुनिपत्नीका उद्धार कर स्वयंवर देखनेके लिये जनकपुरीको जा रहे हैं। मार्गमें 'हमारे बड़े भाग्य हैं' ऐसा कहकर सब स्त्री-पुरुष आदरपूर्वक इन्हें निहारते हैं ॥ ४ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, इस समाचारको एक-एकसे सुनकर अन्य दर्शकलोग भी चलते हैं, मानो मूक पुरुषोंको वाणी प्राप्त हो जाती है तथा अन्धोंको नेत्रोंके तारे मिल जाते हैं ॥ ५ ॥ जनकपुर-प्रवेश राग तोड़ी [ ६१ ] आये सुनि कौसिक जनक हरषाने हैं। बोलि पुर भूसुर, समाज सों मिलन चले, जानि बड़े भाग अनुराग अकुलाने हैं ॥ १ ॥