गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली १०४ [ ५९ ] मूरिभाग-भाजनु भई । रूपरासि अवलोकि बंधु दोउ प्रेम-सुरंग रई ॥ १ ॥ कहा कहैं, केहि भाँति सराहँै, नहि करतूति नई । बिनु कारन करुनाकर रघुबर केहि-केहि गति न दई ? ॥ २ ॥ करि बहु बिनय, राखि उर मूरति मंगल-मोदमई । तुलसी ह्वै बिसोक पतिलोकहि प्रभुगुन गनत गई ॥ ३ ॥ आज अहल्या परम सौभाग्यशालिनी हुई है। वह रूपकी राशि दोनों भाइयोंको देखकर प्रेमके रँगमें रँग गयी है ॥ १ ॥ कहिये, कवि किस प्रकार वर्णन करे, किस प्रकार उनकी सराहना करे ? उनकी यह करतूत कुछ नयी भी नहीं है। बिना कारण ही कृपा करनेवाले रघुनाथजीने भला किस-किसको शुभ गति नहीं दी ? ॥ २ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, इसी प्रकार बहुत-सी विनय कर और प्रभुकी मङ्गल तथा आनन्दमयी मूर्तिको हृदयमें धारण कर शोकहीन हो वह प्रभुका गुणगान करती पतिलोक- को चली गयी ॥ ३ ॥ राग कान्हरा [ ६० ] कौसिकके मखके रखवारे । नाम राम अरु लखन ललित अति, दसरथ-राज-दुलारे ॥ १ ॥ मेचक पीत कमल कोमल कल काकपच्छ-धर बारे । सोभा सकल सकेलि मदन-बिधि सुकर सरोज सँवारे ॥ २ ॥ सहस समूह सुबाहु सरिस खल समर सूर भट भारे । केलि-तून-धनु-बान-पानि रन निदरि निसाचर मारे ॥ ३ ॥